“15 दिन, 294 सीटें और सत्ता का लक्ष्य” — बंगाल में अमित शाह का महाअभियान, सियासत का तापमान चरम पर”

बी के झा

NSK

कोलकाता, 8 अप्रैल

पश्चिम बंगाल की सियासत में चुनावी शंखनाद के साथ ही रणनीतियों का महासंग्राम तेज हो गया है। केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के सबसे बड़े रणनीतिकार अमित शाह ने ऐलान किया है कि वे आगामी विधानसभा चुनावों के दौरान लगातार 15 दिनों तक बंगाल में डेरा डालेंगे। यह केवल एक राजनीतिक दौरा नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन की दिशा में एक संगठित “वार रूम अभियान” माना जा रहा है।

भवानीपुर से बिगुल, सीधा चुनौती

भवानीपुर की रैली से शाह ने सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनौती देते हुए कहा:“भवानीपुर में जीत ही बंगाल में बदलाव का शॉर्टकट है।”भाजपा ने इस सीट पर शुभेंदु अधिकारी को उतारकर मुकाबले को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया है। नंदीग्राम में पहले ही ममता बनर्जी को मात दे चुके अधिकारी अब दो-दो मोर्चों पर उतरकर चुनाव को हाई-वोल्टेज बना रहे हैं।

15 दिन का “ग्राउंड वॉर”: क्या है पूरा प्लान?

सूत्रों के अनुसार, अमित शाह का यह अभियान केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहेगा:रात 2 बजे तक बैठकें — बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से सीधा संवादक्लस्टर रणनीति — राज्य को छोटे-छोटे चुनावी क्षेत्रों में बांटकर निगरानीमाइक्रो मैनेजमेंट — टिकट विवाद, असंतोष और स्थानीय समीकरणों पर फोकसटारगेट सीटें — वे 40 सीटें जहां 2021 में भाजपा 5% से कम अंतर से हारीसिलीगुड़ी, बालुरघाट, हुगली, दुर्गापुर और खड़गपुर जैसे इलाकों में शाह का रात्रि प्रवास तय माना जा रहा है—जहां 2019 के बाद भाजपा की पकड़ मजबूत हुई थी।

“बिहार मॉडल” और पुरानी जीत का फॉर्मूला

भाजपा के भीतर इस रणनीति को “बिहार मॉडल” कहा जा रहा है, जहां गहन संगठनात्मक निगरानी और क्लस्टर रणनीति से पार्टी को बड़ी सफलता मिली थी।बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में भी इसी मॉडल के प्रयोग से भाजपा ने चुनावी समीकरण बदले थे।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार:“शाह का यह मॉडल चुनाव को ‘मैक्रो’ नहीं, ‘माइक्रो’ स्तर पर जीतने की रणनीति है—जहां हर बूथ एक युद्धक्षेत्र बन जाता है।”

विपक्ष का हमला: “ध्रुवीकरण की कोशिश

”सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस अभियान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।विपक्ष का आरोप:गृहमंत्री अपने पद का राजनीतिक उपयोग कर रहे हैं बंगाल की “गंगा-जमुनी तहज़ीब” को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की रणनीति एक वरिष्ठ टीएमसी नेता ने कहा:“बंगाल की राजनीति डर और विभाजन से नहीं, संस्कृति और समावेश से चलती है।”

मुस्लिम संगठनों की चिंता

कई मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने भी इस अभियान को लेकर आशंका जताई है:“चुनाव के दौरान सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है”“धार्मिक मुद्दों को राजनीतिक हथियार बनाया जा रहा है”एक मौलाना ने कहा:“बंगाल हमेशा भाईचारे का प्रतीक रहा है, इसे चुनावी प्रयोगशाला नहीं बनाया जाना चाहिए।”

शिक्षाविदों और समाजसेवियों की राय

शिक्षाविदों का मानना है कि:यह चुनाव केवल सत्ता का नहीं, सामाजिक संतुलन का भी हैं राजनीतिक दलों को विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए स्थानीय समाजसेवियों का कहना है:“ग्राउंड पर लोगों की असली चिंता रोजगार, महंगाई और बुनियादी सुविधाएं हैं, न कि राजनीतिक बयानबाज़ी।”

कानूनविदों का नजरियासंवैधानिक विशेषज्ञों ने इस पूरे घटनाक्रम को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए कहा:

किसी भी नेता को चुनाव प्रचार का अधिकार है

लेकिन पद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखना भी जरूरी

चुनाव आयोग की भूमिका अहम होगी

चुनावी गणित:

आंकड़ों की कहानी

2021 विधानसभा:

भाजपा 3 से बढ़कर 77 सीटों परवोट शेयर: ~38%2024 लोकसभा: भाजपा 18 से घटकर 12 सीटेंअब अमित शाह की नजर उन सीटों पर है जहां पार्टी “जीतते-जीतते हार गई”।

निष्कर्ष:

बंगाल का यह चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि रणनीति, सामाजिक संतुलन और राजनीतिक धैर्य की परीक्षा बन चुका है।अमित शाह का 15 दिवसीय यह महाअभियान क्या भाजपा को 175+ सीटों के लक्ष्य तक पहुंचा पाएगा, या ममता बनर्जी अपनी जमीन बचाने में सफल रहेंगी—यह आने वाला समय तय करेगा।फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की धरती पर सियासत का तापमान अपने चरम पर है,

और हर दिन एक नए राजनीतिक मोड़ की पटकथा लिखी जा रही है।

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