बी के झा
NSK

बगहा/गोरखपुर , 25 जनवरी
यह कहानी किसी अपराध कथा की पटकथा नहीं है—यह एक छठी कक्षा की छात्रा की सच्ची आपबीती है,जो बताती है कि अगर पुलिस समय पर सुने,तो शायद एक बच्ची छह महीने तक नरक न झेले।बिहार के बगहा से 25 जुलाई 2025 को अगवा की गई नाबालिग छात्रा आखिरकार गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) में मिली, लेकिन इस दौरान उसके साथ जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया है। दुष्कर्म, मारपीट, बिक्री, धमकी और मानसिक यातना—यह सब तब होता रहा, जब दिव्यांग मां और मजदूर पिता थाने के चक्कर काटते रहे।
गांव का बुजुर्ग बना सौदागर, बेटी को बेचा गया
पीड़िता के बयान के मुताबिक,गांव के ही एक बुजुर्ग ने उसे चाय पिलाई, जिसके बाद वह बेहोश हो गई। होश आया तो खुद को दूसरे राज्य में पाया।“वे लोग कह रहे थे—हम हल्द्वानी में हैं। वहां असलम खां था। उसने मुझे पीटा, गलत काम किया। फिर मुझे कहीं और ले जाकर बेच दिया।”बाद में उसे गोरखपुर के गोला थाना क्षेत्र में एक अन्य व्यक्ति को सौंप दिया गया। अपराधियों के बीच बातचीत चल रही थी कि लड़की की खबर अखबारों में छप गई है और पुलिस दबाव बढ़ा रही है। इसी डर ने अंततः अपराधियों को ढीला किया—और बच्ची को भागने का मौका मिला।
एक डॉक्टर ने निभाई इंसानियत, पुलिस ने निभाई ड्यूटी (देर से)
भागकर एक क्लीनिक पहुंची बच्ची को महिला डॉक्टर ने देखा और 112 पर कॉल किया। पुलिस पहुंची—और यहीं से वह कहानी खत्म होती है, जो छह महीने पहले खत्म हो जानी चाहिए थी।विडंबना यह है कि जिस पुलिस को पहले दिन सक्रिय होना था, वह तब सक्रिय हुई जब मीडिया में खबर छपी।
दिव्यांग मां की पुकार, पुलिस की चुप्पी
पीड़िता की मां आंखों से दिव्यांग हैं। पिता दिहाड़ी मजदूर।मां बार-बार भैरोगंज थाना जाती रहीं और कहती रहीं—“गांव के उसी बुजुर्ग ने मेरी बेटी को अगवा किया है।”लेकिन पुलिस ने न तो गंभीरता से लिया, न ही समय पर कार्रवाई की।25 नवंबर 2025 को जब ‘हिन्दुस्तान’ अखबार में खबर छपी—“चार माह से नहीं मिली लापता बेटी, पुलिस की सुस्ती से परिजन हताश”तब जाकर सिस्टम हरकत में आया।
कानूनी नजरिया: यह सिर्फ लापरवाही नहीं, आपराधिक चूक है पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कुमार कहते हैं—“नाबालिग के अपहरण, मानव तस्करी और बलात्कार में पुलिस की निष्क्रियता IPC और BNS के तहत दंडनीय है। यह ‘ड्यूटी में घोर लापरवाही’ का मामला बनता है।”उनके अनुसार, इस केस में POCSO मानव तस्करी कानूनआईटी व अंतरराज्यीय अपराध सभी धाराएँ लागू होती हैं, साथ ही पुलिस अधिकारियों की भूमिका की भी न्यायिक जांच होनी चाहिए।
शिक्षाविदों की चिंता: स्कूल जाना भी जोखिम बन गया
वरिष्ठ शिक्षाविद डॉ. सीमा सिन्हा कहती हैं—“जब कोचिंग जाने वाली बच्चियां सुरक्षित नहीं हैं, तो यह सिर्फ कानून व्यवस्था का नहीं, शिक्षा व्यवस्था का भी संकट है। माता-पिता डर के मारे बच्चियों को पढ़ाना बंद कर देंगे।
”राजनीति गरमाई: विपक्ष का सरकार पर सीधा हमला
राजद प्रवक्ता कंचना यादव ने कहा—“जेडीयू-बीजेपी शासन में बिहार की बेटियाँ असुरक्षित हैं। शराब माफिया, भूमाफिया और सरकार-प्रशिक्षित गुंडे फल-फूल रहे हैं। यह सुशासन नहीं, संगठित अराजकता है।”
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. रविकांत शुक्ला कहते हैं—“यह घटना साबित करती है कि महिला सुरक्षा सिर्फ चुनावी नारा बनकर रह गई है। जब गरीब और दिव्यांग मां की आवाज नहीं सुनी जाती, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है।”
सरकार का पक्ष: कार्रवाई का भरोसा
एसडीपीओ बगहा कुमार देवेंद्र ने कहा—“छात्रा की बरामदगी के बाद AHTU को भेजा गया है। दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।”लेकिन सवाल यही है—क्या दोषियों में वे पुलिसकर्मी भी शामिल होंगे, जिन्होंने छह महीने तक आंख मूंदे रखी?
समाजसेवियों की मांग: सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, संरक्षण चाहिए बाल अधिकार कार्यकर्ता पूजा वर्मा का कहना है—“पीड़िता को सिर्फ घर पहुंचाना काफी नहीं। उसे काउंसलिंग, शिक्षा सुरक्षा और गवाह संरक्षण देना होगा।
निष्कर्ष:
यह अपराधियों की नहीं, सिस्टम की हार हैअगरगांव का बुजुर्ग बच्ची को बेच सकता है,अपराधी उसे राज्य दर राज्य घुमा सकते हैं,और मां की चीख पुलिस तक नहीं पहुंचती—
तो यह कानून की नहीं, सत्ता की विफलता है।बिहार की यह बेटी बच गई—
लेकिन सवाल यह है किअगली बेटी को कौन बचाएगा?
