बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 20 नवंबर
देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ के बाद सबसे चर्चित कार्यकाल में शुमार किए जा रहे CJI बी.आर. गवई अब अपने अंतिम दो कार्य दिवसों में हैं। 23 नवंबर को वे औपचारिक रूप से पद छोड़ देंगे। लेकिन रिटायरमेंट के ठीक पहले देश की शीर्ष अदालत एक असामान्य गति और गम्भीरता के साथ फैसले सुना रही है—और चर्चा इन फैसलों की सामग्री से ज़्यादा, उनकी शैली पर है।पिछले दो दिनों में, CJI गवई ने दो अलग-अलग संवैधानिक पीठों की अध्यक्षता की और दोनों मामलों में महत्वपूर्ण फैसले सुनाए।
19 नवंबर को जिला जजों की वरिष्ठता पर वर्षों से चले आ रहे विवाद को सुलझाया और साफ कहा कि सीनियरिटी में आरक्षण का सिद्धांत लागू नहीं हो सकता। ठीक उसके अगले दिन, 20 नवंबर को, प्रेसिडेंशियल रेफरेंस पर बड़ा फैसला आया—
राज्यपाल और राष्ट्रपति को विधेयक पर हस्ताक्षर करने के लिए किसी भी तरह की समय-सीमा तय नहीं की जा सकती, और न ही न्यायपालिका उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती है।दोनों फैसले अलग—लेकिन एक बात समानदोनों ही निर्णयों में एक बात चौंकाने वाली है—इनमें से किसी भी फैसले का ‘ऑथर जज’ कौन है, इसका उल्लेख नहीं है।
पहला फैसला CJI गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस के. विनोद चंद्रन और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने दिया।दूसरा फैसला CJI गवई, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस नाथ, जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच का था।लेकिन दोनों दस्तावेज़ों में कहीं नहीं लिखा गया कि फैसला किस जज ने ड्राफ्ट किया।
“यही कोर्ट की आवाज है”—CJI गवई का संकेतबार एंड बेंच के अनुसार, प्रेसिडेंशियल रेफरेंस के निर्णय की घोषणा के बाद CJI गवई ने कहा:“यह फैसला कोर्ट के नाम से जाएगा… यह सर्वसम्मत निर्णय है। यही कोर्ट की आवाज है।”यह बयान केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक संकेत था—कि अदालत कुछ संवेदनशील, राजनीतिक रूप से गर्म विषयों पर व्यक्तिगत जजों के बजाय संस्थागत रूप में बोलना चाहती है।क्या यह पहली बार हुआ? नहीं—लेकिन बेहद दुर्लभजज का नाम न लिखना भारत की न्यायिक परंपरा में अपवाद है।ऐतिहासिक रूप से ऐसा केवल कुछ ही मौकों पर हुआ है।
सबसे चर्चित उदाहरण—2019 का अयोध्या फैसलारंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने फैसला तो सर्वसम्मति से दिया, लेकिन ऑथर जज का नाम नहीं बताया। बाद में न्यायिक हलकों में यह माना गया कि फैसले को जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने ड्राफ्ट किया था, पर आधिकारिक रूप से यह आज तक अनाम है।अब CJI गवई ने अपने अंतिम दिनों में यह परंपरा एक बार फिर दोहराई है।क्या सुप्रीम कोर्ट रूल्स 2013 इसकी अनुमति देते हैं?सुप्रीम कोर्ट रूल्स 2013 में कहीं भी यह अनिवार्य नहीं किया गया है कि किसी फैसले में लेखक जज का नाम दर्ज करना ज़रूरी है।लेकिन भारतीय न्यायपालिका में यह स्थापित परंपरा रही है कि जज अपना नाम लिखते हैं—यह जवाबदेही, पारदर्शिता और न्यायिक इतिहास का हिस्सा माना जाता है।बीते कुछ वर्षों में हालांकि एक बदलाव दिखा है।अब अदालतें कई मामलों को ऑथर जज की पहचान से नहीं, बल्कि केस टाइटल से याद करने की प्रवृत्ति अपना रही हैं।और यह संभव है कि CJI गवई ने इन दोनों संवेदनशील मामलों में यही विचार अपनाया—कि निर्णय व्यक्ति का नहीं, संस्था का होना चाहिए।
तो क्या यह नया न्यायिक दौर है?
न्यायिक विशेषज्ञों का मानना है कि—
जज का नाम न देना अदालत के “संस्थागत स्वर” को प्राथमिकता देने की नई सोच हो सकती है।
राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में जजों को व्यक्तिगत तौर पर निशाना बनाए जाने की प्रवृत्ति से बचाने का प्रयास भी हो सकता है।
और यह भी कि CJI गवई अपने अंतिम दिनों में फैसलों को विवाद से परे रखना चाहते हैं।जो भी हो, इतना तय है कि जिस तेज़ी और सामूहिकता के साथ सुप्रीम कोर्ट फैसले सुना रहा है, उससे यह रिटायरमेंट सप्ताह न्यायिक इतिहास में दर्ज हो जाएगा।
