56 पूर्व जजों की दो-टूक: “यह न्यायपालिका को डराने की कोशिश… ऐसी अपीलें स्वीकार न हों

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 12 दिसंबर

मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ लाए जा रहे महाभियोग प्रस्ताव को लेकर न्यायपालिका और देश के बुद्धिजीवियों के बीच गहरी चिंता उभरी है।

सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के 56 पूर्व न्यायाधीशों ने एक खुले पत्र के माध्यम से इस प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह कदम न केवल “न्यायपालिका को धमकाने की कोशिश” है, बल्कि ऐसे न्यायाधीशों को संदेश देने की रणनीति भी है, जो न तो किसी राजनीतिक विचारधारा से संचालित होते हैं और न ही किसी दबाव में आते हैं।

पूर्व जजों ने सांसदों, वकीलों, सिविल सोसाइटी और जागरूक नागरिकों से स्पष्ट अपील की है कि ऐसे प्रस्तावों को सख़्ती से खारिज किया जाए, ताकि अदालतों की स्वायत्तता, गरिमा और स्वतंत्र निर्णय क्षमता अक्षुण्ण बनी रहे।“

न्यायपालिका पर दबाव ठीक नहीं… यह लोकतंत्र की जड़ें हिला देगा”पूर्व न्यायाधीशों द्वारा जारी बयान में कहा गया है—हम, माननीय सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीश, जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताते हैं।

यह एक खतरनाक प्रयास है — उन जजों को धमकाने का, जो किसी खास विचारधारा के पक्ष में झुककर नहीं चलते या फिर राजनीतिक अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते। यदि ऐसे प्रयास बढ़ते रहे तो लोकतंत्र की नींव कमजोर होगी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गहरा आघात होगा।”इन जजों ने चेतावनी देते हुए कहा कि अदालतें तभी तक मजबूत रह सकती हैं, जब तक वे सत्ता, राजनीति या किसी भी बाहरी प्रभाव से मुक्त रहें।

अगर न्यायाधीशों पर राजनीतिक दबाव बनाने की परंपरा शुरू हो गई, तो न्यायिक निष्पक्षता प्रभावित होगी।

आपातकाल की याद दिलाई… ‘

जजों को प्रताड़ित करने की परंपरा दोहराई जा रही’इस बयान में आपातकाल का उल्लेख करते हुए कहा गया कि वह समय भी गवाह है जब न्यायपालिका को प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।एडीएम जबलपुर केस में असहमति व्यक्त करने पर जस्टिस एच.आर. खन्ना को जिस तरह किनारे किया गया, वह इतिहास का काला अध्याय माना जाता है।

पूर्व जजों ने स्पष्ट चेतावनी दी—आज न्यायपालिका एक बार फिर उसी प्रकार के दबाव और प्रताड़ना के दौर का सामना कर रही है। हमें इसकी रक्षा करनी होगी।”

वरिष्ठ अधिवक्ताओं का निशाना— “न्यायालय पर सीधा हमला”

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी विपक्षी दलों द्वारा लाए गए महाभियोग प्रस्ताव को कठोर शब्दों में खारिज किया है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अरविन्द कुमार सिंह ने कहा—क्या अब न्यायालय राजनीतिक दलों के इशारे पर फैसले सुनाए?

यदि नहीं, तो क्या हर निर्णय पर महाभियोग की धमकी दी जाएगी?

यह न्यायालय पर सीधा हमला है।

कांग्रेस और कुछ तथाकथित सेकुलर दलों की यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है।

कानूनी विश्लेषकों, वरिष्ठ पत्रकारों, हिंदू संगठनों और धर्मगुरुओं ने भी चिंता जताते हुए कहा कि यदि न्यायालय को राजनीतिक सोच के अनुसार फैसले देने पर मजबूर किया जाएगा, तो भारत की न्याय व्यवस्था भी उन देशों की राह पर चली जाएगी —

जहां पाकिस्तान और बांग्लादेश में शासक विचारधारा के अनुसार अदालतें फैसला सुनाती देखी जाती हैं।

पूर्व न्यायाधीशों का नैतिक मोर्चा —

समर्थन में एकजुटता इस पत्र पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों आदर्श गोयल, हेमंत गुप्ता, और कई हाई कोर्टों के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जैसे अनिल देव सिंह तथा नरसिम्हा रेड्डी के हस्ताक्षर हैं।इसके अलावा एस.एन. ढींगरा, आर.के. गौबा, विनोद गोयल सहित अनेक प्रतिष्ठित नाम शामिल हैं।

इन सभी का मत स्पष्ट है —“न्यायपालिका लोकतंत्र की आत्मा है। इसे राजनीतिक हथकंडों में नहीं फंसने दिया जा सकता।

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