बी के झा
NSK

गुवाहाटी / नई दिल्ली, 1 फरवरी
असम की राजनीति एक बार फिर एनआरसी, पहचान और कथित ‘नफरती भाषण’ के मुद्दे पर तेज टकराव की गवाह बन रही है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और लेखक-सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के बीच जुबानी और कानूनी संघर्ष अब खुले राजनीतिक युद्ध में तब्दील होता दिख रहा है। मुख्यमंत्री सरमा ने साफ शब्दों में कहा है कि वह मंदर के खिलाफ “कम से कम 100 मामले” दर्ज कराएंगे।यह बयान ऐसे समय आया है, जब हर्ष मंदर ने दिल्ली के हौज खास थाने में मुख्यमंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज कराते हुए उन पर बांग्ला भाषी मुसलमानों के खिलाफ नफरत, उत्पीड़न और भेदभाव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।
मुख्यमंत्री का तीखा बयान: ‘मैंने इनके जैसे कई लोगों को देखा है
’शनिवार को गोलाघाट जिले के खुमटई में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखे शब्दों में कहा—“हर्ष मंदर कौन हैं?
मैंने उनके जैसे कई लोगों को देखा है। उन्होंने मेरे खिलाफ एक मामला दर्ज किया है, अब देखते रहिए—मैं उनके खिलाफ कम से कम 100 मामले दर्ज करवाऊंगा। मेरे पास इसके पूरे सबूत हैं।”सरमा का यह बयान केवल व्यक्तिगत प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एनआरसी और असम की पहचान राजनीति से जुड़े पुराने विवादों को फिर से सतह पर ले आता है।
एनआरसी को लेकर गंभीर आरोप
मुख्यमंत्री ने हर्ष मंदर पर आरोप लगाया कि उन्होंने और उनके जैसे अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने असम में राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) के अद्यतन की प्रक्रिया को जानबूझकर बाधित किया।सरमा के अनुसार—एनआरसी प्रक्रिया के दौरानअयोग्य लोगों के नाम शामिल कराने के लिए फर्जी रिश्तेदार और दस्तावेज खड़े किए गएऔर इसके पीछे “साजिशकर्ता” के रूप में मंदर जैसे लोग सक्रिय थे।
यहां तक कि मुख्यमंत्री ने यह भी कहा—“अगर मैं उस समय सत्ता में होता, तो उन्हें सबक सिखाता।”हर्ष मंदर का पक्ष: नफरत और भेदभाव का आरोप दूसरी ओर, हर्ष मंदर ने मुख्यमंत्री के कथित बयानों को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ बताते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है। मंदर का कहना है कि असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों को लेकर दिए गए बयान—समाज में डर और नफरत का माहौल बनाते हैं और एक पूरे समुदाय को निशाना बनाते हैं मंदिर लंबे समय से मानवाधिकार, अल्पसंख्यक अधिकार और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहे हैं, जिसके चलते वह पहले भी सत्तारूढ़ दलों के निशाने पर रहे हैं।
एनआरसी: अधूरी प्रक्रिया, जारी विवाद
गौरतलब है कि असम में अंतिम एनआरसी 31 अगस्त 2019 को प्रकाशित की गई थी।कुल 3,30,27,661 आवेदकों में से3,11,21,004 नाम शामिल किए गए हालांकि, यह सूची अब तक अधिसूचित (Notify) नहीं की गई है।यही वजह है कि एनआरसी आज भी—राजनीतिक बहस कानूनी लड़ाईऔर सामाजिक विभाजन का केंद्र बनी हुई है।
राजनीतिक विश्लेषण: बयान से आगे की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हिमंत बिस्वा सरमा का आक्रामक रुख—एक ओर अपने कोर वोटबेस को स्पष्ट संदेश देता है तो दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ताओं और आलोचकों के लिए कठोर चेतावनी है विशेषज्ञों के अनुसार, “100 मामलों” की बात प्रतीकात्मक हो सकती है, लेकिन यह कानूनी दबाव की राजनीति को दर्शाती है।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनविदों का कहना है कि—नफरती भाषणऔर एनआरसी में कथित साज़िश दोनों ही मामलों में सबूतों की कसौटी बेहद सख्त होती है।यदि दोनों पक्ष अदालत का रुख करते हैं, तो यह मामला संवैधानिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य की शक्ति की सीमाओं पर बड़ी बहस को जन्म दे सकता है।
निष्कर्ष
हिमंत बिस्वा सरमा और हर्ष मंदर के बीच यह टकराव अब केवल व्यक्तिगत या कानूनी विवाद नहीं रह गया है। यह संघर्ष—राज्य बनाम कार्यकर्ता,राष्ट्रवाद बनाम मानवाधिकार,और सत्ता बनाम असहमति की बड़ी बहस का प्रतीक बनता जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि यह लड़ाई अदालतों तक सीमित रहती है या फिर असम की राजनीति और सामाजिक ताने-बाने पर इसका और गहरा असर पड़ता है।
