1.4 अरब लोगों के लिए सस्ता तेल हमारी प्राथमिकता’ 500% टैरिफ की धमकी पर भारत ने अमेरिका को दो टूक जवाब दिया

बी के झा

NSK

नई दिल्ली / वॉशिंगटन, 9 जनवरी

दबाव, धमकी और टैरिफ—अमेरिकी कूटनीति की यही त्रयी जब भारत के दरवाज़े तक पहुँची, तो जवाब भी उतना ही साफ़, ठोस और आत्मविश्वास से भरा आया।रूस से सस्ता तेल खरीदने पर भारत को 500 प्रतिशत टैरिफ की चेतावनी देने वाले अमेरिका को भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की संप्रभु नीति होती है, न कि किसी और की अनुमति से तय होने वाला फैसला।भारत के विदेश मंत्रालय ने पहली बार इतने सीधे शब्दों में यह कहा है कि—“हमारा फोकस 1.4 अरब भारतीयों को सस्ती और स्थिर ऊर्जा उपलब्ध कराने पर है, न कि किसी तीसरे देश की राजनीतिक प्राथमिकताओं पर।

अमेरिका की धमकी: टैरिफ या दबाव?

अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम द्वारा पेश किए गए प्रस्तावित बिल के तहत—रूस से तेल, गैस या यूरेनियम खरीदने वाले देशों परकम से कम 500% टैरिफ लगाने की अनुमति अमेरिकी राष्ट्रपति को मिल सकती हैइस बिल को 7–8 जनवरी 2026 को डोनाल्ड ट्रंप का समर्थन मिला।तर्क दिया गया कि इससे “रूस की युद्ध फंडिंग रोकी जाएगी।”लेकिन अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मानते हैं कि—“यह रूस से ज़्यादा भारत, चीन और ब्राज़ील जैसे उभरते देशों को संदेश देने की कोशिश है।”

भारत का जवाब: ऊर्जा कोई दान नहीं, ज़रूरत है

दिल्ली में विदेश मंत्रालय की साप्ताहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अमेरिका को बिना किसी कूटनीतिक घुमाव के जवाब दिया।उन्होंने कहा—“हम वैश्विक बाजार की परिस्थितियों को देखते हुए ऊर्जा खरीदते हैं। हमारा उद्देश्य 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना है। हमारी रणनीति इसी आधार पर तय होती है।”

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह बयान कई मायनों में ऐतिहासिक है—

भारत ने पहली बार सार्वजनिक मंच सेअमेरिकी ‘नैरेटिव’ को सीधे चुनौती दीऔर यह साफ किया कि भारत फॉलोअर नहीं, निर्णयकर्ता है

दोहरा अमेरिकी रवैया: सवालों के घेरे में कानूनविद और ट्रेड एक्सपर्ट इस अमेरिकी प्रस्ताव को चयनात्मक नैतिकता (Selective Morality) का उदाहरण मानते हैं।अमेरिका स्वयं रूस से यूरेनियम आयात करता है यूरोप के कई देश अब भी अप्रत्यक्ष रूप से रूसी ऊर्जा से जुड़े हैं लेकिन निशाना केवल भारत जैसे देशों पर एक वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ कहते हैं—“अगर यह बिल पास होता है, तो यह WTO नियमों और मुक्त व्यापार की भावना—दोनों के खिलाफ जाएगा।”

भारत-अमेरिका व्यापार: फोन कॉल वाला विवादअमेरिकी कॉमर्स सेक्रेटरी हॉवर्ड लुटनिक के इस दावे पर भी भारत ने तीखी आपत्ति जताई कि—“भारत-अमेरिका ट्रेड डील इसलिए नहीं हुई क्योंकि पीएम मोदी ने ट्रंप को फोन नहीं किया।”रणधीर जायसवाल ने इस बयान को तथ्यहीन बताते हुए कहा—13 फरवरी 2025 से ट्रेड डील पर बातचीत चल रही थी कई दौर की वार्ता हुई समझौते के क़रीब भी पहुँचे 2025 में मोदी-ट्रंप के बीच 8 फोन कॉल हुए

विदेश मंत्रालय का साफ संदेश था—“कूटनीति फोन कॉल की संख्या से नहीं, नीतियों की गंभीरता से चलती है।”

रणनीतिक विशेषज्ञों की राय:

दबाव में झुकने वाला भारत नहीं भारतीय रणनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि—रूस से सस्ता तेल खरीदकर भारत ने महंगाई को नियंत्रित रखाऔद्योगिक विकास को गति दीआम जनता को राहत दीएक रक्षा और ऊर्जा विशेषज्ञ के अनुसार—“अगर भारत अमेरिकी दबाव में आकर तेल खरीदना बंद कर देता, तो इसका सीधा असर पेट्रोल-डीज़ल, खाद्य महंगाई और औद्योगिक लागत पर पड़ता।

”विपक्ष और नीति विशेषज्ञ:

राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हालांकि घरेलू राजनीति में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इस मुद्दे पर अधिकांश नीति विशेषज्ञों और विपक्षी नेताओं का रुख भी यही है— ऊर्जा नीति में किसी बाहरी दबाव को स्वीकार नहीं किया जा सकता।एक पूर्व राजनयिक के शब्दों में—“आज भारत जिस आत्मविश्वास से बात कर रहा है, वह संकेत है कि हम अब ‘आदेश लेने वाला देश’ नहीं रहे।”

आगे क्या?

टकराव या संतुलनअगर 500% टैरिफ वाला बिल अमेरिकी संसद से पास होता है—

भारत-अमेरिका व्यापार रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका भी भारत जैसे बड़े बाजार को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं—“यह टकराव से ज़्यादा मोलभाव की रणनीति है। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी लाल रेखा ऊर्जा सुरक्षा है।

”निष्कर्ष:

सस्ता तेल, संप्रभु नीति भारत का संदेश स्पष्ट है—

ऊर्जा नीति राष्ट्रीय ज़रूरत है टैरिफ की धमकी से नीति नहीं बदलती भारत वैश्विक दबाव में नहीं, वैश्विक यथार्थ में फैसले करता हैआज अमेरिका को भारत ने यही याद दिलाया है कि रणनीतिक साझेदारी बराबरी पर होती है—धमकियों पर नहीं।

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