बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 30 नवंबर
भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत नींव—संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure Doctrine)—को अक्सर जटिल कानूनी भाषा में समझाया जाता है। लेकिन देश के मुख्य न्यायाधीश सीजेआई सूर्यकांत ने इसे बिल्कुल आम भारतीयों की भाषा में, ‘खाट’ (चारपाई) के उदाहरण से समझाकर सबका ध्यान खींच लिया।ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में आयोजित उस ऐतिहासिक कार्यक्रम में, जहां सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक केशवानंद भारती फैसले के 50 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा था, सीजेआई ने बड़ी सहजता से बताया कि कैसे संविधान का मूल ढांचा लोकतंत्र की स्थिरता की रीढ़ है—और क्यों किसी भी सरकार को इसे छूने तक का अधिकार नहीं।
खाट की रस्सी और संविधान
सीजेआई सूर्यकांत बोले—संविधान का मूल ढांचा ठीक वैसे ही है जैसे खाट की रस्सियों की बुनावट।अगर रस्सी ढीली छोड़ दी जाए, तो पूरी खाट हिल जाएगी, बैठना मुश्किल हो जाएगा।और अगर रस्सी को जरूरत से ज्यादा कस दें, तो वह टूट जाएगी।उसी तरह, संविधान का मूल ढांचा न ढीला चल सकता है, न इसे तोड़ा जा सकता है।यह सरल उपमा देशभर के छात्रों, आम जनता और न्यायविदों के लिए संविधान की जटिल अवधारणा को पलभर में स्पष्ट कर देती है।“संविधान सिर्फ किताब नहीं, यह देश का संतुलन तंत्र है”
सीजेआई ने साफ कहा कि संविधान मात्र शब्दों का संग्रह नहीं है—यह एक जीवंत ढांचा, एक संतुलन का तंत्र, एक ऐसा मेकेनिज्म है जो देश को स्थिर रखता है।उन्होंने कहा—संसद के पास कानून बदलने की ताकत है।लेकिन वह संविधान की आत्मा को नहीं मार सकती।”
यही ‘आत्मा’—लोकतंत्र, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संघीय ढांचा, विधि का शासन—मूल ढांचे के घटक हैं।इसी वजह से कोई भी सरकार चाहे जितनी शक्तिशाली हो, संविधान की इस पवित्र सीमा को पार नहीं कर सकती।केशवानंद भारती: वो फैसला जिसने सरकार की ताकत को सीमित किया कार्यक्रम का मकसद था उस ऐतिहासिक फैसले को याद करना, जिसने 1973 में देश को बताया—“संसद सर्वशक्तिमान नहीं है।”सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि—संविधान में संशोधन हो सकता है लेकिन मूल ढांचा कभी बदला नहीं जा सकता यही सिद्धांत भारत की संवैधानिक स्थिरता और लोकतांत्रिक रक्षा कवच के रूप में खड़ा है।
सीजेआई का संदेश—बैलेंस बिगड़ा, तो लोकतंत्र टूटेगा सीजेआई
सूर्यकांत ने कहा—अगर सत्ता अपनी सीमा से बाहर कदम रखे, तो पूरा सिस्टम असंतुलित हो सकता है।इसलिए मूल ढांचा वह कसावट है, जो पूरे लोकतंत्र को स्थिर रखती है।”उनका कहना था कि यह अवधारणा जनता की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की मजबूती और सरकार की सीमाओं को परिभाषित करती है।क्यों महत्वपूर्ण है।
CJI का यह बयान?आज भारत सामाजिक और राजनीतिक रूप से तेजी से बदल रहा है।सरकारी शक्तियों का दायरा बढ़ाने पर अनेक बहसें चल रही हैं।ऐसे समय में CJI का यह देसी उदाहरण न केवल सामान्य जनता तक संदेश पहुंचाने का प्रयास है,बल्कि यह लोकतंत्र के संतुलन को लेकर एक संवैधानिक चेतावनी भी है।
निष्कर्ष:
संविधान की खाट हिलनी नहीं चाहिए—न ज्यादा ढीली, न ज्यादा कसी**CJI सूर्यकांत का बयान बताता है कि संविधान कोई स्थिर पुस्तक नहीं,बल्कि एक जीवंत, संतुलित ढांचा है।यह वह सीमा है जिसे—न संसद लांघ सकती हैन सरकार न ही कोई संस्था क्योंकि यही मूल ढांचा भारतीय लोकतंत्र को टिकाए, संभाले, और संतुलित रखता है।
