बी के झा
NSK



मधुबनी ( बिहार ) 13 फरवरी
बिहार की सांस्कृतिक धरोहरों में एक ऐसा नाम है, जो आज भी इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और आम जनमानस को रोमांचित करता है—
मधुबनी जिले के बाबूबरही प्रखंड में स्थित बलिराजगढ़। जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर फैला 176 एकड़ का यह विशाल पुरातात्विक परिसर बाहर से भले ही घास और मिट्टी का टीला लगे, लेकिन इसकी परतों के नीचे 2500 वर्ष पुरानी सभ्यता की धड़कनें दबी हैं।स्थानीय लोग इसे ‘राजा बलि का गढ़’ कहते हैं। किंवदंतियों, पौराणिक आख्यानों और वैज्ञानिक खोजों का यह संगम इसे केवल एक ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि मिथिला की अस्मिता का प्रतीक बना देता है।
जब धरती ने उगला स्वर्णिम अतीत
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा समय-समय पर की गई खुदाइयों में यहां से पंचमार्क सिक्के, टेराकोटा मूर्तियां, हाथीदांत की कलाकृतियां, अर्ध-कीमती पत्थरों के मनके और मजबूत ईंटों की विशाल दीवारें मिली हैं।इतिहासकारों का मत है कि यह स्थल मौर्य और शुंग काल में एक सुदृढ़ प्रशासनिक और सैन्य केंद्र रहा होगा।
वरिष्ठ इतिहासकार की प्रतिक्रिया“
ईंटों की संरचना और जलनिकासी प्रणाली यह संकेत देती है कि यह केवल किला नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित शहरी केंद्र था। यह संभव है कि यह प्राचीन विदेह या मिथिला की किसी महत्वपूर्ण राजधानी का हिस्सा रहा हो,” एक वरिष्ठ इतिहासकार ने कहा।
भूवैज्ञानिकों की नजर में ‘इंजीनियरिंग का चमत्कार’
स्थानीय भूवैज्ञानिकों के अनुसार, यहां प्रयुक्त ईंटों की संरचना और मिट्टी की परतों का अध्ययन दर्शाता है कि निर्माण में अत्यंत उन्नत तकनीक अपनाई गई थी।“इतनी चौड़ी और सुदृढ़ दीवारें यह संकेत देती हैं कि यह स्थल बाढ़ और आक्रमण दोनों से सुरक्षा के दृष्टिकोण से बनाया गया था,” एक भूवैज्ञानिक विशेषज्ञ का मत है।
पौराणिक आस्था का केंद्र
बलिराजगढ़ का नाम आते ही असुरराज महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार की कथा जीवंत हो उठती है।हिन्दू धर्मगुरुओं का मानना है कि यह वही स्थल हो सकता है, जहां दानवीर राजा बलि ने तीन पग भूमि दान में देकर स्वयं को समर्पित कर दिया था।
धर्मगुरु की प्रतिक्रिया“यह केवल पुरातत्व नहीं, आस्था का केंद्र है।
यदि वैज्ञानिक प्रमाण मिलते हैं तो यह स्थल धार्मिक पर्यटन का भी बड़ा धाम बन सकता है,” एक प्रमुख हिन्दू धर्माचार्य ने कहा।
क्या यह प्राचीन विश्वविद्यालय था?
खुदाई में मिले संरचनात्मक अवशेष और शिल्पकला के नमूने यह संकेत देते हैं कि यहां केवल सैन्य या प्रशासनिक गतिविधियां ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियां भी संचालित होती रही होंगी।कुछ शिक्षाविदों का मत है कि यह संभवतः प्राचीन मिथिला का कोई शैक्षणिक केंद्र रहा हो, जहां तर्कशास्त्र, दर्शन और कला का अध्ययन होता था।
स्थानीय समाजसेवी संस्था की पहल
मधुबनी की एक प्रमुख समाजसेवी संस्था ने मांग की है कि बलिराजगढ़ को राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित कर व्यापक शोध और संरक्षण कार्य शुरू किया जाए।संस्था के पदाधिकारी ने कहा,“यदि इसे सही ढंग से विकसित किया जाए, तो यह मधुबनी पेंटिंग के साथ बिहार के पर्यटन का नया चेहरा बन सकता है।”
प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया
स्थानीय प्रशासन ने बताया कि स्थल की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त निगरानी की व्यवस्था की जा रही है।भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सहयोग से आगे की वैज्ञानिक खुदाई और संरचनात्मक अध्ययन की योजना पर विचार चल रहा है।वहीं, बिहार सरकार पर्यटन विभाग के एक अधिकारी ने कहा,“राज्य सरकार बलिराजगढ़ को हेरिटेज सर्किट से जोड़ने की दिशा में कार्य कर रही है। बुनियादी सुविधाओं और प्रचार-प्रसार की योजना तैयार की जा रही है।”
पर्यटन का सोया हुआ शेरआज बलिराजगढ़ शांत है, पर इसकी मिट्टी में छिपा इतिहास गर्व से सिर उठाए खड़ा है। यदि यहां हेरिटेज वॉक, संग्रहालय, व्याख्या केंद्र और शोध संस्थान की स्थापना हो, तो यह स्थल राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
निष्कर्ष
बलिराजगढ़ केवल अतीत का अवशेष नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का आधार है।यह स्थल हमें याद दिलाता है कि मिथिला और बिहार की धरती ने केवल संस्कृति और ज्ञान ही नहीं, बल्कि अद्भुत शहरी नियोजन और स्थापत्य कला की भी मिसालें गढ़ी हैं।—
इतिहास की धूल हटाइए, बलिराजगढ़ बोल उठेगा।
