वैशाली की पगडंडियों पर विश्व शांति का पदचिन्ह 26 देशों के बौद्ध भिक्षुओं ने दिया करुणा–मैत्री का संदेश

बी के झा

वैशाली ( बिहार ) 23 दिसंबर

सोमवार की सुबह वैशाली की धरती ने एक ऐसा दृश्य देखा, जो इतिहास, अध्यात्म और मानवीय एकता—तीनों का सजीव प्रतीक बन गया। कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल सहित 26 देशों से आए बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियाँ जब खेतों की पगडंडियों से होकर वीरपुर गांव की ओर बढ़े, तो ऐसा लगा मानो बुद्ध की करुणा स्वयं धरती पर उतर आई हो।

वैशाली—जहां भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण क्षण बिताए—एक बार फिर विश्व शांति और मैत्री का अंतरराष्ट्रीय केंद्र बन उठा।प्रभातफेरी से गूंजा करुणा का स्वर महापरिनिर्वाण दिवस के पावन अवसर पर सुबह-सवेरे धर्म जागरण प्रभातफेरी का आयोजन किया गया। यह प्रभातफेरी कोल्हुआ से बखरा गांव तक निकाली गई, जिसमें बौद्ध भिक्षु–भिक्षुणियों के शांत स्वर, प्रार्थनाएं और करुणा के संदेश वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भरते चले गए।श्वेत वस्त्रों में सजी भिक्षुणियां, पीतवस्त्र धारण किए भिक्षु और उनके साथ कदमताल करते श्रद्धालु—

यह दृश्य न केवल मनोहारी था, बल्कि वैशाली की उस विरासत की याद दिला रहा था, जिसने पूरी दुनिया को अहिंसा और शांति का मार्ग दिखाया। पगडंडियों से महाप्रजापति गौतमी टीला तक प्रभातफेरी के बाद सभी अनुयायी वीरपुर गांव पहुंचे और वहां से गांव की कच्ची पगडंडी सड़क पर चलते हुए महाप्रजापति गौतमी टीला तक गए। खेतों के बीच से गुजरती यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और आध्यात्मिक यात्रा भी थी।

टीला पर स्थित प्राचीन वट वृक्ष के समक्ष सभी भिक्षु–भिक्षुणियों ने नमन किया और विधिवत पूजा-अर्चना संपन्न हुई। इसके बाद भगवान बुद्ध की प्रतिमा स्थापित कर ध्यान, तपस्या और सामूहिक प्रार्थना का आयोजन किया गया।

महाप्रजापति गौतमी का स्मरण:

नारी सशक्तिकरण की जड़ें इस अवसर पर बौद्ध भिक्षुओं और विदुषी भिक्षुणियों ने महाप्रजापति गौतमी के त्याग, तप और ऐतिहासिक योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।उन्होंने बताया कि—“

महाप्रजापति गौतमी न केवल भगवान बुद्ध की धात्री थीं, बल्कि उन्होंने ही महिलाओं के लिए बौद्ध संघ का द्वार खोला। यह विश्व इतिहास में नारी सशक्तिकरण का पहला संगठित आध्यात्मिक प्रयास था।”उनकी कथा सुनते हुए उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर दिखे।अंतरराष्ट्रीय अतिथियों का सम्मानआयोजन समिति की ओर से सभी विदेशी भिक्षु–भिक्षुणियों को भगवान बुद्ध की प्रतिमा,अंगवस्त्र,एवं स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी, मुजफ्फरपुर – सुष्मिता कुमारी झा,प्रो. डॉ. रामनरेश यादव,स्थानीय बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे।

वैशाली: वैश्विक बौद्ध विरासत का जीवंत केंद्र कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि वैशाली केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि जीवित बौद्ध विरासत है।

आज भी—एशिया के अनेक देशों के बौद्ध मठ यहां स्थापित हैं वर्ष भर अंतरराष्ट्रीय श्रद्धालु यहां आते हैं और ऐसे आयोजनों से बौद्ध पर्यटन को नई दिशा मिल रही है स्थानीय लोगों में इस आयोजन को लेकर गौरव और उत्साह साफ झलक रहा था।

निष्कर्ष:

शांति का वैश्विक संदेश, बिहार की धरती से 26 देशों के बौद्ध भिक्षुओं की यह पदयात्रा और प्रार्थना केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं थी।

यह—युद्ध, हिंसा और असहिष्णुता से जूझती दुनिया को करुणा, संवाद और सह-अस्तित्व का मौन लेकिन सशक्त संदेश थी।वैशाली की पगडंडियों पर चलते ये भिक्षु यह याद दिला गए कि शांति का रास्ता अभी भी खुला है—

बस उसे चुनने की जरूरत है।

NSK

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