संपादकीय: “कुर्सी भी मेरी, संसद भी मेरी”—नीतीश की राजनीति या जनता के जनादेश से खेल?

बी के झा

NSK

पटना, 28 मार्च

बिहार की राजनीति अब एक अजीब मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सवाल यह नहीं कि कौन मुख्यमंत्री है—बल्कि यह है कि मुख्यमंत्री आखिर जवाबदेह किसके प्रति है—जनता के प्रति या अपनी राजनीतिक सुविधा के प्रति?Nitish Kumar राज्यसभा जा चुके हैं,लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं।संविधान उन्हें 6 महीने की छूट देता है—और वही छूट अब सत्ता से चिपके रहने का लाइसेंस बनती दिख रही है।

संविधान का सहारा या सत्ता का सहारा?

संविधान कहता है कि कोई व्यक्ति 6 महीने तक बिना सदन का सदस्य बने मुख्यमंत्री रह सकता है।लेकिन सवाल यह है—क्या यह प्रावधान “संकट से निपटने” के लिए था या “कुर्सी बचाने” के लिए?जब कोई नेता खुद राज्यसभा का रास्ता चुन ले,तो नैतिकता यही कहती है कि वह राज्य की कमान किसी और को सौंपे।लेकिन यहाँ हो क्या रहा है?

दिल्ली भी चाहिए, पटना भी चाहिए।

दो नावों पर सवारी: राजनीति या अवसरवाद?

Nitish Kumar की राजनीति हमेशा “लचीलापन” के लिए जानी गई है—आलोचक इसे “पलटने की कला” भी कहते हैं।आज फिर वही सवाल:क्या यह रणनीति है?या फिर परिस्थितियों के हिसाब से खुद को ढालने की आदत?

जब नेतृत्व स्पष्ट नहीं होता,तो प्रशासन दिशाहीन हो जाता है।

BJP की चुप्पी: समर्थन या मजबूरी?

Bharatiya Janata Party (BJP) इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद संयमित बयान दे रही है।लेकिन यह संयम कई सवाल खड़े करता है:क्या BJP इस स्थिति से संतुष्ट है?या सत्ता में बने रहने के लिए समझौता कर रही है?

अगर अगला मुख्यमंत्री भाजपा से होना है,तो फिर यह “इंतजार” क्यों?

जनादेश का क्या हुआ?

जनता ने वोट दिया था:स्थिर सरकार के लिएस्पष्ट नेतृत्व के लिए लेकिन आज स्थिति यह है:

मुख्यमंत्री राज्यसभा में‌ राज्य में नेतृत्व अनिश्चितऔर जनता—दर्शक यह लोकतंत्र नहीं,राजनीतिक प्रबंधन (Political Management) बनकर रह गया है।

विपक्ष का हमला: सही या अवसरवाद?

Rashtriya Janata Dal (RJD) और अन्य विपक्षी दल इसे “जनादेश का अपमान” बता रहे हैं।और इस बार उनका तर्क पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।

सबसे बड़ा खतरा:

अनिश्चितता राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति क्या होती है?

अनिश्चितता।

जब:नेता स्पष्ट नहीं निर्णय अधर मेंऔर सत्ता अस्थायी मोड में तो शासन कमजोर होता है,और जनता का भरोसा टूटता है।

निष्कर्ष:

फैसला टालना भी एक फैसला है

Nitish Kumar के पास विकल्प है:या तो तुरंत स्पष्टता दें या फिर इस “दोहरी भूमिका” को जारी रखें लेकिन याद रखना होगा—फैसला टालना भी एक फैसला होता है, और उसका राजनीतिक मूल्य चुकाना पड़ता है।

संपादकीय

अगर मुख्यमंत्री को दिल्ली ज्यादा प्रिय है,तो पटना की कुर्सी पर क्यों बैठे हैं?

और अगर बिहार की जिम्मेदारी निभानी है,तो राज्यसभा का रास्ता क्यों चुना?

राजनीति में दो नावों पर सवारी लंबे समय तक नहीं चलती—एक दिन संतुलन बिगड़ता है, और वही दिन सबसे भारी पड़ता है।

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