बी के झा
नई दिल्ली/वॉशिंगटन, 24 दिसंबर
एशिया की बदलती भू-राजनीतिक तस्वीर ने अब अमेरिका की चिंता साफ तौर पर उजागर कर दी है। चीन, रूस और भारत—तीनों एशियाई शक्तियों के बीच संतुलन और समीपता को लेकर वॉशिंगटन में रणनीतिक हलचल तेज है। इसी कड़ी में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने चीन से जुड़े खतरों पर करीब 100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत को विशेष रूप से चीन की “दोहरी रणनीति” के प्रति आगाह किया गया है।रिपोर्ट का लहजा कूटनीतिक होने के बावजूद संदेश स्पष्ट है—सीमा पर शांति का प्रदर्शन, लेकिन रणनीति में दबाव और घेराबंदी।
LAC पर शांति, भीतरखाने रणनीतिक खेलअमेरिकी रिपोर्ट में माना गया है कि बीते महीनों में भारत-चीन सीमा (LAC) पर तनाव अपेक्षाकृत कम हुआ है। लेकिन पेंटागन का आकलन है कि यह शांति स्थायी विश्वास का संकेत नहीं, बल्कि चीन की रणनीतिक मजबूरी है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—“चीन इस समय भारत के साथ सीधे टकराव से बचना चाहता है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह अमेरिका के रणनीतिक खेमे में चला जाए।”रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन की कोशिश है कि भारत-अमेरिका रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक साझेदारी को सीमित रखा जाए।
अरुणाचल प्रदेश: संप्रभुता पर सीधी चुनौती रिपोर्ट का सबसे संवेदनशील और भारत के लिए गंभीर हिस्सा अरुणाचल प्रदेश से जुड़ा है।पेंटागन के अनुसार, चीन अरुणाचल को—ताइवान दक्षिण चीन सागर जैसे “कोर इंटरेस्ट” की श्रेणी में रखता है। इसका अर्थ है कि बीजिंग इस मुद्दे पर समझौते की कोई गुंजाइश नहीं देखता।अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का कहना है—“
किसी क्षेत्र को ‘कोर इंटरेस्ट’ घोषित करना कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि रणनीतिक चेतावनी होती है। यह भारत की संप्रभुता पर सीधा आघात है।”चीन-पाकिस्तान गठजोड़: अप्रत्यक्ष दबाव की नीतिअमेरिकी रिपोर्ट में चीन और पाकिस्तान के सैन्य गठजोड़ को लेकर भी भारत को सचेत किया गया है।रिपोर्ट के मुताबिक—2020 के बाद से पाकिस्तान को 36 J-10C लड़ाकू विमान संयुक्त रूप से विकसित JF-17 फाइटर जेट ड्रोन, नौसैनिक जहाज और अन्य उन्नत हथियार मुहैया कराए गए हैं।
रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं—“यह चीन की प्रॉक्सी रणनीति है—भारत पर सीधे हमला नहीं, बल्कि पाकिस्तान के जरिए सैन्य संतुलन बिगाड़ने की कोशिश।”अमेरिका की चिंता: भारत-अमेरिका रिश्ते निशाने पर रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि चीन का लक्ष्य भारत को अमेरिका से दूर रखना है।अमेरिकी रणनीतिकारों के अनुसार—“अगर भारत और अमेरिका के रिश्ते गहरे होते हैं, तो इंडो-पैसिफिक में चीन की रणनीतिक बढ़त को गंभीर चुनौती मिलेगी।”यही वजह है कि चीन एक तरफ सीमा पर बातचीत और शांति की बात करता है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को हथियारों से लैस करता है और अरुणाचल जैसे मुद्दों पर दबाव बनाए रखता है।
भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का रुख
सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि—“भारत अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से तय करता है। किसी तीसरे देश के आकलन के आधार पर नहीं।”रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है—“LAC पर शांति बनाए रखने के साथ-साथ भारत अपनी सैन्य तैयारी और निगरानी क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।
”राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
विपक्षी दलों ने सरकार से पारदर्शिता की मांग की है।एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा—“अगर चीन दोहरी नीति अपना रहा है, तो सरकार को संसद और देश को यह बताना चाहिए कि दीर्घकालिक रणनीति क्या है।”हालांकि अधिकांश दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीतिक एकता की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
शिक्षाविद और रणनीतिक चिंतक क्या कहते हैंअंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविद मानते हैं कि यह रिपोर्ट भारत के लिए अवसर भी है और चेतावनी भी।एक वरिष्ठ प्रोफेसर के अनुसार—“भारत को न तो अमेरिका की चिंता को आंख मूंदकर स्वीकार करना चाहिए और न ही चीन की शांति को अंतिम सत्य मानना चाहिए। संतुलन ही भारत की ताकत है।
”निष्कर्ष:
सतर्कता ही नीति पेंटागन की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ती है—LAC पर शांति अस्थायी हो सकती है चीन की रणनीति बहुस्तरीय और दीर्घकालिक हैं-पाकिस्तान उस रणनीति का अहम मोहरा बना हुआ है भारत के लिए चुनौती यह नहीं कि वह किसके साथ खड़ा है, बल्कि यह है कि—
वह अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे सुरक्षित रखता है।एशिया की इस बड़ी शतरंज में अमेरिका की चेतावनी और चीन की चाल—दोनों के बीच भारत को वॉशिंगटन की बढ़ती बेचैनी:
