बी के झा
नई दिल्ली, 24 मार्च
पश्चिम एशिया में भड़की जंग अब केवल क्षेत्रीय टकराव नहीं रही; यह विश्व अर्थव्यवस्था की नसों में दौड़ने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा प्रहार बन चुकी है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने वैश्विक तेल और गैस बाजार को अस्थिर कर दिया है।
होर्मुज की रुकावट: दुनिया की ऊर्जा पर संकट
दुनिया के लगभग 20% तेल व्यापार का रास्ता Strait of Hormuz से होकर गुजरता है।इस मार्ग में बाधा का अर्थ है—सप्लाई चेन का टूटनाकीमतों में उछालवैश्विक महंगाई का बढ़ना यही कारण है कि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी हुई हैं और दुनिया भर के देशों की चिंता बढ़ती जा रही है।
कौन सबसे ज्यादा प्रभावित?
भारत से ज्यादा संकट में ये देश इस संकट का असर सभी देशों पर है, लेकिन कुछ देश भारत से भी अधिक प्रभावित हैं:पाकिस्तान – खाड़ी तेल पर अत्यधिक निर्भरता, गंभीर ऊर्जा संकट जापान – आयात आधारित ऊर्जा अर्थव्यवस्था थाईलैंड – सीमित वैकल्पिक स्रोत दक्षिण कोरिया – उच्च औद्योगिक ऊर्जा मांग इसके बाद भारत का स्थान आता है, जो इस संकट से प्रभावित तो है, लेकिन अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है।
भारत की स्थिति: संकट के बीच संतुलन
भारत की ऊर्जा नीति पिछले वर्षों में कुछ हद तक संतुलित हुई है:खाड़ी देशों से तेल आयात ~40%गैस आयात में निर्भरता ~80%41 देशों से ऊर्जा आयात का नेटवर्कयही विविधीकरण भारत को तत्काल झटके से बचाता है।हालांकि एलपीजी और गैस के क्षेत्र में संकट की आशंका अभी भी गंभीर बनी हुई है।
यूरोप क्यों बचा हुआ है?
रोचक तथ्य यह है कि यूरोप इस संकट से अपेक्षाकृत कम प्रभावित है।कारण स्पष्ट हैं:रूस से गैस आपूर्तिअमेरिका और नॉर्वे जैसे वैकल्पिक स्रोत दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति यह मॉडल भारत जैसे देशों के लिए एक संकेत भी है।
राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल अस्थायी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ सकता है।“ऊर्जा अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है।”“जो देश जितना अधिक आयात पर निर्भर है, वह उतना ही अधिक असुरक्षित है।”विशेषज्ञ इसे “21वीं सदी का नया तेल युद्ध” भी बता रहे हैं।
केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया
केंद्र सरकार ने स्थिति को लेकर सतर्क रुख अपनाया है:वैकल्पिक स्रोतों (रूस, अमेरिका) से आयात बढ़ाने की कोशिशरणनीतिक भंडार का उपयोगकूटनीतिक स्तर पर सक्रिय संवादसरकार का कहना है कि देश में ऊर्जा आपूर्ति बनाए रखने के लिए हर संभव कदम उठाए जा रहे हैं और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
विपक्ष का हमला
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश की है:ऊर्जा कीमतों में संभावित वृद्धि पर चिंतागैस और एलपीजी संकट को लेकर सवाल दीर्घकालिक ऊर्जा नीति पर पुनर्विचार की मांग विपक्षी का तर्क है कि“सिर्फ आयात विविधीकरण पर्याप्त नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन और वैकल्पिक ऊर्जा पर तेजी से काम जरूरी है।”
सामाजिक असर: आम आदमी पर सीधा बोझ
इस संकट का सबसे बड़ा असर आम नागरिक पर पड़ेगा:पेट्रोल-डीजल महंगागैस सिलेंडर की कमीहवाई यात्रा महंगी (जेट फ्यूल संकट)खाद्य कीमतों में वृद्धिपाकिस्तान जैसे देशों में तो हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि स्कूल और दफ्तरों पर भी असर पड़ा है।
हिंदू और मुस्लिम संगठनों का दृष्टिकोण
कुछ सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इस संकट को “मानवता के लिए खतरा” बताया है:शांति और संवाद की अपील
युद्ध के बजाय कूटनीति पर जोरवैश्विक स्थिरता की मांगयह दर्शाता है कि यह संकट केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानवीय भी है।
निष्कर्ष:
संकट में अवसर या आने वाला तूफान?
ईरान युद्ध ने दुनिया को एक बार फिर यह याद दिलाया है कि ऊर्जा पर निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है।भारत के लिए यह समय है:आत्मनिर्भर ऊर्जा नीति को गति देने का नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाने काऔर वैश्विक कूटनीति में संतुलन बनाए रखने का
(संपादकीय टिप्पणी)
दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते—वे अर्थव्यवस्था, ऊर्जा और आम जीवन पर भी लड़े जाते हैं।भारत के पास विकल्प हैं,
अवसर हैं और रणनीति भी—
अब आवश्यकता है तेज, निर्णायक और दूरदर्शी कदमों की।
NSK

