सुप्रीम कोर्ट में SIR याचिकाओं पर CJI सूर्यकांत सख्त—“पब्लिसिटी का जरिया बना लिया है, बंद कीजिए ऐसी याचिकाएं”

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 11 दिसंबर

देश की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) पर चल रही याचिकाओं की धारा ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के अंदर एक अलग ही माहौल पैदा कर दिया। लगातार दायर हो रही याचिकाओं से नाराज होकर मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने तीखी टिप्पणी की—पब्लिसिटी पाने का जरिया बना लिया है। अब रजिस्ट्री कोई नई याचिका स्वीकार न करे।

CJI की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ दिनों में अलग-अलग राज्यों से SIR को लेकर दर्जनों याचिकाएं दाखिल हुई हैं, जिससे कोर्ट का समय सिर्फ इसी मामले में खपने लगा है।CJI ने कहा—“हर केस को बराबरी का समय चाहिए, SIR पूरा दिन खा जाता है”सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने अदालत के कामकाज की वास्तविकताएँ सामने रखीं।उन्होंने कहा:कुछ मामले जैसे SIR कोर्ट का सारा समय ले लेते हैं। MACT जैसे आम आदमी के मुआवजा मामलों की सुनवाई तक नहीं हो पाती। शाम 4 बजे लोग बिना सुने लौट जाते हैं—

उन्हें पता ही नहीं होता कि उनका नंबर कब आएगा।”CJI ने न्यायालय में समय के “संतुलित वितरण” पर जोर देते हुए कहा कि अब बार को हर मामले के लिए स्पष्ट टाइमलाइन देनी होगी।

रेलवे दुर्घटना की मिसाल—“उस विधवा के चेहरे की मुस्कान सोचिए”एक मार्मिक उदाहरण देते हुए CJI ने कहा—

एक रेलवे दुर्घटना में व्यक्ति की मौत हुई। कोर्ट ने मुआवजा दिया, लेकिन परिवार को कुछ नहीं मिला। हमने उन्हें ढूंढा, भुगतान सुनिश्चित किया—उस विधवा के चेहरे की मुस्कान सोचिए।CJI का यह उदाहरण साफ संकेत देता है कि अदालत उन मामलों को प्राथमिकता देना चाहती है जिनका सीधा प्रभाव जनता के जीवन पर पड़ता है।“

अब नई SIR याचिकाएँ स्वीकार न हों”—CJI का निर्देश याचिकाओं की बाढ़ पर CJI ने कड़ा रुख दिखाते हुए कहा:कई लोग सिर्फ पब्लिसिटी के लिए आ रहे हैं। SIR पर और नए मामलों की आवश्यकता नहीं है। रजिस्ट्री किसी नई याचिका को स्वीकार न करे।”इसके साथ ही उन्होंने राज्यों के मामलों को अलग-अलग तारीखों पर सुनने की व्यवस्था कर दी।

कौन-कौन से राज्य कब सुने जाएंगे?

राज्य तारीख

तमिलनाडु 16 दिसंबर

असम 16 दिसंबर

पश्चिम बंगाल 16 दिसंबर

बिहार आज ही सुनवाई

UP व केरल 18 दिसंबर

कानूनविदों की प्रतिक्रिया—“CJI का संदेश साफ: अदालत कोई राजनीतिक मंच नहीं”वरिष्ठ संविधान विशेषज्ञ प्रो. आर.के. तिवारी के अनुसार—CJI का यह संदेश महत्वपूर्ण है। न्यायालय जनता की अंतिम आशा है, न कि राजनीतिक रणनीतियों का मंच। SIR पर बार-बार याचिकाएँ दाखिल कर अदालत का समय जकड़ना न्याय के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।पूर्व जज और विधि विश्लेषक जस्टिस (रि.) ए. घोष ने इसे न्यायपालिका की “प्रशासनिक दृढ़ता” बताया।CJI ने सही कहा—न्याय अकादमिक बहसों का मंच नहीं, जनसरोकार का तंत्र है।

”शिक्षाविदों की प्रतिक्रिया—“SIR बहस को कानून की कक्षा न बनाया जाए”JNU की प्रोफेसर साधना मुखर्जी ने कहा—SIR एक तकनीकी प्रक्रिया है। इसे लेकर राजनीति गरम है, पर कोर्ट में इसे लेकर शैक्षणिक सेमिनार जैसा वातावरण बनाना अन्याय है। अदालत को अपना समय समाज के कमजोर वर्गों को देना चाहिए।”

समाजसेवी संगठनों का कहना—“CJI ने जनता के दर्द को समझा”जनस्वराज्य मंच के संयोजक बलराम मेहता ने कहा—मुआवजा, मजदूर दुर्घटनाएँ, महिला उत्पीड़न, वरिष्ठ नागरिकों के अधिकार—

ये असली मुद्दे हैं।

CJI ने जो बात कही वह जनता की आवाज़ है। SIR पर राजनीतिक लड़ाई लड़ने वालों को अदालत का समय बर्बाद नहीं करना चाहिए।

”विश्लेषण :

अदालत का बढ़ता बोझ vs राजनीतिक याचिकाओं का दखल सुप्रीम कोर्ट पिछले कुछ वर्षों से ऐसे मामलों से बोझिल हो रहा है जिनमें राजनीतिक लाभ मीडिया ध्यान सोशल मीडिया पर पोजिशनिंग जैसे उद्देश्यों की भूमिका बढ़ती जा रही है।

CJI सूर्यकांत का रुख इस बढ़ते “पब्लिसिटी लिटिगेशन” पर एक कठोर संदेश के रूप में देखा जा रहा है।

निष्कर्ष :

CJI का संदेश—अदालत जनता के लिए है, शो-केसिंग के लिए नहींSIR के मामलों में CJI का हस्तक्षेप केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि न्यायपालिका का सामाजिक चरित्र दर्शाने वाला कदम है।जहाँ SIR का महत्व निर्विवाद है, वहीं अदालत नहीं चाहती कि यह अन्य जनसेवी मामलों के लिए बाधक बने।

अदालत का यह रुख आने वाले दिनों में राजनीतिक याचिकाओं की प्रकृति को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है।

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