बी.के. झा
NSK


पटना, 13 नवम्बर
:बिहार विधानसभा की 243 सीटों पर दो चरणों में मतदान सम्पन्न हो चुका है —
6 और 11 नवम्बर को जनता ने चुपचाप अपनी मुहर लगा दी। अब निगाहें 14 नवम्बर पर टिकी हैं, जब सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू होगी। दोपहर तक रुझान और शाम तक यह तय हो जाएगा कि बिहार की सियासत का बादशाह कौन होगा।एग्जिट पोल के रुझान एनडीए को बढ़त दिखा रहे हैं, मगर असली चर्चा इस बात की है कि क्या भाजपा से ज़्यादा सीटें जदयू को मिल सकती हैं? और अगर ऐसा हुआ, तो एक बार फिर नीतीश कुमार का ताज लगभग तय है।
सियासी चालें और कैमरे पर कैद हर हरकत
हाल के महीनों में नीतीश कुमार की सेहत और सार्वजनिक व्यवहार को लेकर तमाम तरह की चर्चाएँ चलीं। राजनीतिक गलियारों में उनके असामान्य हावभाव पर कई कैमरे टिके रहे
कभी ठहाका, कभी चुप्पी, कभी व्यंग्य —
मगर हर दृश्य के पीछे एक रणनीति छिपी थी।जब एनडीए ने उन्हें मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने से परहेज़ किया, नीतीश ने चुपचाप गठबंधन की गली से किनारा किया और अपने रास्ते अलग बना लिए। कहा गया कि वे पीएम मोदी की रैलियों से दूर रहे, लेकिन असल में उनका लक्ष्य स्पष्ट था — जदयू को भाजपा से अधिक सीटें दिलाना।और अब, परिणामों से पहले जो संकेत मिल रहे हैं, वे यही दिखाते हैं कि नीतीश की गणितीय सियासत एक बार फिर रंग ला सकती है।
लालू ने कहा था — “नीतीश के पेट में दाँत हैं”नीतीश कुमार भारतीय राजनीति के उन गिने-चुने नेताओं में हैं जिन्होंने कभी पूर्ण बहुमत न पाकर भी लगातार सत्ता संभाली है।
वे गठबंधन की राजनीति के शास्त्री हैं —
कभी महागठबंधन के साथ, तो कभी एनडीए के साथ —
लेकिन हमेशा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर टिके रहे।लालू प्रसाद यादव ने कभी कहा था, “नीतीश के पेट में दाँत हैं, कब क्या करेंगे कोई नहीं जानता।”दोनों नेताओं की राजनीतिक यात्रा जेपी आंदोलन से शुरू हुई थी। दोस्ती, मतभेद और फिर गठबंधन —
नीतीश और लालू की राजनीति ने बिहार की दशकों की कहानी गढ़ी है।
राजनीतिक जानकार कहते हैं, अगर आज भी लालू पुकारें, तो नीतीश शायद रुकेंगे नहीं —
क्योंकि नीतीश की राजनीति में स्थायी दुश्मन या स्थायी मित्र नहीं, सिर्फ़ स्थायी उद्देश्य — सत्ता में स्थायित्व है।महिलाओं की शक्ति पर नीतीश का सबसे बड़ा दांव
नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन में अनेक फैसले लिए, लेकिन महिलाओं को सशक्त करने की दिशा में उनके कदम ऐतिहासिक रहे हैं।
उन्होंने बिहार को वह राज्य बनाया जहाँ पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण मिला — यह देश का पहला उदाहरण था।इसके बाद सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं के लिए 35% आरक्षण कोटा लागू कर उन्होंने महिला सशक्तिकरण को नारा नहीं, नीति बना दिया।
इन फैसलों ने उन्हें “विकास पुरुष” और “साफ-सुथरी राजनीति” के प्रतीक के रूप में स्थापित किया। नीतीश कुमार के इस मास्टरस्ट्रोक ने गांव-गांव की महिलाओं को उनकी राजनीतिक ताकत का अहसास कराया —
और यही वर्ग आज उनकी सबसे मज़बूत वोट बैंक बन चुका है।शराबबंदी, साइकिल और पोशाक योजना —
सामाजिक सुधारों की मिसाल
नीतीश कुमार का एक और साहसिक कदम था शराबबंदी। जीविका दीदी समूह की एक महिला के आग्रह पर लिए गए इस निर्णय ने राज्य के सामाजिक ढाँचे को बदल दिया।
उन्होंने सिर्फ़ शराबबंदी नहीं की, बल्कि इसके लिए कठोर कानून बनाए और महिलाओं ने इस निर्णय को दिल से अपनाया।फिर आईं बालिका साइकिल योजना और पोशाक योजना, जिन्होंने ग्रामीण बेटियों के जीवन में शिक्षा का नया सूरज उगाया।
गाँवों में जब लड़कियाँ नीली पोशाक में साइकिल पर स्कूल जातीं, तो बिहार की तस्वीर बदलती दिखती थी। वह दृश्य, नीतीश के शासन की पहचान बन गया —
“सशक्त बेटी, शिक्षित बिहार”।चुनाव से पहले का सटीक मास्टरस्ट्रोक
2025 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने कई कल्याणकारी फैसले लिए —सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि,125 यूनिट तक बिजली फ्री,युवाओं के लिए रोजगार और सरकारी नियुक्तियों की घोषणा,और सबसे अहम — महिलाओं को 10,000 रुपये का विशेष लोन पैकेज सीधे उनके खातों में ट्रांसफर करना।राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यही फैसला चुनावी जादूगर का आखिरी लेकिन निर्णायक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ है।ग्रामीण इलाकों की महिलाएं, जो पहले ही नीतीश की योजनाओं से जुड़ी थीं, इस फैसले के बाद फिर से उनकी समर्थक बन गईं। यही वजह है कि जीत चाहे एनडीए की झोली में गिरे या महागठबंधन की, सत्ता की कुर्सी पर बैठने के लिए राज्य की जनता आज भी नीतीश कुमार को सबसे सुरक्षित विकल्प मानती है।
आलोचनाओं के बीच बेदाग़ छवि
हालाँकि आलोचकों का तर्क है कि नीतीश के शासन में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा, और नौकरशाही पर उनका नियंत्रण कमजोर पड़ा। लेकिन इसके बावजूद उनकी व्यक्तिगत छवि आज भी बेदाग़ है — न परिवारवाद, न निजी घोटाले, न कोई राजनीतिक दाग।
मोदी की लोकप्रियता और नीतीश की ईमानदार छवि का यह संयोजन एनडीए के लिए जीत का मजबूत सूत्र साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
बिहार के शतरंज का मास्टरबिहार की राजनीति में नीतीश कुमार सिर्फ एक चेहरा नहीं, बल्कि रणनीति का नाम हैं।वे जानते हैं कब गठबंधन बनाना है, कब तोड़ना है, कब चुप रहना है और कब एक झटके में चाल चलनी है।इस चुनाव में भी उन्होंने एक सधे हुए शतरंज खिलाड़ी की तरह अपने प्यादे आगे बढ़ाए — और अब बिहार की जनता देख रही है कि इस बार भी ‘खेला’ नीतीश ने ही खेला है।यूँ ही नहीं कहते —नीतीश राजनीति नहीं करते, राजनीति नीतीश करती है।
