शशि थरूर—जरूरत या मजबूरी? कांग्रेस क्यों नहीं ले पा रही कार्रवाई, और अगले साल केरल चुनाव से इसका गहरा कनेक्शन

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 12 दिसंबर

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने एक बार फिर पार्टी हाईकमान द्वारा बुलाई गई अहम बैठक से दूरी बना ली है।यह लगातार तीसरी बार है जब उन्होंने शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी द्वारा संयोजित बैठकों में शामिल होने से परहेज़ किया है।शीतकालीन सत्र में कांग्रेस के प्रदर्शन की समीक्षा वाली इस विशेष बैठक से थरूर की गैरमौजूदगी ने पार्टी नेतृत्व को असहज कर दिया है—

और एक बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है:क्या कांग्रेस के लिए शशि थरूर “जरूरत” हैं या “मजबूरी”?कांग्रेस क्यों ‘एक्शन’ नहीं लेती?जवाब—केरल की राजनीति और थरूर का अद्भुत वोट बैंक

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक थरूर पर कार्रवाई न करने की पार्टी की “संकोचपूर्ण नीति” पूरी तरह राजनीतिक गणित से संचालित है।

केरल में अपार लोकप्रियता — लगातार चार जीत, कभी 34% से नीचे वोट नहीं थरूर 2009, 2014, 2019 और 2024—चारों लोकसभा चुनावों में कोच्चि (तिरुवनंतपुरम) सीट से भारी बहुमत के साथ जीतते आए हैं।उनका वोट शेयर कभी 34% से नीचे नहीं गया।कांग्रेस नेतृत्व जानता है कि—थरूर को नाराज़ करना, केरल के सबसे प्रभावशाली शहरी वोट बैंक को नाराज़ करना है।

केसी वेणुगोपाल vs शशि थरूर—आंतरिक खींचतान कांग्रेस की कमजोरीकेसी वेणुगोपाल→ राहुल गांधी के सबसे विश्वासपात्र नेताओं में शामिलशशि थरूर→ शहरी मतदाताओं में अपार लोकप्रिय, युवा और मिडिल क्लास में बड़े आकर्षण केरल कांग्रेस में यह दो ध्रुव खुलकर टकराव में हैं,जिसके कारण नेतृत्व थरूर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से बच रहा है।

केरल विधानसभा चुनाव 2026—थरूर को नाराज़ करने का मतलब राजनीतिक जोखिमअगले साल केरल में विधानसभा चुनाव हैं।2020 के स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस सिर्फ 2.26% वोटों से पीछे रह गई थी।विश्लेषक मानते हैं—थरूर के चेहरे का प्रभाव कांग्रेस के लिए गेमचेंजर हो सकता है—इन्हें हटाना राजनीतिक आत्महत्या होगी।

स्थानीय निकाय चुनावों में भी थरूर की धमककांग्रेस चाहती है कि—शहरी बेल्टतटीय क्षेत्र ईसाई और शिक्षित मतदाता इन सब पर थरूर का प्रभाव स्थानीय चुनावों में भी उसे फायदा पहुंचा सके।थरूर भी जानते हैं अपनी ताकत—CM फेस बनने की महत्वाकांक्षा

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि शशि थरूर स्थिति को भली-भांति समझते हैं।उन्हें पता है कि पार्टी उनकी लोकप्रियता पर निर्भर है,

खासकर—तिरुवनंतपुरम एर्नाकुलम कोट्टायम त्रिशूल पुरके क्षेत्रों में।इसलिए वहUDF (कांग्रेस गठबंधन) का भविष्य का CM फेस बनने का सपना भी खुले तौर पर नहीं, लेकिन अंदरखाने पाल रहे हैं।हालांकि कांग्रेस हाईकमान के लिए उन्हें इस भूमिका में स्वीकार करना“अति कठिन”माना जा रहा है।राजनीतिक विश्लेषकों की प्रतिक्रियाएँ

विश्लेषक

1 — “थरूर वही कर रहे हैं जो लोकप्रिय नेता करते हैं”शशि थरूर राहुल गांधी की बैठकों में नहीं जा रहे—यह अवमानना नहीं, बल्कि एक शक्ति-प्रदर्शन है।चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस उनकी लोकप्रियता खोए बिना उन्हें संदेश भी देना चाहती है। यह शक्ति संतुलन का खेल है।”

विश्लेषक

2 — “कांग्रेस के पास थरूर को बदलने का विकल्प नहीं”थरूर के फायर, फ्लुएंसी, और अंतरराष्ट्रीय छवि का कोई विकल्प नहीं है।कांग्रेस भले नाराज़ हो, लेकिन कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।”

विश्लेषक

3 — “वेणुगोपाल–थरूर विवाद कांग्रेस को अंदर से कमजोर कर रहा है”दलों में गुटबाजी सामान्य है, पर यह मामला हाईकमान की कमजोरी उजागर करता है। कांग्रेस इस समस्या को दबा रही है, सुलझा नहीं रही।”राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ

BJP की चुटकी भाजपा प्रवक्ता ने कहा—कांग्रेस अब हाईकमान की पार्टी रही ही नहीं। हर नेता अपनी लाइन चलता है।थरूर पार्टी को आंख दिखा रहे हैं और कांग्रेस चुप है—क्योंकि उन्हें अपने वोट बैंक की चिंता है।”

CPI(M) की प्रतिक्रिया

केरल की सत्ताधारी CPI(M) ने कहा “कांग्रेस खुद तय नहीं कर पा रही कि किसके नेतृत्व में चुनाव लड़ना है।ऐसे में वो हमारे मजबूत संगठन को चुनौती नहीं दे सकेगी।”

कांग्रेस की सफाई

कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक—> “थरूर वरिष्ठ नेता हैं। वे कभी-कभी व्यस्त रहते हैं।पार्टी में ऐसे छोटे मतभेद होते रहते हैं।”लेकिन वास्तविकता यह है कि पार्टी खुद को“थरूर के बिना चुनाव न लड़ पाने की स्थिति”में देख रही है।

निष्कर्ष:

थरूर कांग्रेस के लिए ‘असहज लेकिन अपरिहार्य’कुल मिलाकर—थरूर पार्टी बैठकों से दूरी बनाए हुए हैंकांग्रेस कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं केरल चुनाव सिर पर हैं थरूर का वोट बैंक पार्टी की मजबूरी हैऔर CM फेस बनने की उनकी महत्वाकांक्षा भविष्य में बड़ा राजनीतिक मोड़ ला सकती हैयह तस्वीर यही संदेश दे रही है कि—

थरूर कांग्रेस के अनुशासन का सवाल नहीं—

बल्कि उसके राजनीतिक अस्तित्व का सवाल हैं।

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