बी के झा
NSK

तिरुवनंतपुरम/ नई दिल्ली, 13 दिसंबर
केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने राज्य स्तर पर बढ़त बनाई हो, लेकिन तिरुवनंतपुरम में सामने आए नतीजों ने कांग्रेस नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। यही वह इलाका है, जहां से वरिष्ठ कांग्रेस नेता और अंतरराष्ट्रीय छवि वाले सांसद शशि थरूर लोकसभा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस सीट पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत को सिर्फ एक स्थानीय चुनावी परिणाम मानकर नजरअंदाज करना मुश्किल है।
तिरुवनंतपुरम में क्या बदला?तिरुवनंतपुरम के स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा की जीत को राजनीतिक विश्लेषक एक प्रतीकात्मक बदलाव के तौर पर देख रहे हैं। यह जीत भाजपा के केरल प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर के लिए भी खास मानी जा रही है, जिन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में शशि थरूर के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। स्थानीय निकाय चुनाव में मिली सफलता ने भाजपा को यह संदेश दिया है कि शहरी और शिक्षित मतदाताओं के बीच उसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. के. रामचंद्रन कहते हैं, “यह जीत संख्या से ज्यादा मनोवैज्ञानिक है।
भाजपा ने यह साबित कर दिया है कि तिरुवनंतपुरम जैसे क्षेत्र में कांग्रेस अजेय नहीं है।”थरूर की बदली हुई सियासी चाल पिछले एक साल से शशि थरूर की राजनीतिक भाषा और प्राथमिकताएं कांग्रेस की पारंपरिक लाइन से अलग दिखाई दे रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की खुले मंच से तारीफ, विदेश नीति और जी-20 जैसे मुद्दों पर सरकार का समर्थन और राहुल गांधी की कई अहम बैठकों से दूरी—इन सबने यह संकेत दिया है कि थरूर अपने राजनीतिक विकल्प खुले रखे हुए हैं।स्थानीय निकाय चुनाव से ठीक पहले वीर सावरकर पर प्रस्तावित सम्मान को लेकर उठा विवाद भी चर्चा में रहा।
हालांकि थरूर ने यह पुरस्कार स्वीकार नहीं किया, लेकिन राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि इस घोषणा ने उनके मतदाताओं के बीच एक अलग संदेश जरूर दिया।कांग्रेस की दुविधा कांग्रेस नेतृत्व के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शशि थरूर को लेकर सख्त रुख अपनाया जाए या राजनीतिक संतुलन बनाए रखा जाए।
पार्टी के भीतर एक धड़ा मानता है कि थरूर का बार-बार पार्टी लाइन से अलग बोलना अनुशासनहीनता है और इस पर कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, दूसरा धड़ा यह मानता है कि थरूर जैसे नेता पर कार्रवाई करना कांग्रेस को और कमजोर कर सकता है।कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता (नाम न छापने की शर्त पर) कहते हैं, “अगर हम थरूर पर कार्रवाई करते हैं, तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी असहमति को बर्दाश्त नहीं करती। लेकिन अगर कुछ नहीं करते, तो अनुशासन का सवाल खड़ा होगा।”
विपक्ष की प्रतिक्रिया
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस के अंदरूनी संकट के तौर पर पेश कर रही है। भाजपा प्रवक्ता ने कहा, “शशि थरूर की सोच अब कांग्रेस की सीमित राजनीति से आगे निकल चुकी है। यही वजह है कि उनके क्षेत्र में जनता ने कांग्रेस को आईना दिखाया है।”
वाम दलों ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि यह हार दिखाती है कि कांग्रेस का पारंपरिक वोट आधार कमजोर हो रहा है और भाजपा शहरी केरल में अपनी जगह बना रही है।
आगे क्या कर सकते हैं थरूर?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कांग्रेस शशि थरूर के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है, तो वह इसे अवसर के रूप में भी देख सकते हैं। ऐसी स्थिति में थरूर सांसद पद से इस्तीफा देकर तिरुवनंतपुरम में उपचुनाव की राह खोल सकते हैं।
अगर यह उपचुनाव 2026 के विधानसभा चुनावों के साथ होता है, तो यह पूरे केरल की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि भाजपा थरूर को लोकसभा या विधानसभा चुनाव के लिए एक मजबूत चेहरे के रूप में देख सकती है, खासकर शहरी और मध्यम वर्गीय मतदाताओं को साधने के लिए।
सियासी असर क्या होगा?
तिरुवनंतपुरम में भाजपा की जीत ने यह साफ कर दिया है कि केरल की राजनीति अब सिर्फ यूडीएफ बनाम एलडीएफ तक सीमित नहीं रह गई है। भाजपा धीरे-धीरे तीसरे विकल्प के रूप में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर शशि थरूर और कांग्रेस के रिश्तों पर पड़ेगा। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि यह हार कांग्रेस के लिए एक चेतावनी साबित होती है या फिर थरूर के लिए नई राजनीतिक राह खोलती है।
