बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 10 फरवरी
लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सदन में उपस्थित न होने को लेकर उठा विवाद अब सियासी आरोप–प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संसदीय सुरक्षा और मर्यादा की बहस में तब्दील हो गया है। विपक्षी नेताओं के इस दावे को कि “प्रधानमंत्री को कोई खतरा नहीं था”, लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने तथ्यों से परे और भ्रामक करार दिया है।सोमवार को आए इस स्पष्टीकरण ने यह साफ कर दिया कि मामला केवल एक राजनीतिक बयान का नहीं, बल्कि उस दिन सदन में पैदा हुई अभूतपूर्व अव्यवस्था और संभावित अप्रत्याशित स्थितियों का था।
क्या सचमुच कोई खतरा नहीं था?
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से कहा था कि“प्रधानमंत्री पर सदन में किसी विपक्षी सदस्य द्वारा हमला करने का सवाल ही नहीं उठता।”उन्होंने यह भी कहा कि अगर किसी ने ऐसा कहा भी हो, तो एफआईआर दर्ज कर तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए।लेकिन लोकसभा सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि“उस दिन सदन के हालात ऐसे थे कि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता था।”सूत्रों के मुताबिक, अध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह को संदर्भ से काटकर देखा जा रहा है, जबकि इसे उस दिन की अव्यवस्था की पृष्ठभूमि में समझना जरूरी है।
सदन के भीतर क्या हुआ था?
सूत्रों के अनुसार:कार्यवाही शुरू होते ही माहौल बिगड़ने लगा कई विपक्षी सांसद आसन के निकट पहुंच गए सरकारी दस्तावेज फाड़कर पीठासीन सभापति की ओर फेंके गए स्थापित संसदीय मर्यादाओं की खुलेआम अवहेलना हुई इसे लोकसभा के इतिहास की“सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और अवांछनीय घटनाओं में से एक”बताया गया।
महिला सांसदों के आचरण पर भी चिंता
लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने एक संवेदनशील बिंदु पर भी ध्यान दिलाया। उनके अनुसार:कुछ महिला सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर आक्रामक ढंग से बढ़ीं सीट के चारों ओर घेरा बना लिया गया बैनर और तख्तियों के साथ सत्तापक्ष की दीर्घा की ओर बढ़ा गया वरिष्ठ मंत्रियों के बैठने की जगह तक पहुंच बनाई गई सूत्रों के अनुसार इससे
सदन में असुरक्षा की भावना
और टकराव की आशंका और अधिक बढ़ गई।अध्यक्ष कक्ष में भी तीखा टकराव घटनाक्रम यहीं नहीं रुका। उसी दिन विपक्षी सांसदों ने
लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष का रुख किया
असंसदीय भाषा का प्रयोग किया
“देखते हैं पीएम का क्या करते हैं” जैसे कथित धमकी भरे वाक्य बोले सूत्रों के अनुसार यह आचरण“माननीय सांसदों के लिए पूरी तरह अनुचित”था और स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
राजनीतिक विश्लेषक: ‘यह शक्ति प्रदर्शन था, बहस नहीं’
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि“यह घटना विपक्ष की असहमति से ज्यादा, शक्ति प्रदर्शन में बदल गई थी।”एक विश्लेषक कहते हैं:“जब सदन की मर्यादा टूटती है, तो सुरक्षा चिंता बन जाती है। यहां मुद्दा हमला होने का नहीं, हालात के बेकाबू होने का था।”उनका कहना है कि प्रधानमंत्री की सुरक्षा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि
संवैधानिक
संस्थागत
और राष्ट्रीय महत्वका विषय है।
कानूनविदों की राय: ‘अध्यक्ष का फैसला संवैधानिक
’संवैधानिक कानून के जानकारों के अनुसार:सदन की व्यवस्था बनाए रखना सदस्यों की सुरक्षा सुनिश्चित करनाऔर लोकतांत्रिक गरिमा की रक्षा लोकसभा अध्यक्ष का संवैधानिक दायित्व है।एक वरिष्ठ कानूनविद कहते हैं:“अगर अध्यक्ष को लगता है कि हालात अनियंत्रित हो सकते हैं, तो प्रधानमंत्री को सदन में न आने की सलाह देना पूरी तरह वैध और विवेकपूर्ण कदम है।”
विपक्ष का प्रतिवाद: ‘सरकार बहाना बना रही’
विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार असहमति से घबरा रही है सदन में बहस से बचने के लिए सुरक्षा का तर्क दिया जा रहा है एक विपक्षी नेता ने कहा:“लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है। उसे खतरे से जोड़ना दुर्भाग्यपूर्ण है।
”शिक्षाविदों की टिप्पणी:
‘संसद की गिरती संस्कृति’एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने कहा:“यह विवाद बताता है कि संसद संवाद का मंच कम और टकराव का अखाड़ा ज्यादा बनती जा रही है।”उनके अनुसार:न सत्ता आत्ममंथन कर रहीन विपक्ष संयम दिखा रहाऔर नुकसान लोकतंत्र का हो रहा है
निष्कर्ष:
सवाल खतरे का नहीं, मर्यादा का
यह बहस इस बात पर आकर टिकती है किक्या सदन में शांति बनाए रखना प्राथमिकता है?
क्या असहमति की भी एक सीमा होती है?
और क्या सुरक्षा चिंता को राजनीति का हथियार बनाया जा सकता है?
लोकसभा सचिवालय का स्पष्टीकरण एक बात साफ करता है —प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति डर नहीं, बल्कि संसदीय व्यवस्था बचाने का प्रयास थी।लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जब संसद में संवाद की जगह शोर ले ले,तो लोकतंत्र खुद खतरे में आ जाता है।
