बी के झा
NSK

धार/इंदौर, 8 अप्रैल
मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ में चल रही सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से रखी गई यह दलील— “महज़ नमाज़ पढ़ लेने से कोई स्थान कानूनी रूप से मस्जिद नहीं बन जाता”—ने न केवल अदालत में बल्कि राजनीतिक, धार्मिक और बौद्धिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया है।यह मामला केवल एक इमारत के धार्मिक स्वरूप का नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और संवैधानिक व्याख्या के जटिल संगम का प्रतीक बन चुका है।
विवाद की जड़: मंदिर या मस्जिद?
धार का भोजशाला परिसर, जिसे हिंदू पक्ष वाग्देवी (मां सरस्वती) का प्राचीन मंदिर मानता है, वहीं मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है।विवादित स्थल वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है।हिंदू पक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने अदालत में तर्क दिया कि:1034 ईस्वी में परमार राजा भोज द्वारा स्थापित सरस्वती मंदिर पहले से मौजूद थाआक्रांताओं ने मंदिर को ध्वस्त कर उसके अवशेषों से ढांचा खड़ा कियापरिसर में आज भी मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख, हवन कुंड और मंडप मौजूद हैंउनका स्पष्ट कहना था:“मस्जिद बनने के लिए जमीन का वैध वक्फ होना आवश्यक है, केवल नमाज़ पढ़ने से कोई स्थल मस्जिद नहीं हो जाता।”
मुस्लिम पक्ष की आपत्ति
मुस्लिम पक्ष ने ASI की रिपोर्ट और हिंदू पक्ष के दावों को खारिज करते हुए आरोप लगाया कि:सर्वेक्षण में “पूर्वाग्रह” झलकता हैकई आपत्तियों को नजरअंदाज किया गयाऐतिहासिक तथ्यों को चयनात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गयामौलाना संगठनों का कहना है कि:“सदियों से जहां नमाज़ अदा होती रही हो, उस स्थल की धार्मिक पहचान को नकारना सामाजिक सौहार्द के लिए खतरनाक होगा।”
अदालत में क्या चल रहा है?
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की खंडपीठ—जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी—इस मामले की लगातार सुनवाई कर रही है।गौरतलब है कि 2003 के ASI आदेश के अनुसार:हिंदुओं को हर मंगलवार पूजा की अनुमतिमुस्लिमों को हर शुक्रवार नमाज़ की अनुमतियानी वर्तमान व्यवस्था साझा उपयोग (shared usage) पर आधारित है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया: ध्रुवीकरण तेज
सत्तापक्ष का रुख
सत्तारूढ़ दल से जुड़े नेताओं का मानना है कि:ऐतिहासिक “अन्याय” को सुधारने का समय आ गया हैASI के वैज्ञानिक सर्वे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए
विपक्ष की चिंता
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को संवेदनशील बताते हुए कहा:ऐसे विवाद सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचा सकते हैंन्यायिक प्रक्रिया को “राजनीतिक नैरेटिव” से दूर रखना जरूरी हैएक वरिष्ठ विपक्षी नेता ने कहा:“देश को इतिहास की लड़ाई में उलझाने के बजाय वर्तमान और भविष्य पर ध्यान देना चाहिए।”
कानूनविदों की राय: जटिल है मामला
संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार यह मामला कई स्तरों पर पेचीदा है:
धार्मिक कानून बनाम सिविल कानूनहिंदू कानून: प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मंदिर स्थायी धार्मिक संपत्तिइस्लामी कानून: वक्फ के बिना मस्जिद का दर्जा संदिग्ध
पुरातात्विक साक्ष्य बनाम धार्मिक आस्थाASI रिपोर्ट मंदिर की पूर्व उपस्थिति की ओर संकेत करती हैलेकिन धार्मिक पहचान केवल पुरातत्व से तय नहीं होती
न्यायिक मिसालें (precedents)अयोध्या विवाद की तरह यहाँ भी इतिहास, आस्था और कानून का संतुलन महत्वपूर्ण होगा
शिक्षाविदों का दृष्टिकोण
इतिहासकारों और शिक्षाविदों का कहना है:भारत में कई धार्मिक स्थल “परतदार इतिहास” (layered history) के उदाहरण हैंभोजशाला भी उसी श्रेणी का मामला हो सकता हैएक प्रोफेसर ने कहा:“इतिहास को न्यायालय में पूरी तरह सुलझाना हमेशा संभव नहीं होता, क्योंकि वह कई दृष्टिकोणों से देखा जाता है।”
धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
हिंदू संतों का मत
“मंदिर का मूल स्वरूप कभी समाप्त नहीं होता”“भोजशाला में केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए
” मुस्लिम मौलानाओं का मत“
सदियों की इबादत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता”“साझा व्यवस्था ही शांति का रास्ता है”
बड़ा सवाल: समाधान क्या?
भोजशाला विवाद आज सिर्फ एक कानूनी केस नहीं, बल्कि भारत की बहुलतावादी पहचान की परीक्षा बन चुका है।संभावित रास्ते:न्यायालय का अंतिम निर्णयआपसी सहमति से समाधानवर्तमान साझा व्यवस्था को बनाए रखना📰 निष्कर्ष:भोजशाला का यह विवाद हमें एक गहरी सच्चाई से रूबरू कराता है—भारत में इतिहास, आस्था और कानून अक्सर एक-दूसरे से टकराते नहीं, बल्कि उलझते हैं।
अब निगाहें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि इस ऐतिहासिक स्थल की पहचान क्या होगी—
एक मंदिर, एक मस्जिद, या फिर दोनों के बीच संतुलन का प्रतीक।
