बी. के. झा
NSK

दरभंगा/रोसड़ा-अलीनगर, समस्तीपुर/नई दिल्ली, 29 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव के राजनीतिक शोर के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मिथिलांचल की धरती से विपक्ष पर तीखा प्रहार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि नीतीश कुमार ही एनडीए के मुख्यमंत्री चेहरा हैं।
रोसड़ा और अलीनगर की चुनावी सभाओं में अमित शाह ने अपने अंदाज़ में कहा —सीएम या पीएम की कोई सीट खाली नहीं है। यहां नीतीश बैठे हैं, और वहां मोदी।”यह बयान जितना छोटा था, उतना ही दूरगामी असर छोड़ गया।पिछले कई दिनों से एनडीए के सीएम फेस को लेकर उठ रहे सवालों पर अब उन्होंने विराम लगा दिया।“
लालू-राहुल का सूपड़ा साफ होगा 14 नवंबर को
समस्तीपुर के जननायक कर्पूरी स्टेडियम में उमड़ी भीड़ को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा —
यह चुनाव विधायक या मुख्यमंत्री चुनने का नहीं, बल्कि बिहार को जंगलराज से बचाने का चुनाव है।
”उन्होंने दावा किया कि एनडीए के ‘पांच पांडवों’ की जीत निश्चित है, और 14 नवंबर को लालू-राहुल का सूपड़ा साफ होने वाला है।शाह ने अपनी सरकार की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि दरभंगा में एम्स, मिथिला में आईटी पार्क, और समस्तीपुर में औद्योगिक क्षेत्र जैसी योजनाएं बिहार को विकास की राह पर ले जा रही हैं।
अतीत का बयान और आज का पलटवार
कुछ ही दिन पहले पटना में एक इंटरव्यू के दौरान अमित शाह ने कहा था —चुनाव के बाद विधायक दल मुख्यमंत्री का चुनाव करेगा।”उस वक्त विपक्ष ने इस बयान को हथियार बना लिया था और महागठबंधन ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया था।
शाह के बयान से एनडीए के भीतर असमंजस और विपक्ष के बीच उत्साह की लहर दौड़ पड़ी थी।
लेकिन अब दरभंगा और रोसड़ा की सभाओं से शाह ने उस भ्रम को तोड़ दिया —उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि “चुनाव के बाद भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री होंगे।”
राजनीतिक विश्लेषक बोले — “
देरी से ही सही, पर दुरुस्त फैसला”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शाह का यह बयान देर से आया, पर बेहद जरूरी था।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा —यदि यही घोषणा अमित शाह टीवी इंटरव्यू के समय कर देते, तो बीजेपी को अपने ही सहयोगी पर उठ रहे संदेहों का सामना नहीं करना पड़ता।
आज पार्टी का छिछालेदर नहीं होता।”
उन्होंने आगे कहा —शाह को देर से ही सही यह समझ में आ गया कि बिहार में बीजेपी, नीतीश कुमार के बिना अधूरी है। नीतीश के बिना बिहार तो दूर, दिल्ली की सत्ता बचाना भी मुश्किल हो जाएगा।”
शिक्षाविद की टिप्पणी — “शब्दों से नहीं, कर्मों से तय होती साख”
वहीं एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने गृहमंत्री अमित शाह पर तंज कसते हुए कहा —
गृहमंत्री हर सभा में लालू पर जंगलराज के आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके ही एक स्थानीय विधायक और उसके सहयोगियों द्वारा दरभंगा में तीन साल से एक पत्रकार की जमीन पर कब्जा कर रखा गया है। जब पत्रकार ने पैसा मांगने की हिम्मत की, तो उसे जान से मारने की धमकी देकर भगा दिया गया। पुलिस सब देख रही है, लेकिन आरोपी अधिकारी को सरकार ने इनाम में पदोन्नति दे दी।
उन्होंने आगे कहा —दरभंगा में उनके सहयोगी दल (चिराग पासवान) के कार्यकर्ताओं द्वारा जमीन कब्जाने का अलग आतंक फैला हुआ है।
यह मामला प्रधानमंत्री से लेकर स्वयं गृहमंत्री तक की जानकारी में है, लेकिन मौन साध लिया गया है।
क्या गृहमंत्री चुनावी मंच से यह भी कहेंगे कि अपने दोषी विधायक पर कार्रवाई करेंगे, या फिर सिर्फ दूसरों की गलतियों पर ही बोलते रहेंगे?
”इस टिप्पणी ने चुनावी मंच से उठाए गए ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ के नारे के बीच एक नैतिक प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।“
डैमेज कंट्रोल” की रणनीति या मजबूरी?
दरभंगा से शाह की यह घोषणा सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं मानी जा रही।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अमित शाह ने यह संदेश इसलिए दिया ताकि यह भ्रम न फैले कि एनडीए के भीतर मतभेद बढ़ रहे हैं।दरअसल, एनडीए के कई नेता अब भी इस सच्चाई को स्वीकार चुके हैं कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार की स्वीकार्यता और छवि को नज़रअंदाज़ करना राजनीतिक आत्मघात होगा।
निष्कर्ष
“नीतीश के बिना बिहार नहीं, बिहार के बिना दिल्ली नहीं”अमित शाह की यह घोषणा न केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा है, बल्कि एक राजनीतिक स्वीकारोक्ति भी है —कि बिहार में नीतीश कुमार अब भी “सत्ता संतुलन का आधार स्तंभ” हैं।और यह भी कि दिल्ली की सत्ता की सुरक्षा, पटना के विश्वास पर निर्भर करती है।
