व्हिप की जंजीरों से आज़ादी या राजनीति की नई लड़ाई? मनीष तिवारी ने संसद में विधेयक रखा, वहीं ‘बाबरी नाम’ पर उठे सवाल ने गरमाई राष्ट्रीय राजनीति

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / कोलकाता / हैदराबाद, 7 दिसंबर

लोकसभा में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी द्वारा दलबदल रोधी कानून (10वीं अनुसूची) में संशोधन का प्रस्ताव देकर सांसदों को पार्टी लाइन से हटकर वोट देने की स्वतंत्रता देने की मांग ने संसद से लेकर सड़क तक नई बहस छेड़ दी है।इसी बीच मुर्शिदाबाद में ‘बाबरी मस्जिद शैली’ की मस्जिद निर्माण, और अब हैदराबाद में प्रस्तावित ‘बाबरी म्यूजियम’ के सवालों ने देश की राजनीति में एक नया तूफ़ान पैदा कर दिया है।क्या यह संयोग मात्र है, या फिर “बाबरी” नाम के बहाने देश में ध्रुवीकरण की एक नई लहर?

क्या यह बहुसंख्यक हिंदू समाज की भावनाओं को चुनौती देने की कोशिश है?

और क्या विपक्षी राजनीति इसके माध्यम से वैचारिक ध्रुवीकरण को नया आयाम दे रही है?

संसद में तिवारी का साहसी प्रस्ताव — व्हिप की बेड़ियाँ, लोकतंत्र की मजबूरी?

मनीष तिवारी ने लोकसभा में जो निजी विधेयक पेश किया, उसका मूल उद्देश्य सांसदों को विधेयकों पर अपने विवेक और जनता की इच्छाओं के अनुसार वोट करने की आज़ादी देना है।उनका सवाल तीखा था—लोकतंत्र में प्राथमिकता किसकी होनी चाहिए—मतदाता की या पार्टी के व्हिप की?

”तिवारी ने कहा कि सांसद केवल बटन दबाने की मशीन बनकर न रह जाएं।उनके अनुसार—अविश्वास प्रस्ताव विश्वास प्रस्ताव वित्त विधेयक इन्हें छोड़कर बाकी कानूनों पर सांसद स्वतंत्र वोट दें।सत्ता पक्ष के कई नेताओं ने इसे राजनीतिक आदर्शवाद कहा, जबकि विपक्ष के कई दलों ने इसे लोकतंत्र के पुनर्जीवन का प्रयास बताया।“

बाबरी” नाम पर उठे नए सवाल — देश में एक साथ दो बड़े विवाद क्यों?

मुर्शिदाबाद:टीएमसी के निलंबित विधायक हमायूं कबीर द्वारा ‘बाबरी मस्जिद मॉडल’ में मस्जिद की नींव रखना।हैदराबाद:ओल्ड सिटी में ‘बाबरी म्यूजियम’ का प्रस्तावित निर्माण।दोनों घटनाओं ने एक ही प्रश्न को जन्म दिया है—

क्या “बाबरी” नाम के बहाने देश की सामाजिक सद्भावना को चुनौती दी जा रही है?

कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं बल्कि चुनावी राजनीति में ध्रुवीकरण के नए प्रयोग का संकेत है।

राजनीतिक विश्लेषकों की गहरी प्रतिक्रि यावरिष्ठ

राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अरुण अवस्थी भारत में यह पहली बार नहीं है कि कोई नाम राजनीतिक हथियार बना। लेकिन ‘बाबरी’ नाम का बार-बार इस्तेमाल स्पष्ट संकेत देता है कि कुछ समूह देश के सामूहिक घाव को कुरेदकर राजनीति साधना चाहते हैं।”चर्चित स्तंभकार शिवानंद गिरि मुर्शिदाबाद की घटना और हैदराबाद का प्रस्ताव एक ही समय में आना संयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक समयबद्धता है। यह 2026 के चुनाव की पृष्ठभूमि में माहौल प्रभावित करने की कोशिश है।

”हिन्दू संगठनों की कड़ी प्रतिक्रिया: “यह साफ चुनौती है, सहन नहीं होगा

”विश्व हिंदू परिषद (VHP)बाबरी नाम का पुनरुत्थान कोई धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बहुसंख्यक समाज को उकसाने का योजनाबद्ध प्रयास है। देश में शांति भंग करने वाली ताकतें सक्रिय हो रही हैं।

”बजरंग दल – अखिल भारतीय संयोजकअयोध्या में श्रीराम मंदिर बनने के बाद जो वर्ग आक्रोश में है, वे अब ‘बाबरी’ नाम को हथियार बना रहे हैं। यह देश की अखंडता के खिलाफ सीधे-सीधे चुनौती है।

”हिन्दू धर्म गुरुओं की चेतावनी — “धर्म नहीं, राजनीति का खेल; समाज सजग रहें जगद्गुरु अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जो लोग ‘बाबरी’ नाम का प्रयोग कर रहे हैं, उनका उद्देश्य आध्यात्मिक नहीं, राजनीतिक है। समाज को भावनात्मक भड़कों में उलझने की बजाय धर्म के वास्तविक मार्ग पर रहना चाहिए।स्वामी चिदानंदपुरी जी यह देश को अराजकता की ओर ले जाने की कोशिश है। बाबरी नाम कभी धार्मिक प्रतीक नहीं था, यह एक ऐतिहासिक घाव है—उसे कुरेदना शांति के लिए घातक है।”

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ — चुनावी तापमान बढ़ा

भाजपा

टीएमसी और AIMIM जानबूझकर ‘बाबरी कार्ड’ खेल रहे हैं। यह देश को बांटने की पुरानी राजनीति की नई शक्ल है। टीएमसी हमारा विधायक निलंबित है। भाजपा इसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए मुद्दा बना रही है। हमने हमेशा सांप्रदायिक सौहार्द की राजनीति की है।”

कांग्रेस बाबरी नाम पर राजनीति राष्ट्रहित में नहीं। असली मुद्दे बेरोजगारी, शिक्षा, और कानून व्यवस्था हैं। भाजपा और टीएमसी दोनों इसे मुद्दा बना रहे हैं।”दो बड़े प्रश्न जो देश को परेशान कर रहे हैं

1. क्यों अचानक ‘बाबरी’ नाम का पुनरागमन इतने राज्यों में एक साथ हो रहा है?

2. क्या यह चुनावी रणनीति है या सामाजिक अस्थिरता पैदा करने की सुविचारित योजना?

विशेषज्ञों के अनुसार, यह आने वाले महीनों में भारत की राजनीति का सबसे बड़ा विमर्श बन सकता है।

निष्कर्ष

एक ओर सांसदों की स्वतंत्रता का सवाल, दूसरी ओर बाबरी नाम की राजनीति

जहाँ एक ओर मनीष तिवारी लोकतंत्र को व्हिप की जंजीरों से मुक्त करने की मांग कर रहे हैं,वहीं दूसरी ओर देश “बाबरी नाम” को राजनीतिक ध्रुवीकरण के नए हथियार के रूप में देख रहा है।यह विरोधाभास बताता है कि भारत की राजनीति आज दो ध्रुवों पर खड़ी है—

एक तरफ लोकतांत्रिक स्वतंत्रता,और दूसरी तरफ धार्मिक–

राजनीतिक टकराव।आने वाले सप्ताहों में ये दोनों मुद्दे संसद से लेकर सड़क तक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बने रहेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *