बी के झा
NSK

पटना / नई दिल्ली, 17 अक्टूबर
बिहार चुनाव 2025 के रण में अब गठबंधन धर्म की असली परीक्षा शुरू हो गई है। महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर चल रही तनातनी अब खुले टकराव में बदलने लगी है। विकासशील इंसान पार्टी (VIP) के प्रमुख मुकेश सहनी की 15 सीटों और डिप्टी सीएम पद की मांग ने तेजस्वी यादव की रणनीति को उलझा दिया है।
आरजेडी नेतृत्व सहनी को केवल 12 सीटें देने के पक्ष में है, लेकिन ‘सन ऑफ मल्लाह’ कहे जाने वाले मुकेश सहनी अब पीछे हटने को तैयार नहीं।
60 से 15 सीटों तक आई मांग, लेकिन बढ़ी सियासी तल्खी
सूत्रों की मानें तो मुकेश सहनी ने शुरुआत में 60 सीटों क मांग रखी थी। राजनीतिक समीकरणों के दबाव में उन्होंने धीरे-धीरे यह संख्या 40, फिर 20, और अब 15 सीटों पर ला दी।परंतु, अब मामला संख्या का नहीं, सम्मान और हिस्सेदारी का है।
सहनी चाहते हैं कि उन्हें न केवल सम्मानजनक सीटें दी जाएं, बल्कि डिप्टी सीएम का चेहरा भी घोषित किया जाए — ताकि मल्लाह समाज को यह संदेश जाए कि सत्ता में उनकी साझेदारी केवल प्रतीकात्मक नहीं, वास्तविक है।कांग्रेस और वाम दलों की ओर झुकी निगाहें तेजस्वी यादव से बढ़ती दूरी के बीच सहनी अब कांग्रेस और वाम दलों की ओर देख रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि वे इन दलों से यह उम्मीद कर रहे हैं कि वे आरजेडी पर दबाव बनाएं, ताकि वीआईपी को “सम्मान जनक हिस्सेदारी” मिल सके।
गुरुवार को सहनी ने तीन बार प्रेस कॉन्फ्रेंस का समय बदला, और आखिरकार उसे रद्द कर दिया — इसे राजनीतिक हलकों में “संदेश देने वाली रणनीति” के रूप में देखा जा रहा है।इन 15 सीटों पर अड़े हैं मुकेश सहनी जिन सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की तैयारी में हैं, वे हैं —अमौर, बथनाहा, गौड़ाबौराम, अलीनगर, रजौली, भभुआ, केसरिया, झंझारपुर, गोपालपुर, सकरा, नौतन, हरनौत, औराई, नालंदा और छातापुर।इनमें से कई सीटें महागठबंधन के अन्य घटक दलों के प्रभाव क्षेत्र में आती हैं, जिससे टकराव और गहराता जा रहा है।‘
मल्लाह वोट बैंक’ की अहमियत
बिहार के राजनीतिक समीकरण में मल्लाह समाज एक महत्वपूर्ण वोट बैंक माना जाता है — लगभग 6 से 7 प्रतिशत आबादी वाला यह वर्ग कई जिलों में निर्णायक भूमिका निभाता है।
तेजस्वी यादव के लिए यह चुनौती दोहरी है —एक ओर उन्हें मल्लाह वोट को साधना है, दूसरी ओर कांग्रेस-वाम दलों को नाराज़ भी नहीं करना।
राजनीतिक विश्लेषण: ‘
सहनी की जिद या रणनीतिक दबाव?’
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि मुकेश सहनी की यह जिद दरअसल रणनीतिक दबाव की राजनीति है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक का कहना है —सहनी जानते हैं कि डिप्टी सीएम पद मिलना कठिन है, लेकिन इस मांग से वे अपनी मोलभाव करने की क्षमता बढ़ा रहे हैं। अगर 15 सीटें भी मिल जाएं, तो वे इसे ‘सम्मानजनक समझौता’ बताकर अपने समर्थकों में विजय का संदेश दे सकते हैं।”
महागठबंधन की मुसीबतें यहीं से शुरू
आरजेडी पहले ही वाम दलों और कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे को लेकर रस्साकशी झेल रही है। अब सहनी की मांगों ने तेजस्वी के लिए नई सिरदर्दी खड़ी कर दी है।महागठबंधन के भीतर यह सवाल अब गूंजने लगा है —क्या सहनी की सीटों की मांग सिर्फ दावेदारी है या आने वाले समय में अलग राह पकड़ने का संकेत?
निष्कर्ष :
चुनाव से पहले दरार या दबाव की चाल?फिलहाल महागठबंधन “एकजुटता” का दावा कर रहा है, लेकिन अंदरखाने की दरारें सबके सामने हैं।अगर सहनी की मांगों का समाधान जल्द नहीं निकला, तो बिहार का यह गठबंधन चुनाव से पहले ही ‘गठबंधन धर्म’ की परीक्षा में फेल हो सकता है।
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