समीक्षाओं के बाद ही अंतिम निर्णय: बिहार में करारी हार पर कांग्रेस नेता अखिलेश प्रसाद सिंह का बड़ा बयान

बी के झा

NSK

नई दिल्ली/ लखनऊ ,26 नवंबर

बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी पराजय ने पार्टी के अंदर गहरी मंथन प्रक्रिया को जन्म दे दिया है। वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह ने बुधवार को साफ कहा कि पार्टी इस अप्रत्याशित और निराशाजनक नतीजे की गहन समीक्षा कर रही है और अंतिम निर्णय कांग्रेस के उच्च नेतृत्व द्वारा विस्तृत चर्चाओं के बाद ही लिए जाएंगे।“इस तरह के परिणाम की कल्पना किसी ने नहीं की थी” —

अखिलेश प्रसाद सिंह पत्रकारों से बातचीत में अखिलेश प्रसाद सिंह ने माना कि जनता के भीतर नाराजगी थी, लेकिन परिणाम इतने एकतरफा होंगे, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। उन्होंने कहा:लोगों में गुस्सा है। किसी ने भी ऐसे परिणाम की उम्मीद नहीं की थी।

हर बिंदु पर समीक्षा होगी — संगठन, रणनीति, उम्मीदवार चयन,

गठबंधन तालमेल — सब कुछ। कमियां ढूंढकर ही आगे की दिशा तय होगी।”उन्होंने स्पष्ट किया कि पार्टी न तो परिणाम से भागेगी और न ही जिम्मेदारी से। समग्र समीक्षा के बाद ही संगठनात्मक सुधार और भविष्य की रणनीति पर अंतिम निर्णय होंगे।बिहार में एनडीए की सुनामी, विपक्ष पूरी तरह बह गयाइस चुनाव में बिहार ने एक बार फिर राजनीतिक इतिहास को नई दिशा दी। एनडीए ने अभूतपूर्व बहुमत हासिल करते हुए 243 सदस्यीय विधानसभा में 202 सीटें जीतकर तीन-चौथाई का आंकड़ा पार कर लिया। यह 2010 के बाद दूसरी बार है जब एनडीए ने 200 से ऊपर सीटें जीती हैं।एनडीए का सीट बंटवारा

BJP – 89 सीटे

JDU – 85 सीटें

LJPR – 19 सीटें

HAM – 5 सीटें

RLM – 4 सीटे

बी जे पी इस बार राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जिसने गठबंधन को निर्णायक ताकत प्रदान की।महागठबंधन की करारी हारदूसरी ओर, विपक्षी महागठबंधन जनता के मूड को भांप नहीं सका।

RJD – 25

कांग्रेस – केवल 6

CPI (ML) – 2

CPI (M) – 1

भारतीय समावेशी पार्टी – 1

कांग्रेस ने 61 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन केवल 6 पर जीत पाई — यह पार्टी के लिए चिंताजनक और शर्मनाक दोनों ही स्थितियां हैं।इस हार को लेकर महागठबंधन के कई नेता खुले तौर पर गठबंधन की रणनीति, सीटों के बंटवारे और जमीन पर संगठन की कमजोरी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।एआईएमआईएम और बीएसपी का भी रहा सीमित प्रभावAIMIM – 5 सीटें BSP – 1 सीट ए आईएम आईएम का सीमांचल में सीमित लेकिन उल्लेखनीय प्रभाव रहा, जिसने कई सीटों पर महागठबंधन को भी नुकसान पहुंचाया।कांग्रेस की राह कठिन, लेकिन समीक्षा से तय होगी दिशा कांग्रेस अब दो मोर्चों पर चुनौती झेल रही है—

1. संगठन को मजबूत करना, और

2. गठबंधन राजनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करना।पार्टी के अंदर यह स्वीकार्यता दिख रही है कि बिना कठोर आत्ममंथन के बिहार में जमीन वापस पाना मुश्किल होगा।

निष्कर्ष

बिहार चुनाव ने एक बार फिर साबित किया है कि जनता के रुझान बदलते देर नहीं लगती और रणनीति में थोड़ी सी चूक भी परिणामों को उलट सकती है। कांग्रेस की यह समीक्षा सिर्फ औपचारिकता नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई भी है। पार्टी की नयी रणनीति क्या होगी, यह आगामी दिनों में तय होगा — लेकिन इतना स्पष्ट है कि अब कांग्रेस के पास समय कम और चुनौतियां बहुत हैं।

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