बी के झा
NSK

मुजफ्फरपुर ( बिहार ),25 जनवरी
जिस विद्यालय को बच्चों के चरित्र निर्माण और सुरक्षित भविष्य की नींव माना जाता है, वही विद्यालय यदि महिलाओं के लिए असुरक्षित हो जाए, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं—पूरी व्यवस्था की नैतिक विफलता होती है। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से सामने आया शिक्षक अश्लील चैट कांड इसी कड़वी सच्चाई की ओर इशारा करता है।महिला शिक्षिकाओं को व्हाट्सएप पर अश्लील संदेश भेजने के आरोप में दो शिक्षकों को निलंबित कर दिया गया है, जबकि पिछले चार महीनों में दो दर्जन से अधिक शिक्षिकाओं ने ऐसे ही शोषण की शिकायत की है। कई पीड़िताओं ने धमकी के डर से लिखित शिकायत तक नहीं दी—यह तथ्य अपने आप में भयावह है।
प्रशासनिक कार्रवाई: शुरुआत, समाधान नहीं
जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) अरविंद कुमार सिन्हा के निर्देश पर डीपीओ स्थापना इन्द्र कुमार कर्ण ने कार्रवाई करते हुए—बीपीएससी से नियुक्त शिक्षक दीपक कुमार को निलंबित किया पंचायत शिक्षक संतोष कुमार दास के निलंबन की अनुशंसा नियोजन इकाई को भेजीदोनों मामलों में जांच के दौरान अश्लील चैटिंग और मानसिक प्रताड़ना के आरोप सही पाए गए।डीईओ ने स्पष्ट कहा—“इस तरह के मामलों में स्पष्टीकरण स्वीकार नहीं किया जाएगा। दोषी पाए जाने पर सीधे निलंबन होगा।”लेकिन सवाल यह है—क्या सिर्फ निलंबन पर्याप्त है?
शिक्षाविदों की राय: यह नैतिक दिवालियापन हैं वरिष्ठ शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) आनंद मिश्रा कहते हैं—“जब शिक्षक ही महिलाओं को वस्तु समझने लगें, तो शिक्षा व्यवस्था में सिर्फ पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि मूल्यों का पुनर्लेखन जरूरी हो जाता है। यह घटना संस्थागत नैतिक पतन को दर्शाती है।”उनका मानना है कि लैंगिक संवेदनशीलता प्रशिक्षण को शिक्षक नियुक्ति की अनिवार्य शर्त बनाया जाना चाहिए।
कानूनविदों का सवाल: FIR क्यों नहीं?
पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता वरुण शेखर के अनुसार—“आईटी एक्ट और भारतीय न्याय संहिता के तहत अश्लील संदेश और धमकी आपराधिक अपराध हैं। केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं, FIR दर्ज होनी चाहिए।”वे सवाल उठाते हैं कि क्या प्रशासन पीड़िताओं को न्याय दिला रहा है या सिर्फ मामला दबा रहा है?
सामाजिक कार्यकर्ता: डर का माहौल सबसे बड़ा अपराध महिला अधिकार कार्यकर्ता रेणु देवी कहती हैं—“जब 24 से अधिक शिक्षिकाएँ शिकायत करें और कई लिखने से डरें, तो यह स्पष्ट है कि सिस्टम अपराधियों को संरक्षण दे रहा है।”उनके अनुसार, शिकायत करने वाली महिलाओं को स्थानांतरण से बचाव गोपनीयता मनोवैज्ञानिक सहायताअनिवार्य रूप से दी जानी चाहिए।
राजनीति गरमाई: सत्ता बनाम विपक्ष
इस मामले ने बिहार की राजनीति में भी उबाल ला दिया है।राजद नेता तेजस्वी यादव ने सरकार पर सीधा हमला करते हुए कहा—“केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह के चहेते बिहार के गृहमंत्री के शासन में अब विद्या के मंदिर की शिक्षिकाएँ भी सुरक्षित नहीं हैं, लेकिन मोदी–शाह की नजर में सब ठीक-ठाक है।”वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रेमचंद्र मिश्रा ने इसे व्यापक अराजकता से जोड़ते हुए कहा—“आज बिहार में बलात्कार, हत्या आम बात हो चुकी है। भूमाफिया और भ्रष्ट अधिकारी मिलकर शासन चला रहे हैं।
शिक्षा, महिला सुरक्षा और कानून—तीनों ध्वस्त हैं।”उन्होंने भूमि म्यूटेशन में रिश्वतखोरी और प्रशासनिक संरक्षण के गंभीर आरोप भी लगाए।
असल सवाल: जवाबदेही किसकी?
यह मामला केवल कुछ शिक्षकों का नहीं, बल्कि इन सवालों को जन्म देता है—क्या विद्यालयों में आंतरिक शिकायत समिति (ICC) सक्रिय है?क्या महिला शिक्षिकाओं की सुरक्षा की कोई संस्थागत व्यवस्था है?
क्या सरकार सिर्फ कार्रवाई दिखा रही है या सुधार भी करेगी?
निष्कर्ष:
शिक्षा का मंदिर तभी पवित्र होगा जब महिलाएँ सुरक्षित होंयदि शिक्षक ही शोषक बन जाएँ,यदि पीड़िता ही डर जाए,यदि राजनीति सिर्फ बयानबाज़ी करे—तो यह लोकतंत्र नहीं, संस्थागत पतन है।
मुजफ्फरपुर का यह कांड चेतावनी है—अब भी नहीं चेते, तो अगली पीढ़ी हमें माफ़ नहीं करेगी।
