बी के झा
NSK

पटना, 1 जनवरी
बिहार की “हिजाब वाली डॉक्टर” के नाम से देशभर में चर्चा में आईं डॉ. नुसरत परवीन ने आखिरकार आयुष चिकित्सक की सरकारी नौकरी छोड़ दी। पटना सिविल सर्जन कार्यालय में 31 दिसंबर—अंतिम तिथि—तक योगदान नहीं करने के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि नुसरत अब बिहार सरकार की सेवा में शामिल नहीं होंगी। स्वास्थ्य विभाग द्वारा पहले ही 10 दिनों की अतिरिक्त मोहलत दिए जाने के बावजूद उनका योगदान नहीं करना इस पूरे प्रकरण को नए राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक मोड़ पर ले आया है। सिविल सर्जन, पटना डॉ. अविनाश कुमार सिंह ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि न तो डॉ. नुसरत और न ही उनके परिजनों की ओर से किसी प्रकार का संपर्क किया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब योगदान की तिथि समाप्त हो चुकी है।
हिजाब खींचने का वीडियो और सियासी तूफान
15 दिसंबर 2025 को पटना में आयोजित नियुक्ति पत्र वितरण समारोह के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा नियुक्ति पत्र देते समय डॉ. नुसरत परवीन का हिजाब हटाए जाने का वीडियो वायरल हुआ। देखते ही देखते यह मामला बिहार की सीमाओं से निकलकर झारखंड, कश्मीर और राष्ट्रीय राजनीति तक जा पहुंचा।राजद ने इसे अल्पसंख्यक महिला के सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताते हुए सरकार पर हमला बोला। वहीं झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने नुसरत को अपने राज्य में तीन लाख रुपये मासिक वेतन की नौकरी का सार्वजनिक प्रस्ताव दे दिया।कश्मीर में पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती की बहू बिल्किस सड़क पर उतर आईं और नीतीश कुमार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने थाने तक पहुंचीं। यह मामला धीरे-धीरे धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सरकारी अनुशासन की बहस में बदल गया।
राज्यपाल से मौलानाओं तक—मिश्रित प्रतिक्रियाएं
इस पूरे घटनाक्रम पर बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान सहित कई वरिष्ठ हस्तियों ने संयमित प्रतिक्रिया दी। राज्यपाल ने कहा कि“नीतीश कुमार उम्र और पद में पिता समान हैं। इस घटना को दुर्भावना से नहीं देखा जाना चाहिए। नुसरत को नौकरी ज्वाइन कर लेनी चाहिए थी।”कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों और मौलानाओं ने भी कहा कि रोज़गार और सेवा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी। एक वरिष्ठ मौलाना ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—“इस्लाम रोज़गार और सेवा से नहीं रोकता। संवाद से समाधान निकाला जा सकता था।”वहीं मुस्लिम संगठनों के एक वर्ग ने इसे धार्मिक पहचान के अपमान का मामला बताया और नुसरत के फैसले को “स्वाभिमान का निर्णय” कहा।
हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं की राय
हिंदू संगठनों ने इस प्रकरण को सरकारी मंच पर सार्वजनिक शिष्टाचार से जोड़ते हुए कहा कि नियुक्ति जैसे सरकारी कार्यक्रम में धार्मिक प्रतीकों का प्रदर्शन विवाद पैदा कर सकता है। कुछ हिंदू धर्मगुरुओं ने हालांकि यह भी कहा कि“राज्य को आस्था के मामलों में संयम बरतना चाहिए और व्यक्ति की गरिमा का ध्यान रखना चाहिए।”कानूनविद और शिक्षाविद क्या कहते हैं?वरिष्ठ संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला कानूनी से अधिक नैतिक और प्रशासनिक था।प्रसिद्ध कानूनविद एडवोकेट राजीव सिन्हा कहते हैं—“
नुसरत को नौकरी न ज्वाइन करने का पूरा अधिकार है। लेकिन राज्य को भी यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि सरकारी कार्यक्रमों में व्यक्तिगत धार्मिक आचरण की सीमा क्या है।”शिक्षाविदों के अनुसार यह विवाद नई पीढ़ी की पहचान राजनीति और सरकारी संस्थाओं के बीच टकराव का उदाहरण है।
कॉलेज का भरोसा टूटा,
अनुमान गलतइस बीच नुसरत के कॉलेज से लगातार यह संकेत मिलता रहा कि वह योगदान करेंगी। कॉलेज प्रिंसिपल और उनकी एक सहेली ने भी इसकी पुष्टि की थी। इसी भरोसे पर स्वास्थ्य विभाग ने अंतिम तिथि 31 दिसंबर तक बढ़ाई। लेकिन अंतिम दिन तक नुसरत का न पहुंचना यह बताता है कि फैसला पहले ही ले लिया गया था।63 डॉक्टरों ने किया योगदान, नुसरत रहीं अनुपस्थित उसी दिन पटना सिविल सर्जन कार्यालय में कुल 63 चिकित्सकों ने योगदान किया। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 53 और मुख्यधारा में 10 चिकित्सकों ने ज्वाइन किया। डॉ. नुसरत की पोस्टिंग पटना सदर प्रखंड में होनी थी, लेकिन वह रिक्त ही रह गई।एक फैसला, कई सवाल डॉ. नुसरत परवीन का नौकरी न ज्वाइन करना अब सिर्फ एक प्रशासनिक सूचना नहीं, बल्कि यह सवाल खड़े करता है—क्या सरकारी सेवा और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन संभव है?
क्या राजनीति ने एक युवा डॉक्टर के करियर को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया?और क्या ऐसे मामलों में संवाद की जगह टकराव हावी हो गया?
यह साफ है कि नुसरत ने जो रास्ता चुना, वह उनका व्यक्तिगत अधिकार है। लेकिन इस फैसले ने बिहार ही नहीं, पूरे देश को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया है कि धर्म, राज्य और व्यक्ति की सीमाएं आखिर कहां खिंची जानी चाहिए।
