बी के झा
NSK

नई दिल्ली, 31 अक्टूबर
स्वतंत्र भारत के लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल पर हुए दो जानलेवा हमलों की कहानी 86 वर्षों तक परतों में दबे रह गई। अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे फिर से देश के सामने रखकर कांग्रेस पर तीखा प्रहार किया है।
बीजेपी ने दावा किया है कि 1939 में मुस्लिम लीग समर्थित भीड़ ने पटेल पर दो घातक हमले किए, लेकिन कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम को “राजनीतिक शर्मिंदगी” से बचने के लिए इतिहास से मिटा दिया।
बीजेपी का बड़ा दावा: “कांग्रेस ने सरदार पर हुए हमलों को 86 साल तक छिपाया”बीजेपी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर दस्तावेज़ों और पुरानी समाचार क्लिपिंग्स साझा करते हुए कहा—यह कांग्रेस की राजनीतिक कायरता थी कि उसने सरदार पटेल जैसे राष्ट्रनायक पर हुए हमलों की सच्चाई 86 वर्षों तक दबाए रखी। उस दौर में मुस्लिम लीग की भूमिका पर कोई सवाल उठाने की हिम्मत नहीं की गई।”बीजेपी के अनुसार, 1939 में हुई इन दो घटनाओं में 57 लोगों पर मुकदमा चला, जिनमें से 34 दोषी पाए गए और दो को विशेष अदालत ने मौत की सज़ा सुनाई थी।
हमलों के दौरान सरदार पटेल की रक्षा करते हुए दो देशभक्त—बच्चू वीरजी और जाधवजी मोदी—शहीद हो गए, जबकि कई घायल हुए।
लेकिन इतिहास की किताबों से यह अध्याय ‘गायब’ कर दिया गया।
पहला हमला: वडोदरा, 20 जनवरी 1939 — “सरदार वापस जाओ” के नारों के बीच बरसी हिंसाबीजेपी द्वारा साझा विवरण के अनुसार,20 जनवरी 1939 को सरदार पटेल जब वडोदरा में प्रजामंडल आंदोलन के तहत जुलूस निकाल रहे थे, तभी मुस्लिम लीग समर्थित भीड़ ने “सरदार वापस जाओ” के नारे लगाए।उनकी कार पर पथराव हुआ, प्रजामंडल कार्यालय में आग लगा दी गई।बीजेपी का आरोप है कि यह हमला उस समय की स्थानीय सत्ता के “संकेत” पर हुआ था — यानी एक “स्टेट स्पॉन्सर्ड अटेम्प्ट”।
घटना के बाद वडोदरा प्रशासन ने औपचारिक जांच तो की, लेकिन उसे “फर्जी रिपोर्ट” बताकर मामला बंद कर दिया गया।उस समय कांग्रेस की चुप्पी को बीजेपी ने “राजनीतिक शर्म” करार दिया है।
दूसरा हमला: भावनगर, 14 मई 1939 — मस्जिद से बरसा पत्थर, लहूलुहान हुए देशभक्तदूसरी और अधिक घातक घटना 14 मई 1939 को भावनगर में हुई।बीजेपी के अनुसार, जब सरदार पटेल पांचवीं प्रजा परिषद की बैठक के लिए जा रहे थे,तो मुस्लिम लीग से जुड़ी भीड़ ने नगीना मस्जिद से उनके शांतिपूर्ण जुलूस पर हमला कर दिया।यह हमला पूर्वनियोजित बताया गया।देशभक्त बच्चू वीरजी और जाधवजी मोदी ने अपने प्राणों की आहुति देकर सरदार पटेल की रक्षा की।उस शाम पटेल ने घायल अवस्था में भी सभा को संबोधित किया और अपने साथियों को शांति का संदेश दिया।बीजेपी ने कहा —इतनी हिंसा झेलने के बाद भी पटेल ने एकता का मार्ग नहीं छोड़ा। यह दर्शाता है कि वे न केवल अंग्रेजों से लड़े, बल्कि आंतरिक विश्वासघात से भी संघर्षरत रहे।”
‘कांग्रेस की किताबों से गायब अध्याय’ —
अब रिजवान कादरी ने खोला सचबीजेपी का आरोप है कि कांग्रेस सरकारों और उसके इतिहासकारों ने जानबूझकर इस पूरे घटनाक्रम को पाठ्यपुस्तकों से हटाया, ताकि मुस्लिम लीग के प्रति पार्टी की “नरमी” पर सवाल न उठे।बीजेपी ने लिखा —कांग्रेस बताएं कि जब तक इतिहासकार रिजवान कादरी ने दस्तावेजों से यह सच्चाई उजागर नहीं की, तब तक इसे जनता से क्यों छिपाया गया?”
पार्टी ने कहा कि यह घटनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि”लौहपुरुष पटेल न केवल बाहरी शत्रुओं से लड़े, बल्कि अंदरूनी राजनीतिक और वैचारिक साजिशों से भी।
राजनीतिक विश्लेषण:
“इतिहास से छेड़छाड़ की सज़ा अब जनता सुना रही है”राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा बीजेपी के लिए दोहरा लाभ देता है—
एक तरफ वह कांग्रेस की ‘ऐतिहासिक गलतियों’ को उजागर करती है,और दूसरी तरफ पटेल को अपनी वैचारिक विरासत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने कहा —
कांग्रेस ने दशकों तक पटेल को नेहरू के साये में दबाकर रखा। अब बीजेपी उसी पटेल की विरासत को सामने रखकर कांग्रेस पर वैचारिक पलटवार कर रही है। जनता इतिहास के सही और गलत अध्यायों का फैसला अब खुद कर रही है।”
निष्कर्ष:
इतिहास की परछाइयों से निकला ‘छिपा सच’1939 के वे दो हमले आज फिर देश की राजनीतिक बहस में हैं।बीजेपी कह रही है कि “यह सिर्फ इतिहास नहीं, यह चेतावनी है कि सत्य को जितना भी दबाओ, एक दिन वह फूट पड़ेगा।”
सरदार पटेल का जीवन सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी का नहीं,बल्कि एक राष्ट्र निर्माता का था —
जिसने बाहरी दुश्मनों से अधिक भीतर की साजिशों से लड़ाई लड़ी।और यही लड़ाई, आज 86 साल बाद, राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन चुकी है।
