सम्राट चौधरी से मिले नीतीश मिश्रा — बधाई भी, संदेश भी; कैबिनेट में जगह न मिलने पर मिथिलांचल में बढ़ी नाराज़गी

बी के झा

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नई दिल्ली/ पटना, 30 नवंबर

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में एनडीए की ऐतिहासिक 202 सीटों की जीत के बाद प्रदेश में राजनीतिक तापमान शांत तो है, पर एक नई चर्चा पूरे मिथिलांचल में तेजी से उभर रही है।नई सरकार में डिप्टी सीएम सह गृह मंत्री बनाए गए सम्राट चौधरी से रविवार को पूर्व मंत्री व झंझारपुर के भाजपा विधायक नीतीश मिश्रा मुलाकात करने पहुंचे।

उन्होंने उपमुख्यमंत्री को एनडीए की प्रचंड विजय के लिए बधाई दी और नवनियुक्त जिम्मेदारियों के लिए शुभकामनाएं दीं। यह मुलाकात पटना स्थित उपमुख्यमंत्री के आवास पर हुई।कैबिनेट से बाहर… मिश्रा समर्थकों में निराशाध्यान देने वाली बात यह रही कि इस बार के एनडीए कैबिनेट में नीतीश मिश्रा को मंत्री पद नहीं मिला।

जबकि—उनका नाम मंत्री पद के संभावित दावेदारों में प्रमुखता से चर्चा में था,वे पिछली सरकार में उद्योग मंत्री रह चुके हैं,और इस चुनाव में उन्होंने चौथी बार रिकॉर्ड विजय दर्ज कर 1,07,958 मत हासिल किए।बीजेपी के वरिष्ठ और लोकप्रिय नेता होने के कारण यह उम्मीद थी कि उन्हें मंत्रिमंडल में जगह निश्चित मिलेगी। लेकिन सूची में उनका नाम न आने से मिथिलांचल,

विशेषकर ब्राह्मण समुदाय में असंतोष बढ़ा है।सोशल मीडिया पर भी गूंजा संदेश सम्राट चौधरी से मुलाकात के बाद नीतीश मिश्रा ने एक्स पर लिखा—“

आज बिहार के माननीय उपमुख्यमंत्री सह गृह मंत्री श्री सम्राट चौधरी जी से मुलाक़ात कर विधानसभा चुनावों में एनडीए को मिली ऐतिहासिक जीत हेतु उन्हें बधाई दी तथा सरकार में मिले नव दायित्व हेतु शुभकामनाएं दी।”उनके शब्द संतुलित जरूर थे, लेकिन समर्थकों में उठ रही बेचैनी छिपी नहीं रह सकी।

मिथिलांचल का उबलता जन-मानस झंझारपुर क्षेत्र और पूरे मिथिलांचल में यह सवाल तेजी से उठ रहा है—”योग्यता, अनुभव और साफ-सुथरी छवि के बावजूद नीतीश मिश्रा को मंत्री क्यों नहीं बनाया गया?”

स्थानीय शिक्षाविदों और समाज के कई प्रभावी वर्गों ने सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताते हुए कहा है कि—“अमित शाह पढ़े-लिखे, विद्वान और ब्राह्मण समाज के नेतृत्वकर्ताओं को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।”“ब्राह्मण किसी पार्टी का पिछलग्गू नहीं है; वह अपनी विद्वता से पहचान बनाता है, किसी की कृपा से नहीं।”“यदि मिथिलांचल की उपेक्षा जारी रही, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में इसका परिणाम भाजपा को भुगतना पड़ेगा।”यह बयान जबरदस्त प्रतिक्रिया का कारण बना है और क्षेत्र में राजनीतिक समीकरणों पर असर डालता दिखाई दे रहा है।

नीतीश मिश्रा की ‘बड़ी राजनीति’ पर भी नजर दिलचस्प बात यह है कि मिश्रा न केवल लोकप्रिय विधायक हैं, बल्कि वे पूर्व मुख्यमंत्री स्व. जगन्नाथ मिश्र के पुत्र हैं।बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष की रेस में भी उनका नाम चर्चा में है।ऐसे में कैबिनेट में जगह न मिलना कई राजनीतिक संकेत छोड़ता है—

क्या यह संतुलन साधने की रणनीति है?

या बगैर पद के भी उन्हें संगठन में बड़ी जिम्मेदारी देने की तैयारी?

या वास्तव में मिश्रा समर्थकों का आक्रोश भविष्य की चुनौती बनेगा?

बधाई के पीछे छिपा संदेश

सम्राट चौधरी के घर जाकर बधाई देना निश्चित रूप से राजनीतिक शिष्टाचार था,लेकिन इस रूप में भी देखा जा रहा है कि नीतीश मिश्रा ने अपने संयमित रवैये सेयह संदेश दिया कि वे संगठन और नेतृत्व के प्रति समर्पित तो हैं, लेकिन समर्थकों की आकांक्षाओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

भविष्य की राजनीति पर बड़ा असर संभव मिथिलांचल के बढ़ते असंतोष को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।और यदि मंत्रिमंडल विस्तार में भी नीतीश मिश्रा को जगह नहीं मिली,तो

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—“2029 में भाजपा को इसका गहरा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

”फिलहाल बिहार की राजनीति में बधाई, नाराज़गी और रणनीति—तीनों साथ-साथ चल रही हैं।

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