बी के झा
नई दिल्ली , 26 मार्च
मध्य-पूर्व की भू-राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता के कगार पर ला खड़ा किया है। प्रतिष्ठित अखबार The New York Times की एक हालिया रिपोर्ट ने इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट कर दिया है।
क्या है पूरा मामला?
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान द्वारा किए गए व्यापक मिसाइल और ड्रोन हमलों में मध्य-पूर्व स्थित अमेरिका के 13 सैन्य ठिकाने बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। इनमें कुवैत के पोर्ट शुएबा, अली अल सलेम एयर बेस और कैंप ब्यूहरिंग जैसे महत्वपूर्ण बेस शामिल हैं। इन ठिकानों की स्थिति इतनी खराब बताई जा रही है कि वे “रहने लायक” भी नहीं बचे हैं।इस संघर्ष की पृष्ठभूमि में वह घटना बताई जा रही है जिसमें अयातुल्ला अली खामेनेई को निशाना बनाए जाने के बाद ईरान ने व्यापक जवाबी कार्रवाई शुरू की।
रणनीतिक झटका: अमेरिका के लिए कितना बड़ा नुकसान?
रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, यह हमला केवल भौतिक नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अमेरिका की क्षेत्रीय सैन्य रणनीति को गहरा आघात पहुंचा है।रक्षा विश्लेषक गौरव आर्या का मानना है कि पहली बार है जब ईरान ने इतने समन्वित और बड़े पैमाने पर अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है। इससे स्पष्ट है कि ईरान अब ‘डिटरेंस’ के नए स्तर पर पहुंच चुका है।”
कई बेसों की एयर ऑपरेशन क्षमता ठप
ईंधन और लॉजिस्टिक सप्लाई में भारी बाधासैनिकों को अस्थायी स्थानों (होटल/ऑफिस) में शिफ्ट करना पड़ा“रिमोट वॉर” की ओर बढ़ता अमेरिका रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका अब “Remote Warfare” यानी दूरस्थ युद्ध की स्थिति में पहुंच गया है। इसका मतलब है:जमीनी सैनिक कम, हवाई हमले ज्यादा ड्रोन और मिसाइल आधारित युद्ध रणनीति क्षेत्र में स्थायी उपस्थिति कमजोर
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफेस श्वैता चौधरी का मानना है कि:“यह बदलाव दर्शाता है कि अमेरिका अब सीधे टकराव से बचते हुए तकनीकी युद्ध की ओर झुक रहा है, लेकिन इससे उसकी ‘ग्राउंड कंट्रोल’ क्षमता घटेगी।”
ट्रंप की नीति पर उठे सवाल
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक मिडिल-ईस्ट नीति पर भी अब सवाल उठने लगे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि:ईरान को “कम आंकना” अमेरिका के लिए भारी पड़ा रणनीतिक आकलन में चूक हुई क्षेत्रीय सहयोगी देश भी अब असहज हैं
खाड़ी देशों में बढ़ी बेचैनी
ईरान के हमले केवल अमेरिकी ठिकानों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि:कतरबहरीनसऊदी अरबजैसे देशों में भी अमेरिकी हितों को निशाना बनाया गया। इससे पूरे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा संकट गहरा गया है।
क्या यह लंबी जंग की शुरुआत है?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव अब “लॉन्ग-टर्म कॉन्फ्लिक्ट” में बदल सकता है।
सैन्य रणनीतिकार
पारंपरिक युद्ध नहीं है, बल्कि हाइब्रिड वॉरफेयर है—जहां मिसाइल, ड्रोन, साइबर और प्रॉक्सी सब एक साथ इस्तेमाल हो रहे हैं। इसका अंत जल्दी नहीं होगा।”
निष्कर्ष
मध्य-पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच यह टकराव केवल दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा बनता जा रहा है।जहां एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत के पुनर्गठन में लगा है, वहीं ईरान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब प्रत्यक्ष टकराव से पीछे हटने वाला नहीं है।
आने वाले समय में यह संघर्ष:वैश्विक तेल बाजारअंतरराष्ट्रीय कूटनीतिऔर क्षेत्रीय स्थिरतातीनों को गहराई से प्रभावित कर सकता है।
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