बी के झा
नई दिल्ली, 16 दिसंबर
‘लव जिहाद’ और कथित अनैतिक धर्मांतरण को लेकर बने कानून एक बार फिर देश की संवैधानिक, सामाजिक और राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों पर सीधा और तीखा सवाल दागते हुए राज्यों से कहा है—“
तीन हफ्तों में बताइए कि आखिर इन कानूनों की जरूरत क्या है?”
यह टिप्पणी न केवल राज्यों के लिए चुनौती है, बल्कि उस पूरी राजनीति के लिए भी, जो इन कानूनों को सामाजिक सुरक्षा तो विरोधी इन्हें व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला बता रहे हैं।28 जनवरी को निर्णायक सुनवाई उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात सहित कई राज्यों में लागू ‘लव जिहाद’ और धर्मांतरण विरोधी कानूनों को चुनौती देने वाली याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में पहले से लंबित हैं।
इसी बीच अखिल भारतीय पसमांदा मुस्लिम मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष जावेद मलिक ने इन कानूनों के समर्थन में याचिका दाखिल कर बहस को नया मोड़ दे दिया।हालांकि, उनकी याचिका पर फिलहाल सुनवाई टाल दी गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ किया कि—जनवरी के तीसरे सप्ताह में इस मामले की अंतिम सुनवाई होगी और जावेद मलिक की याचिका भी अन्य याचिकाओं के साथ सुनी जाएगी।कानून के पक्ष में: ‘जबरन धर्मांतरण से सुरक्षा’जावेद मलिक की याचिका में कहा गया है कि—ये कानून गरीब, पिछड़े और कमजोर तबकों को धोखे और दबाव में किए जाने वाले धर्मांतरण से बचाने के लिए जरूरी हैंसमाज में शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए राज्य का हस्तक्षेप आवश्यक है
हिंदू संगठनों की प्रतिक्रिया
विहिप और अन्य हिंदू संगठनों से जुड़े नेताओं का कहना है—लव जिहाद कोई कल्पना नहीं, ज़मीनी हकीकत है। कानून न हो तो बेटियों की सुरक्षा कैसे होगी?”एक वरिष्ठ हिंदू धर्मगुरु का मत—
यह धर्म का नहीं, नारी सम्मान और सामाजिक मर्यादा का प्रश्न है। कानून जरूरी है, लेकिन उसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।”विरोध की आवाज़: ‘निजी आज़ादी पर चोट’दूसरी ओर, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस और कई नागरिक संगठनों ने इन कानूनों को संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताया है।उनका तर्क है—ये कानून अंतर-धार्मिक प्रेम और विवाह को अपराध की तरह देखते हैं
पुलिस और प्रशासन को निजी जीवन में दखल का खुला अधिकार मिल जाता हैबेवजह गिरफ्तारी और सामाजिक उत्पीड़न बढ़ता है
मुस्लिम धर्मगुरुओं की रायएक वरिष्ठ मुस्लिम धर्मगुरु ने कहा—इस्लाम जबरन धर्मांतरण की इजाजत नहीं देता। लेकिन इन कानूनों की आड़ में पूरे समुदाय को शक के घेरे में रखा जा रहा है।”
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
संवैधानिक मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता अरविंद कुमार सिंह मानते हैं कि—राज्य को जबरन धर्मांतरण रोकने का अधिकार है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मौजूदा कानून आवश्यक और अनुपातिक (proportionate) हैं?”
उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट तीन बिंदुओं पर गौर करेगा—
1. क्या मौजूदा आपराधिक कानून पर्याप्त नहीं थे?
2. क्या यह कानून व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक आज़ादी का अतिक्रमण करता है?
3. क्या कानून के दुरुपयोग से बचाव के पर्याप्त सुरक्षा उपाय हैं?
विपक्ष का हमला: ‘
राजनीतिक ध्रुवीकरण का औज़ार’कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और वाम दलों ने इन कानूनों को चुनावी राजनीति से प्रेरित बताया।एक विपक्षी नेता का कहना—सरकार महंगाई, बेरोजगारी से ध्यान हटाने के लिए समाज को बांटने वाले कानून ला रही है।”
राजनीतिक विश्लेषण:
फैसला दूरगामी होगाराजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला—राज्यों की कानून बनाने की शक्ति नागरिकों की निजी स्वतंत्रताऔर धर्म बनाम संविधान की बहस—तीनों को नई दिशा देगा
एक वरिष्ठ विश्लेषक कहते हैं—यह मामला सिर्फ लव जिहाद का नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि लोकतंत्र में राज्य व्यक्ति के जीवन में कहां तक दखल दे सकता है
निष्कर्ष:
संविधान बनाम सामाजिक नैरेटिवतीन हफ्तों में राज्यों को जवाब देना है—क्या ‘लव जिहाद’ कानून वास्तव में ज़रूरी हैं, या यह डर और राजनीति से उपजे क़ानून हैं?28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई केवल कानूनी फैसला नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी किभारत में प्रेम, विश्वास और स्वतंत्रता की सीमा कौन तय करेगा—
राज्य या संविधान।देश की निगाहें अब सर्वोच्च अदालत पर टिकी हैं।
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