बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 23 मार्च
भारतीय न्यायपालिका के भीतर आत्ममंथन की एक दुर्लभ और साहसिक झलक उस समय देखने को मिली, जब सुप्रीम कोर्ट के जज Ujjal Bhuyan ने न्यायिक कार्यप्रणाली पर तीखी और विचारोत्तेजक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि “कुछ जज राजा से भी ज्यादा वफादार बनने के सिंड्रोम से पीड़ित हैं,”—एक ऐसा बयान जिसने न्यायिक स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों और कानून के दुरुपयोग पर नई बहस छेड़ दी है।
न्यायपालिका पर आत्मालोचना: दुर्लभ लेकिन जरूरी
Ujjal Bhuyan की यह टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत राय नहीं, बल्कि न्यायिक व्यवस्था के भीतर उभरती चिंताओं का सार्वजनिक प्रकटीकरण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कई मामलों में जमानत जैसे बुनियादी अधिकारों को भी अनावश्यक रूप से रोका जाता है, जिससे निर्दोष लोग लंबे समय तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं।यह सवाल सीधे तौर पर “न्यायिक विवेक” (Judicial Discretion) और उसकी सीमाओं पर खड़ा होता है—
क्या न्यायपालिका कभी-कभी सत्ता के प्रति जरूरत से ज्यादा झुक जाती है?
असहमति बनाम अपराध: लोकतंत्र की कसौटी
जस्टिस भुइयां ने कहा कि विकसित भारत की परिकल्पना में असहमति और बहस के लिए पर्याप्त स्थान होना चाहिए।उनका यह कथन—“
असहमति को अपराध नहीं बनाया जा सकता”—
आज के सामाजिक-
राजनीतिक परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।उन्होंने चिंता जताई कि:सोशल मीडिया पोस्ट या मीम्स तक पर एफआईआर दर्ज हो रही हैं छात्र आंदोलनों और शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को भी आपराधिक रंग दिया जा रहा है छोटे-छोटे मामलों में पुलिस और न्यायपालिका का समय व्यर्थ हो रहा है-यह स्थिति न केवल न्यायिक संसाधनों पर बोझ डालती है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करती है।
UAPA पर गंभीर सवाल: आंकड़ों की जुबानी सच्चाई
Unlawful Activities (Prevention) Act (UAPA) को लेकर जस्टिस भुइयां ने जो आंकड़े पेश किए, वे चौंकाने वाले हैं।2019: 1984 गिरफ्तारियां, केवल 34 दोषसिद्धि (1.74%)2020: 1321 गिरफ्तारियां, केवल 80 दोषसिद्धि (लगभग 3%)कुल मिलाकर दोषसिद्धि दर 4% से भी कमइन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां बिना ठोस सबूत के या जल्दबाजी में की गईं। इससे न केवल लोगों की स्वतंत्रता प्रभावित होती है, बल्कि न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ भी बढ़ता है।
सामाजिक न्याय पर भी प्रहार
अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने केवल कानूनी मुद्दों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक असमानताओं पर भी कड़ा रुख अपनाया।उन्होंने कहा कि विकसित भारत में:जाति के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार की घटनाएं देश की छवि पर सवाल उठाती हैं हर व्यक्ति के सम्मान की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए यह बयान न्यायपालिका की उस संवेदनशील भूमिका को रेखांकित करता है, जो केवल कानून तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की भी संरक्षक है।
न्यायिक प्रणाली पर बढ़ता दबाव
जस्टिस भुइयां ने यह भी स्पष्ट किया कि बेबुनियाद एफआईआर और “फालतू अपीलों” के कारण अदालतों में मामलों का अंबार लग रहा है।जब छोटे-छोटे मामलों में:एसआईटी (विशेष जांच दल) का गठन करना पड़ता है उच्चतम न्यायालय तक मामले पहुंच जाते हैंतो यह न केवल न्यायिक समय की बर्बादी है, बल्कि गंभीर मामलों के निपटारे में भी देरी का कारण बनता है।
विश्लेषण: न्यायपालिका के लिए चेतावनी या सुधार का अवसर?
यह टिप्पणी भारतीय न्यायपालिका के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है।विशेषज्ञों के अनुसार, यह तीन बड़े संदेश देती है:न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करने की जरूरतकानूनों के दुरुपयोग पर सख्त निगरानीअसहमति को लोकतंत्र का मूल तत्व मानने की पुनर्पुष्टि
निष्कर्ष:
न्याय का संतुलन ही लोकतंत्र की आत्मा
Ujjal Bhuyan की यह टिप्पणी केवल आलोचना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है—कि न्यायपालिका को सत्ता से नहीं, संविधान से अपनी निष्ठा तय करनी चाहिए।जब जज “राजा से ज्यादा वफादार” बनने लगते हैं, तो न्याय का संतुलन बिगड़ जाता है। और जब असहमति को अपराध बना दिया जाता है, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ने लगती है।ऐसे में यह वक्त है आत्मचिंतन का—
ताकि न्याय केवल दिया ही न जाए, बल्कि होते हुए दिखे भी।
