बी के झा
नई दिल्ली, 14 मार्च
मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में जो अनिश्चितता पैदा हुई है, उसका प्रभाव भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों में महसूस किया जाना स्वाभाविक है। ऐसे समय में एलपीजी से लदे भारतीय जहाज शिवालिक और नंदादेवी का होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित पार कर भारत की ओर बढ़ना निश्चित रूप से राहत देने वाली खबर है। इन जहाजों के 16 और 17 मार्च को भारत पहुंचने की संभावना है, जिससे घरेलू गैस आपूर्ति पर बने दबाव में कुछ कमी आने की उम्मीद की जा रही है।लेकिन यह घटना केवल एक राहत भरी खबर नहीं है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने लाती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में यदि यहां किसी प्रकार का सैन्य या राजनीतिक तनाव उत्पन्न होता है तो उसका प्रभाव केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एशिया और यूरोप के ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ता है।भारत की ऊर्जा संरचना लंबे समय से आयातित ईंधन पर निर्भर रही है। पेट्रोलियम और गैस की बड़ी मात्रा विदेशों से आती है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक घटनाओं का असर भारतीय बाजार और उपभोक्ताओं पर अपेक्षाकृत तेजी से दिखाई देने लगता है।सरकार की ओर से यह दावा किया गया है कि देश में पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है तथा रिफाइनरियां पूरी क्षमता से काम कर रही हैं। साथ ही यह भी कहा गया है कि वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को एलपीजी की संभावित कमी से बचाने के लिए पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन को बढ़ावा दिया जाएगा। यह कदम व्यावहारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा सकता है, क्योंकि इससे एलपीजी पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सकती है।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर एक बार फिर बहस को तेज कर दिया है। कई आर्थिक और ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को दीर्घकालिक रणनीति के तहत अपने ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण करना होगा। नवीकरणीय ऊर्जा, प्राकृतिक गैस अवसंरचना और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार जैसे क्षेत्रों में निवेश को और तेज करने की आवश्यकता है।राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। विपक्षी दलों का कहना है कि ऊर्जा सुरक्षा केवल तात्कालिक प्रबंधन का विषय नहीं है, बल्कि इसके लिए दीर्घकालिक नीतिगत तैयारी की आवश्यकता होती है। उनका तर्क है कि यदि वैश्विक संकट के समय घरेलू बाजार में अस्थिरता दिखाई देती है, तो इसका अर्थ है कि वितरण और भंडारण प्रणाली को और मजबूत बनाने की जरूरत है।
वहीं सरकार का कहना है कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है और आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। कूटनीतिक स्तर पर भी भारत ने संतुलित नीति अपनाते हुए अपने समुद्री हितों और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया है।इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि भारत जैसे बड़े उपभोक्ता देश को वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाओं के प्रति अत्यंत सतर्क रहना पड़ता है। ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा केवल आर्थिक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।ऐसे में यह आवश्यक है कि तत्काल राहत के उपायों के साथ-साथ दीर्घकालिक ऊर्जा नीति पर भी गंभीरता से काम किया जाए।
यदि भारत ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण, रणनीतिक भंडारण और वैकल्पिक ईंधन अवसंरचना को मजबूत करने में सफल होता है, तो भविष्य में इस प्रकार के वैश्विक संकटों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम किया जा सकता है।फिलहाल देश की निगाहें उन जहाजों पर टिकी हैं जो एलपीजी लेकर भारत की ओर बढ़ रहे हैं। उनके सुरक्षित पहुंचने से तत्काल राहत अवश्य मिलेगी, लेकिन इस घटना ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा के प्रश्न को केवल संकट के समय नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राष्ट्रीय रणनीति के रूप में देखने की आवश्यकता है।