भारत–चीन समीकरण पर अमेरिकी चेतावनी, ‘दोस्ती का मुखौटा, दबाव की रणनीति’नई दिल्ली/वॉशिंगटन।एशिया की बदलती भू-राजनीतिक तस्वीर ने अब अमेरिका की चिंता साफ तौर पर उजागर कर दी है। चीन, रूस और भारत—तीनों एशियाई शक्तियों के बीच संतुलन और समीपता को लेकर वॉशिंगटन में रणनीतिक हलचल तेज है। इसी कड़ी में अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) ने चीन से जुड़े खतरों पर करीब 100 पन्नों की विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें भारत को विशेष रूप से चीन की “दोहरी रणनीति” के प्रति आगाह किया गया है।रिपोर्ट का लहजा कूटनीतिक होने के बावजूद संदेश स्पष्ट है—सीमा पर शांति का प्रदर्शन, लेकिन रणनीति में दबाव और घेराबंदी।LAC पर शांति, भीतरखाने रणनीतिक खेलअमेरिकी रिपोर्ट में माना गया है कि बीते महीनों में भारत-चीन सीमा (LAC) पर तनाव अपेक्षाकृत कम हुआ है। लेकिन पेंटागन का आकलन है कि यह शांति स्थायी विश्वास का संकेत नहीं, बल्कि चीन की रणनीतिक मजबूरी है।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार—“चीन इस समय भारत के साथ सीधे टकराव से बचना चाहता है, क्योंकि वह नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह अमेरिका के रणनीतिक खेमे में चला जाए।”रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चीन की कोशिश है कि भारत-अमेरिका रक्षा, तकनीक और इंडो-पैसिफिक साझेदारी को सीमित रखा जाए।अरुणाचल प्रदेश: संप्रभुता पर सीधी चुनौतीरिपोर्ट का सबसे संवेदनशील और भारत के लिए गंभीर हिस्सा अरुणाचल प्रदेश से जुड़ा है।पेंटागन के अनुसार, चीन अरुणाचल को—ताइवानदक्षिण चीन सागरजैसे “कोर इंटरेस्ट” की श्रेणी में रखता है। इसका अर्थ है कि बीजिंग इस मुद्दे पर समझौते की कोई गुंजाइश नहीं देखता।अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञों का कहना है—“किसी क्षेत्र को ‘कोर इंटरेस्ट’ घोषित करना कूटनीतिक भाषा नहीं, बल्कि रणनीतिक चेतावनी होती है। यह भारत की संप्रभुता पर सीधा आघात है।”चीन-पाकिस्तान गठजोड़: अप्रत्यक्ष दबाव की नीतिअमेरिकी रिपोर्ट में चीन और पाकिस्तान के सैन्य गठजोड़ को लेकर भी भारत को सचेत किया गया है।रिपोर्ट के मुताबिक—2020 के बाद से पाकिस्तान को 36 J-10C लड़ाकू विमानसंयुक्त रूप से विकसित JF-17 फाइटर जेटड्रोन, नौसैनिक जहाज और अन्य उन्नत हथियारमुहैया कराए गए हैं।रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं—“यह चीन की प्रॉक्सी रणनीति है—भारत पर सीधे हमला नहीं, बल्कि पाकिस्तान के जरिए सैन्य संतुलन बिगाड़ने की कोशिश।”अमेरिका की चिंता: भारत-अमेरिका रिश्ते निशाने पररिपोर्ट में साफ कहा गया है कि चीन का लक्ष्य भारत को अमेरिका से दूर रखना है।अमेरिकी रणनीतिकारों के अनुसार—“अगर भारत और अमेरिका के रिश्ते गहरे होते हैं, तो इंडो-पैसिफिक में चीन की रणनीतिक बढ़त को गंभीर चुनौती मिलेगी।”यही वजह है कि चीन एक तरफ सीमा पर बातचीत और शांति की बात करता है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान को हथियारों से लैस करता है और अरुणाचल जैसे मुद्दों पर दबाव बनाए रखता है।भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का रुखसूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है, लेकिन स्पष्ट किया है कि—“भारत अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रूप से तय करता है। किसी तीसरे देश के आकलन के आधार पर नहीं।”रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है—“LAC पर शांति बनाए रखने के साथ-साथ भारत अपनी सैन्य तैयारी और निगरानी क्षमता को लगातार मजबूत कर रहा है।”राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया विपक्षी दलों ने सरकार से पारदर्शिता की मांग की है।
एक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा—“अगर चीन दोहरी नीति अपना रहा है, तो सरकार को संसद और देश को यह बताना चाहिए कि दीर्घकालिक रणनीति क्या है।”हालांकि अधिकांश दलों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर राजनीतिक एकता की आवश्यकता पर भी जोर दिया।शिक्षाविद और रणनीतिक चिंतक क्या कहते हैंअंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षाविद मानते हैं कि यह रिपोर्ट भारत के लिए अवसर भी है और चेतावनी भी।एक वरिष्ठ प्रोफेसर के अनुसार—“भारत को न तो अमेरिका की चिंता को आंख मूंदकर स्वीकार करना चाहिए और न ही चीन की शांति को अंतिम सत्य मानना चाहिए। संतुलन ही भारत की ताकत है।”निष्कर्ष: सतर्कता ही नीतिपेंटागन की यह रिपोर्ट भारत के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ती है—LAC पर शांति अस्थायी हो सकती हैचीन की रणनीति बहुस्तरीय और दीर्घकालिक हैपाकिस्तान उस रणनीति का अहम मोहरा बना हुआ हैभारत के लिए चुनौती यह नहीं कि वह किसके साथ खड़ा है, बल्कि यह है कि—वह अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को कैसे सुरक्षित रखता है।एशिया की इस बड़ी शतरंज में अमेरिका की चेतावनी और चीन की चाल—दोनों के बीच भारत को बेहद संतुलित, लेकिन दृढ़ कदम रखने होंगे। होंगे।
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