बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 16 नवंबर
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 की एक रैली में दिए गए भाषण को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के खिलाफ दायर आपराधिक शिकायत पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है।
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि खरगे का बयान न तो किसी धर्म या जाति पर लक्षित था और न ही इसका उद्देश्य समाज में वैमनस्य फैलाना था। इस निर्णय के साथ ही भाजपा और आरएसएस के एक सदस्य द्वारा लगाए गए नफरती भाषण के आरोप समाप्त हो गए हैं।
क्या था मामला?
आरएसएस सदस्य रविंद्र गुप्ता ने शिकायत दायर कर आरोप लगाया था कि अप्रैल 2023 में कर्नाटक के नरेगल में हुई एक चुनावी रैली के दौरान मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा, आरएसएस और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
शिकायतकर्ता का दावा था कि यह भाषण नफरत फैलाने वाला और समाज को बांटने वाला था।अदालत ने क्यों खारिज की शिकायत?
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी प्रीति राजोरिया ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि—
खरगे का भाषण राजनीतिक और वैचारिक आलोचना के दायरे में आता है।बयान में किसी भी धर्म, जाति, समुदाय या समूह को लक्षित करके अपमानजनक शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया।भाषण के बाद किसी तरह की हिंसा, तनाव या कानून-व्यवस्था में समस्या उत्पन्न नहीं हुई।अदालत ने यह भी कहा कि नफरती भाषण का मामला तभी बनता है जब किसी नेता की अभिव्यक्ति दो समूहों के बीच दुश्मनी, वैमनस्य या भेदभाव फैलाने की मंशा रखती हो। यहां ऐसा कोई संकेत नहीं मिला।
आईपीसी की धारा 500 (मानहानि) क्यों लागू नहीं हुई?अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की ओर से स्वयं शिकायत नहीं की गई थी। कानून के अनुसार किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा इस तरह की मानहानि शिकायत पर अदालत स्वतः संज्ञान नहीं ले सकती।इसलिए आईपीसी की धारा 500 के तहत भी मामला नहीं बनता।
पहले भी अस्वीकार हो चुकी थी प्राथमिकी की मांगयह पहली बार नहीं था जब अदालत ने शिकायत को आधारहीन माना हो। पिछले साल दिसंबर में भी इसी मामले में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश देने से अदालत ने इनकार कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि यदि शिकायतकर्ता के पास सबूत हैं, तो वे उन्हें सीधे पेश कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर सीआरपीसी की धारा 202 के तहत जांच की जा सकती है।
फैसले के मायने यह
आदेश न सिर्फ राजनीतिक विमर्श में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमाओं को स्पष्ट करता है, बल्कि यह भी रेखांकित करता है कि चुनावी भाषणों में की गई राजनीतिक आलोचना को हर बार ‘नफरत’ का लेबल नहीं दिया जा सकता।अदालत ने अपने फैसले में यह संदेश भी निहित किया कि लोकतांत्रिक राजनीति में तीखी आलोचना और घृणास्पद भाषण—
दोनों में स्पष्ट अंतर है, और कानून उस अंतर को ध्यान से पहचानता है।
