बी के झा
नई दिल्ली / सोलापुर / लखनऊ, 10 जनवरी
एआईएमआईएम प्रमुख और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी के एक बयान ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। ओवैसी का यह कहना कि “एक दिन हिजाब पहनने वाली बेटी इस देश की प्रधानमंत्री बनेगी”—जहां उनके समर्थकों के लिए यह संविधान की समावेशिता का प्रतीक है, वहीं विपक्षी दल इसे राजनीतिक कल्पना और भावनात्मक बयानबाज़ी करार दे रहे हैं।ओवैसी के इस बयान पर सबसे तीखी प्रतिक्रिया कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की ओर से आई है। उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से सांसद मसूद ने इसे “दिन में तारे देखने जैसा” बताते हुए कहा कि ऐसी बातें लोकतंत्र की वास्तविकता से परे हैं।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का पलटवार
न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में इमरान मसूद ने कहा:“यह ऐसी बात है जो मुमकिन ही नहीं है। लोकतंत्र में हर किसी को अधिकार है, लेकिन हिजाब पहनना या न पहनना एक निजी मामला है। इस तरह के बयान सिर्फ भ्रम पैदा करते हैं।”मसूद ने यह भी इशारा किया कि राजनीति में पहचान के बजाय नीति, कार्यक्रम और जनसमर्थन निर्णायक होते हैं।
ओवैसी का तर्क:
संविधान की समावेशिता इस विवाद की जड़ महाराष्ट्र के सोलापुर में आयोजित एक चुनावी सभा है, जहां ओवैसी ने भारत और पाकिस्तान के संवैधानिक ढांचे की तुलना करते हुए कहा था:“पाकिस्तान के संविधान में सिर्फ एक धर्म के व्यक्ति को प्रधानमंत्री बनने की अनुमति है, जबकि बाबा साहब आंबेडकर का संविधान कहता है कि भारत का कोई भी नागरिक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मेयर बन सकता है।”ओवैसी ने इसे भारतीय लोकतंत्र की ताकत बताते हुए कहा कि उनका सपना है कि भविष्य में हिजाब पहनने वाली कोई बेटी भी इस देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे।
भाजपा का तीखा सवाल:पहले अपने घर में लागू करें
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने ओवैसी के बयान को “पाखंड पूर्ण राजनीति” बताते हुए कड़ा सवाल उठाया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर लिखा:“मियां ओवैसी कहते हैं कि हिजाब वाली पीएम बनेगी। संविधान किसी को नहीं रोकता, लेकिन पहले आप किसी पसमांदा मुस्लिम या हिजाब पहनने वाली महिला को अपनी पार्टी एआईएमआईएम का अध्यक्ष बनाकर दिखाइए।”भाजपा का कहना है कि ओवैसी का बयान जमीनी हकीकत से अधिक प्रतीकात्मक राजनीति का उदाहरण है।
शिवसेना की दो-टूक: पहचान नहीं, प्रदर्शन जरूरी
शिवसेना (शिंदे गुट) की प्रवक्ता शायना एनसी ने इस बहस को एक अलग ही दिशा दी। उन्होंने कहा कि भारत में नेतृत्व का आधार योग्यता और जनसमर्थन होना चाहिए, न कि जाति, धर्म या पहनावे की पहचान।शायना ने कहा:“प्रधानमंत्री पद के लिए कोई वैकेंसी नहीं है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता जगजाहिर है। पहले अपने सांसदों को जितवाइए, फिर ऐसे सपने देखिए। भविष्य में एक महिला प्रधानमंत्री जरूर हो सकती है, लेकिन उसके काम और लोगों के समर्थन के आधार पर, न कि उसकी धार्मिक पहचान पर।”
राजनीतिक विश्लेषण: प्रतीक बनाम यथार्थ
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ओवैसी का बयान संविधान की समावेशिता को रेखांकित करने से अधिक, अल्पसंख्यक राजनीति को धार देने का प्रयास है। वहीं, कांग्रेस और भाजपा दोनों इसे व्यावहारिक राजनीति से कटे हुए बयान के रूप में देख रही हैं।विश्लेषकों के अनुसार, यह बहस इस बड़े सवाल को भी सामने लाती है कि
क्या भारत की राजनीति में पहचान की राजनीति अब भी निर्णायक है, या विकास, नेतृत्व और प्रदर्शन ही भविष्य की राजनीति तय करेंगे?
निष्कर्ष‘
हिजाब पहनने वाली बेटी प्रधानमंत्री बनेगी’—यह वाक्य भले ही किसी के लिए आशा और समावेशिता का प्रतीक हो, लेकिन मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह बयान वैचारिक बहस, राजनीतिक व्यंग्य और सियासी टकराव का कारण बन गया है। यह विवाद एक बार फिर दिखाता है कि भारत की राजनीति में संविधान, पहचान और सत्ता—
तीनों के अर्थ अलग-अलग दलों के लिए अलग-अलग हैं।
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