बी के झा
NSK

अयोध्या, 25 नवंबर
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर भगवा धर्मध्वजा के ऐतिहासिक आरोहण ने संपूर्ण देश को भक्ति और गौरव की अनुभूति से सराबोर कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत हज़ारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में हुआ यह आयोजन हिंदू सांस्कृतिक चेतना के एक नए शिखर को छूता दिखा। परंतु इसी दिव्यता और आस्था के बीच एक राजनीतिक विवाद ने जन्म ले लिया।“दलित होने की वजह से नहीं बुलाया गया”—सपा सांसद का आरोप
अयोध्या (फैजाबाद) से समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद ने दावा किया कि उन्हें समारोह में आमंत्रित नहीं किया गया, और इसके पीछे उनका दलित समाज से सम्बद्ध होना कारण बताया।एक्स पर पोस्ट करते हुए उन्होंने लिखा—“रामलला के दरबार में धर्म ध्वजा स्थापना कार्यक्रम में मुझे न बुलाए जाने का कारण मेरा दलित समाज से होना है। यह राम की मर्यादा नहीं, किसी की संकीर्ण सोच का परिचय है।”उन्होंने आगे कहा कि यदि निमंत्रण मिलता, तो वे नंगे पैर चलकर समारोह में पहुंचते।
कांग्रेस भी उतरी समर्थन में, ‘जाति-आधारित बहिष्कार’ का आरोप कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी आरोप लगाया कि दलित होने की वजह से प्रसाद को निमंत्रण नहीं दिया गया।उन्होंने कहा—“प्रधानमंत्री का कार्यक्रम हो और क्षेत्रीय सांसद को न बुलाया जाए, यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह उनकी जाति के कारण हुआ लगता है।”बीजेपी ने किया आरोपों का कड़ा खंडन भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हरिश्चंद्र श्रीवास्तव ने आरोप को तथ्यहीन और राजनीतिक बताया।
उन्होंने कहा—“यदि सांसद अवधेश प्रसाद में भगवान श्रीराम के प्रति सच्ची आस्था होती, तो वे अयोध्या वासियों के साथ स्वतः कार्यक्रम में पहुँचते। आरोप महज राजनीति और ध्यान आकर्षित करने का तरीका हैं।”बीजेपी ने समाजवादी पार्टी के इतिहास की ओर इशारा करते हुए तीखे शब्दों में कहा
—“रामभक्तों पर गोलियां चलवाने वाली पार्टी के नेताओं से ऐसे बयान की ही उम्मीद है। मंदिर आंदोलन में सपा की भूमिका जगजाहिर है।”
समर्थकों और विश्लेषकों की प्रतिक्रिया: “रामभक्ति पर राजनीति की छाया”अयोध्या के स्थानीय संतों, हिंदू संगठनों और कई शिक्षाविदों ने सपा सांसद के बयान को अवांछित बताया।विश्लेषकों का कहना है कि—ध्वजारोहण किसी पार्टी का कार्यक्रम नहीं, बल्कि संपूर्ण सनातन समाज का महासंगम था।जिस क्षण अयोध्या में धर्मध्वजा लहराकर “रामराज्य” की भावना जग रही थी, उसी समय ऐसे बयान आस्था को राजनीतिक रंग देने का प्रयास प्रतीत होते हैं।
रामलला के दर्शन के लिए 45 करोड़ लोग आ चुके हैं, परंतु सपा प्रमुख ने मंदिर का रुख तक नहीं किया—यह स्वयं बहुत कुछ कह देता है।एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने टिप्पणी की—“जब पूरी दुनिया में यह दिवस धर्म, मर्यादा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में मनाया जा रहा था, तब इस पावन अवसर पर राजनीति की छाया डालना अयोध्या की आत्मा को चोट पहुंचाने जैसा है।”भव्य आयोजन का अर्थ, और विवाद का सियासी संदेश
जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री का ध्वजारोहण कार्यक्रम करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए गर्व और आध्यात्मिक उत्सव का क्षण बना, वहीं विपक्ष के आरोपों ने यह स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में राम मंदिर केवल धार्मिक ही नहीं, राजनीतिक विमर्श का भी केंद्र बना रहेगा।अयोध्या में धार्मिक भावनाओं का महासागर उमड़ा था—
यह किसी दल का नहीं,किसी व्यक्ति का नहीं,यह भक्ति, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का पर्व था।फिर भी राजनीतिक जोड़-तोड़ और बयानबाज़ी ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि देश की राजनीति में “राम” का नाम चाहे जितना पवित्र हो, उस पर सत्ता की राजनीति की छाया बार-बार पड़ती रहती है।
