बी के झा
NSK

जहानाबाद / नई दिल्ली , 5 जनवरी
सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने की खबर जैसे ही बिहार के जहानाबाद जिले के काको गांव पहुंची, वहां का माहौल अचानक बोझिल हो गया। चर्चित दिल्ली दंगा मामले में आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद को जमानत न दिए जाने के फैसले ने शरजील के पैतृक गांव में गहरी मायूसी और सन्नाटा फैला दिया है। गांव की गलियों में चर्चा कम और चिंता अधिक है—चिंता एक ऐसे युवक की, जो पिछले पांच वर्षों से जेल में है और जिसके परिवार को अब भी न्याय की प्रतीक्षा है।
परिवार की प्रतिक्रिया: “
देर से ही सही, न्याय मिलेगा”शरजील इमाम के चाचा अरशद इमाम ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर संयमित लेकिन भावुक प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा,“हमें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। मेरा भतीजा पूरी तरह बेकसूर है। देर से ही सही, लेकिन उसे न्याय जरूर मिलेगा।”अरशद इमाम के शब्दों में निराशा के साथ-साथ कानून पर भरोसा भी झलकता है। उनका कहना है कि पूरे फैसले को विस्तार से पढ़ने के बाद ही अगला कानूनी कदम तय किया जाएगा और यह लड़ाई पूरी तरह संवैधानिक और कानूनी दायरे में लड़ी जाएगी।
गांव में माहौल: खामोशी,
सवाल और इंतजार
काको गांव में शरजील के घर के आसपास पसरा सन्नाटा बहुत कुछ कहता है। पड़ोसी और परिचित खुलकर बोलने से बचते नजर आए, लेकिन हर बातचीत में एक ही सवाल उभरता है—जब इस मामले में पांच अन्य आरोपियों को जमानत मिल सकती है, तो शरजील को क्यों नहीं?
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि मामला अब केवल एक व्यक्ति का नहीं रहा, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया की लंबाई और विचाराधीन कैदियों की स्थिति पर भी सवाल खड़े करता है।मां का दर्द: शब्दों से परे पीड़ा इस फैसले के बाद शरजील इमाम की मां अफसा रहीम सदमे में हैं। परिवार के लोगों के अनुसार, वह लगातार रो रही हैं और मीडिया के सामने कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं। एक मां के लिए यह इंतजार सबसे कठिन है—जब न दोष सिद्ध हुआ है और न ही बेटे को राहत मिली है।
क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला?
दिल्ली दंगा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सात आरोपियों की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई की। इनमें से पांच—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को जमानत दे दी गई।हालांकि, शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गईं। अदालत ने इस स्तर पर उन्हें कोई राहत नहीं दी, जिससे उनके समर्थकों और परिवार में निराशा और गहरी हो गई।
शरजील इमाम: शिक्षा, राजनीति और विवाद
शरजील इमाम का नाम केवल एक आरोपी के रूप में नहीं, बल्कि एक पढ़े-लिखे छात्र कार्यकर्ता के रूप में भी जाना जाता है।आईआईटी बॉम्बे से पढ़ाई जेएनयू में रिसर्च स्कॉलर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ शाहीनबाग आंदोलन में सक्रिय भूमिका उनके कथित बयानों को लेकर दिल्ली, उत्तर प्रदेश, असम सहित कई राज्यों में मुकदमे दर्ज किए गए। 28 जनवरी 2020 को दिल्ली पुलिस ने उन्हें जहानाबाद के काको गांव से गिरफ्तार किया था। तब से वह जेल में हैं।
पारिवारिक पृष्ठभूमि: राजनीति से भी जुड़ा नाम
शरजील के पिता अकबर इमाम जदयू के नेता रहे हैं और जहानाबाद विधानसभा से चुनाव भी लड़ चुके हैं। वे राजद उम्मीदवार डॉ. सच्चिदानंद यादव से करीबी मुकाबले में हार गए थे। यही कारण है कि शरजील का मामला केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन गया है।
दिल्ली दंगे: पृष्ठभूमि और गंभीरता
2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी, सैकड़ों घायल हुए थे और भारी संपत्ति नुकसान हुआ था। पुलिस ने इसे “बड़ी साजिश” बताते हुए छात्र कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के खिलाफ कई मामले दर्ज किए।पिछले पांच वर्षों में यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में विचाराधीन कैद, जमानत और राष्ट्रीय सुरक्षा कानूनों के इस्तेमाल को लेकर लगातार बहस का केंद्र बना हुआ है।
न्याय की राह: लंबी लेकिन खुली
शरजील इमाम के परिवार का कहना है कि यह फैसला अंतिम नहीं है। कानूनी विकल्प अभी खुले हैं और वे न्यायपालिका पर भरोसा रखते हैं।यह मामला आज केवल एक व्यक्ति की रिहाई या कैद तक सीमित नहीं, बल्कि यह उस सवाल को भी सामने लाता है कि विचाराधीन कैद कितनी लंबी हो सकती है और न्याय में देरी किस हद तक न्याय से वंचित करती है।
निष्कर्ष
जहानाबाद के काको गांव में पसरी उदासी दरअसल देश की न्यायिक प्रक्रिया की एक मानवीय तस्वीर है—
जहां कानून अपना काम करता है, लेकिन उसके फैसलों का भार परिवारों और समाज को उठाना पड़ता है।शरजील इमाम के चाचा के शब्द इस पूरे माहौल का सार हैं—
“देर से ही सही, एक न एक दिन न्याय जरूर मिलेगा।”
