बी के झा
NSK

नई दिल्ली / जोधपुर, 31 जनवरी
जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद सोनम वांगचुक की तबीयत का बिगड़ना अब महज एक चिकित्सा मामला नहीं रह गया है। यह घटना भारतीय दंड व्यवस्था, जेल प्रशासन की जवाबदेही और कैदियों के मौलिक अधिकारों को लेकर एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बनती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर वांगचुक को एम्स जोधपुर ले जाकर विशेषज्ञ डॉक्टरों से जांच कराई गई है, और अब उनकी मेडिकल रिपोर्ट सीधे सर्वोच्च अदालत के समक्ष पेश की जाएगी।
एम्स जोधपुर में जांच, सेहत पर गंभीर चिंता
एम्स सूत्रों के अनुसार, सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह मेडिकल परीक्षण के लिए अस्पताल लाया गया, जहां गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग में लगभग डेढ़ घंटे तक उनकी विस्तृत जांच हुई। उन्हें पेट दर्द, गैस्ट्रो-इंटेस्टाइनल समस्याओं और लगातार असहजता की शिकायत है। इससे पहले शुक्रवार को भी उन्हें एम्स लाया गया था।सुप्रीम कोर्ट ने 2 फरवरी तक उनकी विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट तलब की है, जिससे संकेत मिलता है कि अदालत इस मामले को केवल औपचारिकता के तौर पर नहीं, बल्कि कैदी के जीवन और स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार के रूप में देख रही है।
कानूनविदों की टिप्पणी: यह अनुच्छेद 21 का प्रश्न है
वरिष्ठ कानूनविदों का मानना है कि यह मामला सीधे-सीधे संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जुड़ा है।संवैधानिक विशेषज्ञ प्रो. (डॉ.) के.एन. त्रिपाठी कहते हैं—“किसी कैदी को सजा भोगते समय भी स्वास्थ्य और मानवीय गरिमा का अधिकार प्राप्त है। यदि जेल के पानी या परिस्थितियों से उसकी सेहत बिगड़ रही है, तो यह प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संवैधानिक उल्लंघन है।”कानूनी जानकार यह भी याद दिलाते हैं कि सुप्रीम कोर्ट पूर्व में कई फैसलों में कह चुका है कि ‘जेल सजा का स्थान है, यातना का नहीं’।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: प्रशासन से जवाबदेही
सोनम वांगचुक की पत्नी की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ ने जेल प्रशासन को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि—वांगचुक की जांच विशेषज्ञ डॉक्टर से कराई जाए उनकी स्वास्थ्य स्थिति की निष्पक्ष रिपोर्ट अदालत में सौंपी जाए राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने अदालत को बताया कि पिछले चार महीनों में वांगचुक की 21 बार जेल डॉक्टरों से जांच कराई गई है। लेकिन इस दलील को वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने चुनौती देते हुए कहा—“अगर 21 जांचों के बावजूद हालत बिगड़ रही है, तो यह इलाज की नहीं, व्यवस्था की विफलता है।”
राजनीतिक विश्लेषक: जेल व्यवस्था फिर सवालों के घेरे में
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मामला सरकार के लिए संवेदनशील नैरेटिव संकट पैदा कर सकता है। मानवाधिकार और नागरिक स्वतंत्रता के सवाल
अक्सर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचते हैं।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं—“सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने की खबर विपक्ष को सरकार की जेल व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर हमला करने का अवसर दे रही है।”
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया: ‘यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं
’विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को व्यापक संदर्भ में उठाया है।कांग्रेस नेताओं ने कहा कि “कैदियों की सेहत से खिलवाड़ लोकतंत्र की आत्मा पर चोट है।”वाम दलों ने इसे “राज्य द्वारा संस्थागत उपेक्षा” करार दिया।कुछ क्षेत्रीय दलों ने जेलों में पानी, स्वच्छता और चिकित्सा सुविधाओं की राष्ट्रीय ऑडिट की मांग उठाई।
शिक्षाविदों और मानवाधिकार चिंतकों की चेतावनी
शिक्षाविदों और सामाजिक चिंतकों का कहना है कि भारत में जेलें अब भी सुधार गृह नहीं बन पाई हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक समाजशास्त्री के अनुसार—“जब किसी कैदी की बीमारी को अदालत के हस्तक्षेप के बिना गंभीरता से नहीं लिया जाता, तो यह पूरे तंत्र की असंवेदनशीलता को दर्शाता है।”मानवाधिकार संगठनों ने जेलों के पानी और बुनियादी सुविधाओं पर स्वतंत्र जांच की मांग की है।केवल मेडिकल रिपोर्ट नहीं, व्यवस्था की परीक्षा
सोनम वांगचुक की मेडिकल रिपोर्ट अब केवल एक दस्तावेज़ नहीं होगी—यह रिपोर्ट बताएगी कि—क्या जेल प्रशासन ने अपने कर्तव्यों का पालन किया?क्या कैदियों के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाती है?
और क्या न्याय केवल अदालतों तक सीमित है, या जेल की दीवारों के भीतर भी जीवित है?
निष्कर्ष:
अदालत की निगाह, देश की नजर
सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाली यह मेडिकल रिपोर्ट न केवल सोनम वांगचुक की सेहत का हाल बताएगी, बल्कि भारतीय जेल व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का भी आईना होगी।
प्रश्न यही है—क्या न्याय की रोशनी जेल की सलाखों के भीतर तक पहुंचेगी, या यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
