लखनऊ की सियासत में ‘सहभोज’ का संदेश: ब्राह्मण विधायकों का जुटान, अंदरखाने की चिंता और यूपी राजनीति के नए संकेत

बी के झा

लखनऊ, 24 दिसंबर

उत्तर प्रदेश विधानसभा का सत्र भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन उसके साथ ही सूबे की राजनीति में एक नई बहस ने जन्म ले लिया है। इस बार चर्चा का केंद्र कोई विधेयक या भाषण नहीं, बल्कि भाजपा के ब्राह्मण विधायकों का सहभोज और अनौपचारिक जुटान है। सत्ता पक्ष इसे सामान्य सामाजिक मेल-मिलाप बता रहा है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे 2027 की तैयारी, जातीय संतुलन और भीतर असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है।पिछले सत्र में ‘कुटुंब’ के नाम से ठाकुर विधायकों का एक साथ दिखना अभी स्मृति में ही था कि अब ब्राह्मण विधायकों के इस जमावड़े ने कयासों को और हवा दे दी है।

बैठक में क्या हुआ?

भाजपा विधायक क्या कहते हैं इस सहभोज में शामिल रहे भाजपा विधायक अनिल त्रिपाठी और रमेश मिश्रा ने राजनीतिक अटकलों को खारिज करने की कोशिश की।अनिल त्रिपाठी ने कहा—“बैठक में समाज को लेकर चर्चा हुई। ब्राह्मण समाज ने देश की आज़ादी से लेकर शिक्षा के क्षेत्र तक त्याग और बलिदान दिया है। इसके बावजूद बार-बार इस समाज को अपमानित करने की कोशिश होती है, उसी पीड़ा पर बातचीत हुई।”वहीं विधायक रमेश मिश्रा ने इसे पूरी तरह राजनीतिक निष्ठा से जोड़ते हुए कहा—“हमारे समाज का एक-एक वोटर भाजपा के साथ रहा है। हमने संकल्प लिया है कि 2027 में भी भाजपा को पूरी ताकत से समर्थन देंगे।”इन बयानों से यह साफ है कि बैठक को भले ही ‘सामाजिक’ बताया जा रहा हो, लेकिन चुनावी गणित और प्रतिनिधित्व की चिंता इसके केंद्र में रही।

सीएम योगी के करीबी और फिर भी सवाल क्यों?

राजनीति के जानकार इस बात पर भी ध्यान दिला रहे हैं कि इस बैठक में शामिल अधिकांश विधायक मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के करीबी माने जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर सब कुछ संतोषजनक है, तो फिर अलग-अलग सामाजिक समूहों के स्तर पर ऐसे जुटान क्यों?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—“यह असंतोष नहीं, बल्कि पहचान की पुनः पुष्टि का प्रयास भी हो सकता है। भाजपा की राजनीति व्यापक सामाजिक गठबंधन पर टिकी है, लेकिन हर वर्ग चाहता है कि उसकी आवाज सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचे।”डिप्टी सीएम केशव मौर्य का ‘डैमेज कंट्रोल’जब इस जुटान को लेकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ कहा—

“विधानसभा सत्र के दौरान विधायकों का मिलना-जुलना स्वाभाविक है। इसे अलग चश्मे से देखना ठीक नहीं। मेल-जोल में कोई बुराई नहीं है।”हालांकि उनका यह बयान आग बुझाने जैसा था, लेकिन राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इतनी सफाई की जरूरत खुद सवालों को जन्म देती है।

ओमप्रकाश राजभर का तंज:

सपा पर सीधा वार एनडीए सहयोगी और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने इस मुद्दे को विपक्ष की ओर मोड़ते हुए तंज कसा।उन्होंने कहा—“जब सपा की सरकार थी, तब ब्राह्मणों को कौन से हक मिल गए थे? परशुराम जी की मूर्ति लगा दी, लेकिन झांकने तक नहीं गए। जयंती पर एक ट्वीट तक नहीं किया।”जब उनसे पूछा गया कि क्या ओबीसी विधायकों का भी ऐसा जुटान होगा, तो राजभर ने जवाब दिया—“

ओबीसी तो संतुष्ट हैं, उन्हें जुटान की जरूरत ही क्या है।”राजभर का यह बयान साफ संकेत देता है कि एनडीए के भीतर भी जातीय संतुलन और संतोष का अपना-अपना नजरिया है।

विपक्ष का आरोप: सरकार के भीतर बेचैनी

समाजवादी पार्टी ने इस पूरे घटनाक्रम को भाजपा के अंदरूनी असंतोष से जोड़ दिया है। सपा नेता संग्राम यादव ने कहा—“जनता सरकार से नाराज है। सीएम विधायकों और जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुन रहे। इसलिए भाजपा के अंदर बैठकों पर बैठकें हो रही हैं। आगे और भी ऐसी बैठकें सामने आएंगी।”विपक्ष का दावा है कि यह जुटान सत्ता के केंद्रीकरण और संवादहीनता का परिणाम है।

ब्राह्मण समाज के बुद्धिजीवी क्या कहते हैं

वरिष्ठ ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति भी है।एक वरिष्ठ सामाजिक विचारक के अनुसार—“ब्राह्मण समाज सत्ता की मांग नहीं करता, बल्कि सम्मान और भागीदारी की अपेक्षा करता है। जब संवाद कमजोर पड़ता है, तो ऐसे मंच बनते हैं।

”हिन्दू संगठन और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया

कुछ हिन्दू संगठनों ने इसे समाज के भीतर संवाद का सकारात्मक प्रयास बताया।एक प्रमुख धर्मगुरु ने कहा—“हिन्दू समाज विविधताओं से बना है। आपसी संवाद से ही संतुलन बनता है। इसे विभाजन की नजर से देखना ठीक नहीं।

”राजनीतिक विश्लेषण: संकेत क्या हैं?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस जुटान से तीन संकेत उभरते हैं—2027 चुनाव की आहट अब भीतरखाने तेज हो चुकी है भाजपा के भीतर विभिन्न सामाजिक समूह अपनी पहचान और भूमिका स्पष्ट करना चाहते हैं विपक्ष इस हर हलचल को असंतोष की कहानी में बदलने की कोशिश करेगा

निष्कर्ष:

सहभोज से आगे की राजनीति लखनऊ का यह सहभोज भले ही औपचारिक तौर पर सामाजिक मेल-जोल बताया जाए, लेकिन यूपी की राजनीति में कुछ भी पूरी तरह निरापद नहीं होता।यह जुटान इस बात का संकेत है कि—सत्ता में रहते हुए भी समाज और प्रतिनिधित्व की राजनीति जीवित रहती है।

अब देखना यह है कि यह चर्चा सिर्फ सहभोज तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में नई राजनीतिक रणनीतियों का आधार बनती है।

NSK

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