बी के झा
NSK

पटना, 31 अक्टूबर
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के गर्म माहौल के बीच राजद (RJD) के कद्दावर नेता और दानापुर से प्रत्याशी रीतलाल यादव को पटना हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है।न्यायमूर्ति अरुण कुमार झा की एकलपीठ ने शुक्रवार को उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें रीतलाल यादव ने चुनाव प्रचार के लिए चार सप्ताह की औपबंधिक जमानत (provisional bail) की मांग की थी।
कोर्ट का सख्त रुख: “सक्षम न्यायालय जाएं”हाईकोर्ट ने साफ कहा कि आवेदक चाहे तो एमपी-एमएलए कोर्ट से राहत की गुहार लगा सकते हैं, पर हाईकोर्ट इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा।राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी.के. शाही ने कहा कि यह अर्जी सुनवाई योग्य नहीं है — “रीतलाल यादव सक्षम अदालत में जमानत की अर्जी दें।”इसके साथ ही अदालत ने यह साफ कर दिया कि अपराध के मामलों में बंद उम्मीदवारों को सिर्फ चुनाव प्रचार के नाम पर जेल से रिहाई नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ होगा।
जेल से नामांकन, पुलिस पहरे में प्रचार की गुहारगौरतलब है कि रीतलाल यादव पहले से भागलपुर जेल में बंद हैं। एमपी-एमएलए कोर्ट की अनुमति से उन्हें पुलिस सुरक्षा में दानापुर लाकर नामांकन दाखिल करने की अनुमति दी गई थी।नामांकन के बाद उन्हें फिर से जेल भेज दिया गया।अब उन्होंने हाईकोर्ट से चार सप्ताह के लिए बाहर आने की मांग की थी ताकि वे अपने विधानसभा क्षेत्र में चुनाव प्रचार कर सकें। लेकिन अदालत ने उनकी इस गुहार को ठुकरा दिया।
अपराध, राजनीति और कानून —
बिहार का पुराना सवालरीतलाल यादव का नाम बिहार की राजनीति में विवाद और प्रभाव दोनों के लिए जाना जाता है। दानापुर से वे पहले भी विधायक रह चुके हैं और कई आपराधिक मामलों में आरोपित हैं।इस पृष्ठभूमि के चलते यह मामला सिर्फ एक जमानत याचिका का नहीं, बल्कि “राजनीति में अपराध के प्रभाव” का प्रतीक बन गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार,
बिहार में कई ऐसे उम्मीदवार हैं जिनका आपराधिक रिकॉर्ड है। लेकिन जनता की ताकत और कानून की सख्ती, दोनों ही धीरे-धीरे ऐसे मामलों में फर्क दिखा रहे हैं।”
मतदाताओं का भरोसा बढ़ा: “अब कानून भी चुनावी मौसम में झुकता नहीं”हाईकोर्ट के इस फैसले को लेकर पटना और दानापुर के मतदाताओं के बीच कानून व्यवस्था पर भरोसा दिखा।
स्थानीय शिक्षाविद डॉ. अजय कुमार ने कहा —
पहली बार ऐसा लग रहा है कि अदालतें चुनावी दबाव से ऊपर उठकर काम कर रही हैं। कानून अब ‘चुनावी उम्मीदवार’ और ‘सामान्य आरोपी’ में फर्क नहीं कर रहा — यही असली लोकतंत्र की पहचान है।
एक युवा मतदाता ने कहा,अगर जेल में बंद लोग चुनाव प्रचार के लिए बाहर आने लगेंगे तो फिर कानून का डर खत्म हो जाएगा। हाईकोर्ट ने सही संदेश दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं।”
महागठबंधन के लिए असहज स्थिति
रीतलाल यादव की मुश्किलें राजद और महागठबंधन दोनों के लिए असहज स्थिति पैदा कर रही हैं।जहां एक ओर पार्टी उनके जनाधार पर भरोसा कर रही है, वहीं विरोधी खेमे ने इसे मुद्दा बना लिया है।भाजपा के एक प्रवक्ता ने टिप्पणी की —आरजेडी के नेता विकास नहीं, अपराध की राजनीति का चेहरा बन चुके हैं। जनता अब जाग चुकी है।”
निष्कर्ष:
न्याय का शिकंजा, राजनीति की परीक्षाबिहार की सियासत में अपराध और चुनावी गणित का रिश्ता पुराना है।
लेकिन हाईकोर्ट का यह आदेश यह संकेत देता है कि अब कानून के सामने ‘राजनीतिक रसूख’ की दाल गलना मुश्किल हो गया है।दानापुर की जनता यह देख रही है कि उनका प्रत्याशी जेल में बंद है, और अदालत ने उसे प्रचार के लिए बाहर आने की इजाजत नहीं दी।
यह फैसला न केवल रीतलाल यादव के लिए झटका है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक संदेश भी — कि अब न्याय व्यवस्था किसी भी ‘जनप्रिय उम्मीदवार’ से नहीं डरेगी।
