ये तरीका बर्दाश्त नहीं…” मुख्य न्यायाधीश बनते ही जस्टिस सूर्यकांत का सख्त संदेश, न्यायपालिका की गरिमा और हस्तक्षेप पर जताया घोर ऐतराज़, देश के 53वें CJI का शपथग्रहण बना न्यायिक स्वतंत्रता पर नई घोषणा

बी के झा

NSK

नई दिल्ली , 24 नवंबर

देश की सर्वोच्च न्यायिक कुर्सी संभालते ही नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने एक ऐसा संदेश दिया जिसने न्यायिक बिरादरी, सत्ता प्रतिष्ठान और कानूनी हलकों में हलचल मचा दी। राष्ट्रपति भवन के सादे लेकिन गरिमामय समारोह में हिंदी में शपथ लेने के कुछ ही घंटे बाद उन्होंने जिस मुद्दे पर अपनी नाराज़गी जताई, उससे साफ हो गया कि उनका कार्यकाल न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संस्थागत मर्यादा और न्यायिक प्रक्रियाओं में बाहरी दखल पर सख्त रुख वाला रहने वाला है।

CJI बनते ही किस बात पर जताया घोर ऐतराज?शपथ के बाद सुप्रीम कोर्ट में औपचारिक स्वागत समारोह के दौरान जस्टिस सूर्यकांत ने कहा—“न्यायपालिका के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप, दबाव या असंवेदनशील आलोचना—ये तरीका बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”उन्होंने साफ शब्दों में यह भी संकेत दिया कि—अदालतों के फैसलों पर राजनीतिक या संस्थागत बयानबाज़ी न्यायाधीशों पर अनुचित टिप्पणी या दवाब बनाने की कोशिश चल रहे मामलों पर लगातार सार्वजनिक प्रोपेगेंडाअब कठोरता से देखा जाएगा।यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ वर्षों में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव की कई घटनाएँ चर्चा में रही हैं।

हरियाणा की धरती से सर्वोच्च न्यायालय की ऊंचाई तक हिसार जिले के एक साधारण परिवार से निकलकर देश के 53वें मुख्य न्यायाधीश बनने का सफर खुद में प्रेरक है।उनकी प्रमुख उपलब्धियां—जन्म: 10 फरवरी 1962, हिसार (हरियाणा)शिक्षा: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कानून में स्नातकोत्तर, प्रथम श्रेणी में प्रथम कानूनी करियर:

छोटे शहर के वकील से पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता न्यायिक भूमिका:पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में उल्लेखनीय निर्णय 5 अक्टूबर 2018 को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त2019 में सुप्रीम कोर्ट जज बनेवे संवैधानिक महत्व के कई ऐतिहासिक फैसलों का हिस्सा रहे।उनके निर्णय जो उन्हें अलग पहचान देते हैं एक न्यायाधीश के रूप में उनके निर्णय बौद्धिक दृढ़ता और न्यायिक स्वतंत्रता के उदाहरण रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं—

अनुच्छेद 370 पर ऐतिहासिक फैसलाउन्होंने उस बेंच का हिस्सा रहते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को हटाने पर महत्वपूर्ण राय दी, जिसे आधुनिक भारत के संवैधानिक ढांचे का निर्णायक मोड़ माना जाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े निर्णय

उन्होंने कई मामलों में यह स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, असहमति और विचारों की स्वतंत्रता ‘मौलिक अधिकार’ हैं, लेकिन इनके नाम पर अराजकता नहीं फैल सकती।

नागरिकता और व्यक्तिगत अधिकार नागरिकता, मानवाधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर उनके फैसले न्याय, संवैधानिक मौलिकता और मानवीय दृष्टिकोण का सुंदर संतुलन दिखाते हैं।

CJI सूर्यकांत का कार्यकाल—क्या उम्मीदें?वे लगभग 15 महीने तक इस पद पर रहेंगे और 9 फरवरी 2027 को 65 वर्ष की आयु में रिटायर होंगे। कानूनी जगत को उम्मीद है कि उनका कार्यकाल—न्यायपालिका की पारदर्शिता बढ़ाने तकनीक का अधिक उपयोग करनेमामलों के त्वरित निपटारेऔर निचली अदालतों में सुधारकी दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।

राजनीतिक विश्लेषक उनके शुरुआती बयान को संकेत दे रहे हैं कि आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक स्वायत्तता के मामले में और अधिक मुखर हो सकता है

।निष्कर्ष:

न्यायपालिका पर सख्त रुख का ऐलाननए मुख्य न्यायाधीश का संदेश साफ है—न्यायपालिका की मर्यादा, स्वतंत्रता और गरिमा सर्वोपरि है।किसी भी संस्था, किसी भी शक्ति या किसी भी व्यक्ति द्वारा इस व्यवस्था को चुनौती देना अब आसान नहीं होगा।जस्टिस सूर्यकांत का यह तेवर दिखाता है कि उनका कार्यकाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि न्यायिक मूल्यों और संवैधानिक संस्कृति की पुनर्स्थापना का भी कालखंड बनने जा रहा है।

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