मिथिला से पीएम मोदी की हुंकार, छठ के बाद सियासत की नई चौपाल, विकास, आस्था और पहचान के संग — बिहार की राजनीति पहुंची नई करवट पर

बी के झा

NSK

पटना / दरभंगा / नई दिल्ली, 27 अक्टूबर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए सियासी माहौल अब पूरी तरह गर्म हो चुका है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत मिथिलांचल की धरती से की है, जो न केवल एक इलाका है, बल्कि बिहार की पहचान, संस्कृति और राजनीतिक चेतना का केंद्र भी मानी जाती है।

मिथिला से अपनी पहली रैली कर प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि —दिल जीतने की शुरुआत, दिल की धरती से ही होगी।“सेवा और स्थिरता” का संदेश देते हुए मोदी ने साधा विपक्ष पर निशानाप्रधानमंत्री मोदी ने अपनी रैली में विकास, आस्था और विरासत के सूत्रों को जोड़ते हुए कहा कि एनडीए का विजन केवल सत्ता नहीं, बल्कि सेवा और स्थिरता पर आधारित है।

उन्होंने बिहार में कानून-व्यवस्था, सड़क, बिजली और उद्योगों में आई प्रगति को गिनाया और विपक्ष पर ‘जंगलराज की वापसी’ का डर दिखाया।विपक्ष ने भी कस ली कमर — तेजस्वी और कांग्रेस मैदान मेंइधर, विपक्षी महागठबंधन ने भी अपनी तैयारी तेज कर दी है।तेजस्वी यादव ने पटना में “नए बिहार” के वादों की झड़ी लगाते हुए कहा कि युवाओं, किसानों और मजदूरों के लिए बदलाव अब जरूरी हो चुका है।

वहीं कांग्रेस ने घोषणा की है कि छठ महापर्व के बाद राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और मल्लिकार्जुन खरगे बिहार के कई जिलों में ताबड़तोड़ रैलियां करेंगे।इस बीच, तेजस्वी यादव और चिराग पासवान के बीच “मुसलमान मुख्यमंत्री” को लेकर छिड़ी जुबानी जंग ने चुनावी माहौल को और गरमा दिया है।

नीतीश कुमार का पलटवार – “2005 से पहले लौटना नहीं चाहता बिहार”मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने रविवार को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अपने शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाया।

उन्होंने लिखा कि —2005 से पहले का बिहार सबको याद है —

अपराध और भ्रष्टाचार चरम पर था। शाम छह बजे के बाद लोग घर से बाहर नहीं निकल पाते थे। बहन-बेटियां सुरक्षित नहीं थीं। अपहरण उद्योग बन चुका था, उद्योग-धंधे ठप थे, और लोग पलायन को मजबूर थे। लेकिन 2005 के बाद बिहार ने तरक्की की राह पकड़ी, और अब जनता दो दशक पीछे नहीं जाना चाहती।”मिथिलांचल बना सियासत का रणक्षेत्रछठ महापर्व के फौरन बाद प्रधानमंत्री का अगला चुनावी आगाज़ मिथिला की धरती से हुआ है।लेकिन अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मिथिला के मतदाता केवल प्रधानमंत्री के भाषण से प्रभावित होते हैं, या फिर स्थानीय हकीकत को ध्यान में रखकर वोट करते हैं।

मिथिलांचल में करीब 50 -60 % सवर्ण मतदाता हैं, जिनमें भाजपा की मजबूत पकड़ मानी जाती है। लेकिन इस बार सवर्ण का बड़ा हिस्सा बीजेपी से खफा हैं। जो बीजेपी का सभी समीकरण को पलट सकता है परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यादव-मुस्लिम मतदाताओं की एकजुटता भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है।

स्थानीय नाराज़गी — “गुंडई और भ्रष्टाचार ने बिगाड़ा माहौल”

एक स्थानीय शिक्षाविद ने सख्त शब्दों में कहा —प्रधानमंत्री तो भाषण देकर चले जाएंगे, लेकिन भुगतना स्थानीय जनता को पड़ता है। भाजपा के स्थानीय विधायक, मंत्री और उनके गुर्गों द्वारा की जा रही दबंगई और जमीन कब्जे की घटनाएं जनता के मन में गहरी नाराज़गी पैदा कर रही हैं।

पुलिस प्रशासन भी गूंगा-बहरा बना रहता है।”

उन्होंने आगे कहा —लालू यादव के दौर का जो ठेकेदार उस समय बिल में छिपा था, वही आज भ्रष्टाचार का आतंक मचा रहा है। भाजपा के कई विधायक अपने रसूख का इस्तेमाल कर आमजन की जमीन हड़पते हैं। यह सब अब जनता से छिपा नहीं है। इसलिए मिथिलांचल से भाजपा के लिए सबसे चौंकाने वाला नतीजा देखने को मिलेगा।”भावनाओं, पहचान और भरोसे की त्रिकोणीय जंगबिहार का चुनाव अब केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि भावनाओं, पहचान और भरोसे की त्रिकोणीय जंग बन चुका है।एक ओर प्रधानमंत्री मोदी का विकास और स्थिरता का संदेश,

दूसरी ओर तेजस्वी यादव का बदलाव का वादा,और तीसरी ओर मिथिलांचल के मतदाताओं का स्थानीय अनुभव और नाराज़गी —तीनों मिलकर इस बार का चुनाव बेहद दिलचस्प बना रहे हैं।नतीजा जो भी हो, मिथिला की गूंज पूरे बिहार में सुनाई देगीछठ के बाद जब बिहार में प्रचार का शोर अपने चरम पर होगा, तब मिथिला की रैली की गूंज तय करेगी किप्रधानमंत्री मोदी की हुंकार जनमत में बदलती है या मिथिला बदलाव की दस्तक देती है।”

एक बात तय है —मिथिलांचल से उठी सियासत की यह नई चौपाल अब पूरे बिहार में हलचल मचा चुकी है।

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