तीन मिनट की लोकसभा, 111% उत्पादकता और लोकतंत्र का विरोधाभास* — शीतकालीन सत्र के आखिरी दिन संसद के भीतर शोर, बाहर सवाल

बी के झा

NSK

नई दिल्ली, 19 दिसंबर

संसद का शीतकालीन सत्र शुक्रवार को औपचारिक रूप से समाप्त हो गया, लेकिन इसका अंतिम दिन भारतीय संसदीय इतिहास में एक गहरे प्रतीक के रूप में दर्ज हो गया। लोकसभा मात्र तीन मिनट चली, राज्यसभा करीब बीस मिनट, और इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ने पूरे सत्र की उत्पादकता 111 प्रतिशत घोषित की। यह आंकड़ा जहां सत्ता पक्ष के लिए उपलब्धि का प्रमाण बना, वहीं विपक्ष और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह लोकतंत्र के कामकाज पर एक गंभीर बहस का विषय बन गया।तीन मिनट में स्थगित लोकसभा शुक्रवार सुबह जैसे ही लोकसभा की कार्यवाही शुरू हुई, विपक्ष ने वीबी–जी राम जी बिल को लेकर जोरदार हंगामा शुरू कर दिया।

विपक्षी सांसद वेल में उतर आए, नारेबाजी हुई और सदन का सामान्य संचालन असंभव हो गया।लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने हंगामे के बीच ही प्रश्नकाल शुरू कराने का प्रयास किया और सदस्यों से अपनी सीटों पर लौटने की अपील की, लेकिन शोर थमा नहीं।परिणामस्वरूप, कार्यवाही शुरू होने के महज तीन मिनट बाद ही लोकसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करना पड़ा।

राज्यसभा भी हंगामे की भेंट उच्च सदन राज्यसभा में भी हालात बहुत अलग नहीं रहे। सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने हंगामे के बावजूद कार्यवाही जारी रखने की कोशिश की और करीब 20 मिनट तक सदन चला। लेकिन लगातार व्यवधान के चलते अंततः उन्हें भी राज्यसभा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने की घोषणा करनी पड़ी।

111 प्रतिशत उत्पादकता का दावा कार्यवाही स्थगित करने से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने पूरे शीतकालीन सत्र का लेखा-जोखा पेश किया।उन्होंने बताया कि—इस सत्र में 15 बैठकें हुईं सदन की कुल उत्पादकता 111 प्रतिशत रही की दिन देर रात तक सदन चला विधायकी कार्यों में सदस्यों का सहयोग मिला

अध्यक्ष ने सभी सांसदों का धन्यवाद करते हुए कहा कि संसदीय कार्यों में सहयोग लोकतंत्र की ताकत है।

सरकार का पक्ष: ‘

काम भी, निर्णय भी’सत्ता पक्ष का कहना है कि हंगामे के बावजूद सत्र ऐतिहासिक रहा।

राजनीतिक विश्लेषक और पूर्व सांसद मानते हैं कि सरकार ने स्पष्ट बहुमत का उपयोग करते हुए अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाया।एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं,111 प्रतिशत उत्पादकता यह दिखाती है कि सरकार ने समय का अधिकतम उपयोग किया। देर रात की बैठकों और विधेयकों के पारित होने से यह साफ है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया रुकी नहीं।”

विपक्ष का सवाल: ‘

उत्पादकता या औपचारिकता?’वहीं विपक्ष ने इस आंकड़े पर तीखा सवाल खड़ा किया है।विपक्षी दलों का कहना है कि जब आखिरी दिन लोकसभा तीन मिनट में स्थगित हो जाए, तो उत्पादकता के आंकड़े लोकतांत्रिक भावना को नहीं दर्शाते।एक प्रमुख विपक्षी नेता का कहना है,उत्पादकता केवल घंटों की गणना नहीं है। बहस, असहमति और सवाल-जवाब ही संसद की आत्मा हैं। अगर आवाज़ दबे, तो 111 प्रतिशत भी खोखला है।शिक्षाविदों की राय: लोकतंत्र बनाम दक्षता राजनीति पर नजर रखने वाले शिक्षाविद इस स्थिति को ‘दक्षता और लोकतंत्र के टकराव’ के रूप में देखते हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार,आज संसद में काम तेजी से हो रहा है, लेकिन संवाद कम हो रहा है। यह ट्रेंड खतरनाक हो सकता है। लोकतंत्र केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि बहस से जीवित रहता है।”विवाद की जड़: वीबी–जी राम जी बिल इस पूरे हंगामे की धुरी बना वीबी–जी राम जी बिल, जिसे सरकार मनरेगा के विकल्प के रूप में लाई है।गुरुवार देर रात लोकसभा में इस पर चर्चा हुई और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सरकार की ओर से जवाब दिया।

बिल लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा में भी मंजूरी पा चुका है और अब कानून बनने की राह पर है।विपक्ष का आरोप है कि यह गरीबों की आजीविका से जुड़ी योजना को कमजोर करता है, जबकि सरकार इसे सुधारात्मक कदम बता रही है।

निष्कर्ष:

उपलब्धि या चेतावनी?शीतकालीन सत्र का अंतिम दिन एक सवाल छोड़ गया है—क्या संसद की सफलता का पैमाना केवल उत्पादकता का प्रतिशत होना चाहिए, या फिर संवाद और सहमति भी उतने ही जरूरी हैं?तीन मिनट में स्थगित लोकसभा और 111 प्रतिशत उत्पादकता का दावा—दोनों मिलकर भारतीय लोकतंत्र के सामने एक आईना रखते हैं, जिसमें उपलब्धियों के साथ-साथ चेतावनियां भी साफ दिखाई देती हैं।

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