बी के झा
NSK


नई दिल्ली, 6 मार्च
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ते दबाव के बीच अमेरिका ने भारत को रूसी तेल खरीदने के मामले में अस्थायी राहत दे दी है। अमेरिकी प्रशासन ने भारतीय रिफाइनरियों को 30 दिनों के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति देने का फैसला किया है।यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब फारस की खाड़ी के रणनीतिक जलमार्ग Strait of Hormuz में बड़ी संख्या में तेल टैंकर फंसे होने की खबरें सामने आ रही हैं और वैश्विक बाजार में आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन और रणनीतिक कूटनीति से भी जुड़ा हुआ है।
क्यों बदला अमेरिका का रुख
दरअसल रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने रूस से तेल खरीदने पर कई तरह की पाबंदियां लगाई थीं और भारत सहित कई देशों पर अप्रत्यक्ष दबाव भी बनाया गया था।लेकिन अब अमेरिका ने खुद ही भारत को सीमित अवधि के लिए छूट देते हुए कहा है कि वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बनाए रखना जरूरी है।अमेरिकी वित्त मंत्री Scott Bessent ने मीडिया से बातचीत में कहा कि“यह छूट सिर्फ उन तेल कार्गो पर लागू होगी जो पहले से समुद्र में मौजूद हैं। इसका मकसद वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बनाए रखना है, न कि रूस को आर्थिक लाभ देना।”
होर्मुज संकट और वैश्विक बाजार
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz के लगभग अवरुद्ध होने की आशंका ने दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को अस्थिर कर दिया है।यह संकरा समुद्री मार्ग दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस व्यापार का मुख्य रास्ता माना जाता है। यदि इस मार्ग में व्यवधान आता है तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है।यही कारण है कि अमेरिका सहित कई देश आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए अस्थायी रणनीतिक फैसले ले रहे हैं।
भारत की ऊर्जा निर्भरता
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है।कच्चे तेल की लगभग 88 प्रतिशत आवश्यकता आयात से पूरी होती है प्राकृतिक गैस की लगभग 50 प्रतिशत जरूरत विदेशों से आती है इसलिए पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का तनाव भारत के ऊर्जा बाजार और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे या नहीं?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। कीमतें लगभग 84 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी हैं और यदि संघर्ष लंबा चलता है तो यह 90 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती हैं।हालांकि भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल इसका असर देश में पेट्रोल-डीजल के दामों पर नहीं पड़ेगा।सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त तेल और गैस भंडार मौजूद है और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत भी सक्रिय हैं।
वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की तलाश
भारत इस समय ऊर्जा सुरक्षा के लिए कई देशों के साथ बातचीत कर रहा है।सरकारी सूत्रों के अनुसार—अमेरिका से एलपीजी की आपूर्ति बढ़ाई जा रही हैऑस्ट्रेलिया और कनाडा ने गैस आपूर्ति की पेशकश की हैअंतरराष्ट्रीय संगठनों जैसे International Energy Agency और OPEC के साथ भी चर्चा जारी है इसके अलावा भारत समुद्री बीमा और आपूर्ति सुरक्षा को लेकर अमेरिकी एजेंसियों से भी संपर्क में है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक कूटनीति का हिस्सा है।दिल्ली के एक वरिष्ठ रणनीतिक विश्लेषक के अनुसार“अमेरिका जानता है कि भारत विश्व की सबसे बड़ी ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यदि भारत को आपूर्ति संकट का सामना करना पड़ता है तो वैश्विक बाजार पर भी इसका असर पड़ेगा।”
अर्थशास्त्रियों की प्रतिक्रिया
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऊर्जा बाजार में स्थिरता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है।एक वरिष्ठ अर्थशास्त्री के अनुसार“यदि तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो इसका असर महंगाई, परिवहन लागत और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ सकता है। इसलिए भारत का विविध स्रोतों से तेल खरीदना रणनीतिक रूप से सही कदम है।
”कानूनविदों की नजर
अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह छूट अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के ढांचे में दी गई एक सीमित और अस्थायी अनुमति है।उनके अनुसार इस प्रकार की छूट आम तौर पर वैश्विक आपूर्ति संकट की स्थिति में दी जाती है ताकि बाजार में अस्थिरता न बढ़े।
विपक्ष का सवाल
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार से पारदर्शिता की मांग की है।कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार को देश की ऊर्जा नीति और आयात रणनीति पर संसद में विस्तृत जानकारी देनी चाहिए ताकि भविष्य में संभावित संकट से निपटने की स्पष्ट योजना सामने आ सके।
ऊर्जा सुरक्षा की बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि रणनीतिक और भू-राजनीतिक चुनौती भी है।भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ता देश के लिए यह जरूरी है कि वह—आयात स्रोतों का विविधीकरण करेवैकल्पिक ऊर्जा पर निवेश बढ़ाएऔर वैश्विक ऊर्जा कूटनीति में सक्रिय भूमिका निभाए
आगे क्या
फिलहाल अमेरिका की 30 दिन की छूट से भारत को तत्काल राहत मिल सकती है। लेकिन पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता को देखते हुए ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में भारत की ऊर्जा नीति, वैश्विक कूटनीति और बाजार रणनीति तीनों मिलकर तय करेंगे कि देश इस संकट से कितनी मजबूती के साथ बाहर निकलता है।
