बिहार में शराबबंदी पर सियासी संग्राम: अनंत सिंह की मांग बनाम सरकार का सख्त रुख

बी के झा

NSK

पटना, 23‌ अप्रैल

बिहार की राजनीति में एक बार फिर शराबबंदी कानून बहस के केंद्र में आ गया है। मोकामा से जेडीयू विधायक अनंत सिंह द्वारा शराबबंदी खत्म करने की मांग ने सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर ही वैचारिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। हालांकि, इस मुद्दे पर सरकार की ओर से स्पष्ट और कड़ा संदेश देते हुए डिप्टी मुख्यमंत्री विजय चौधरी ने दो टूक कहा है कि यह “व्यक्तिगत राय” है, न कि पार्टी की आधिकारिक नीति।

व्यक्तिगत बयान या राजनीतिक संकेत?

अनंत सिंह ने हाल ही में यह तर्क दिया था कि शराबबंदी के कारण राज्य के युवा वैकल्पिक और अधिक खतरनाक नशों की ओर बढ़ रहे हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस मुद्दे पर वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से बातचीत करेंगे।राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह बयान केवल व्यक्तिगत असंतोष नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और राजनीतिक दबाव का भी प्रतिबिंब हो सकता है, जहां कानून के प्रभाव और उसके क्रियान्वयन पर सवाल उठ रहे हैं।

सरकार का रुख: नीति पर कोई समझौता नहीं

विजय चौधरी ने साफ शब्दों में कहा कि किसी भी व्यक्ति की राय को पार्टी का रुख नहीं माना जा सकता। उन्होंने जेडीयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि केवल आधिकारिक पदों पर बैठे लोगों के बयान ही पार्टी की नीति माने जाते हैं।उन्होंने यह भी जोड़ा कि “किसी नीति का मंत्रिमंडल के विस्तार या राजनीतिक समीकरणों से कोई लेना-देना नहीं होता।” यह बयान स्पष्ट करता है कि सरकार फिलहाल शराबबंदी कानून में किसी बड़े बदलाव के मूड में नहीं है।

कानून की पृष्ठभूमि और सामाजिक आयाम

बिहार में 5 अप्रैल 2016 को शराबबंदी कानून लागू किया गया था, जब नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार थी। इस निर्णय को विशेष रूप से महिलाओं के सशक्तिकरण और घरेलू हिंसा में कमी से जोड़कर देखा गया।हालांकि, समय के साथ इसके क्रियान्वयन, अवैध शराब के कारोबार और न्यायिक बोझ जैसे मुद्दों ने इस कानून को विवादों के घेरे में ला खड़ा किया है।

विपक्ष और सहयोगियों की प्रतिक्रिया

विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने का मौका नहीं छोड़ा। आरजेडी और कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि शराबबंदी “नीति के स्तर पर सही लेकिन क्रियान्वयन में विफल” रही है।वहीं, एनडीए के सहयोगी दलों में भी मतभेद दिखने लगे हैं। जीतन राम मांझी की पार्टी पहले ही इस कानून में संशोधन की मांग उठा चुकी है। इससे यह स्पष्ट होता है कि गठबंधन के भीतर भी इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं है।

कानूनविदों और शिक्षाविदों की राय

कानून विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी कानून ने न्यायालयों पर अतिरिक्त बोझ डाला है, क्योंकि बड़ी संख्या में मामले इस कानून से जुड़े हुए हैं।वहीं, शिक्षाविदों और समाजशास्त्रियों का तर्क है कि किसी भी सामाजिक बुराई को केवल प्रतिबंध से खत्म नहीं किया जा सकता; इसके लिए जागरूकता, पुनर्वास और वैकल्पिक नीतियों की भी आवश्यकता होती है।

चुनौती: नीति बनाम यथार्थ

बिहार में शराबबंदी आज एक “नीति” से ज्यादा “राजनीतिक प्रतीक” बन चुकी है। सरकार के लिए इसे बनाए रखना उसकी प्रतिबद्धता और छवि का सवाल है, जबकि विरोधियों के लिए यह जमीनी समस्याओं को उजागर करने का मुद्दा।

निष्कर्ष:

क्या बदलेगा कानून या जारी रहेगा टकराव?

अनंत सिंह के बयान ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि शराबबंदी पर बहस अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार इस नीति पर अडिग रहती है या जमीनी दबाव के चलते इसमें संशोधन की कोई राह निकालती है।

फिलहाल, बिहार की राजनीति में यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभावनाओं की परीक्षा बन चुका है।

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