क्या ममता विपक्षी एकता की धुरी बन सकती हैं?

बी के झा

नई दिल्ली/ कोलकाता, 6 मई

हार, अहंकार और हकीकत के बीच INDIA गठबंधन की नई कहानी

भारतीय राजनीति में हार अक्सर अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत का संकेत होती है। पश्चिम बंगाल के ताजा चुनाव परिणामों ने भी यही साबित किया है। ममता बनर्जी की पराजय ने न सिर्फ राज्य की सत्ता बदली, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति को भी नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।

बंगाल: सत्ता परिवर्तन और सियासी प्रतीक

अगर शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बनते हैं, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं होगा—यह एक राजनीतिक प्रतीक होगा। कभी ममता के सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे शुभेंदु का सत्ता के शीर्ष पर पहुंचना “राजनीतिक विश्वासघात” की उस कहानी को मजबूत करेगा, जो भारतीय राजनीति में बार-बार दोहराई जाती है।ममता का यह कहना कि “वह हारी नहीं, हराई गई हैं”,

लोकतांत्रिक संस्थाओं—खासतौर पर चुनाव आयोग—पर गंभीर सवाल खड़े करता है। लेकिन आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। रिकॉर्ड 93% मतदान और उन सीटों पर भी जीत, जहां कथित तौर पर वोट कटे, यह संकेत देते हैं कि हार के कारण कहीं न कहीं संगठनात्मक और रणनीतिक भी हो सकते हैं।

हार के बाद आक्रामकता: रणनीति या प्रतिक्रिया?

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, ममता का आक्रामक रुख दो संदेश देता है।

पहला—वह अपने समर्थकों के मनोबल को गिरने नहीं देना चाहतीं।

दूसरा—वह खुद को राष्ट्रीय स्तर पर “मोदी-विरोधी राजनीति” की केंद्रीय नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं।उनका यह ऐलान कि वह पूरे देश में घूमकर भाजपा के खिलाफ अभियान चलाएंगी, सीधे तौर पर INDIA गठबंधन को पुनर्जीवित करने की दिशा में कदम माना जा रहा है।

विपक्षी एकता: जरूरत या मजबूरी?

यह सवाल अब पहले से ज्यादा प्रासंगिक हो गया है—

क्या विपक्ष वास्तव में एकजुट हो सकता है?

राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव और उद्धव ठाकरे—ये सभी नेता अपने-अपने राज्यों में मजबूत हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर एक साझा रणनीति बनाने में बार-बार असफल रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का बयान इस विडंबना को उजागर करता है—“विपक्ष पहले आपस में लड़ता है, फिर हार के बाद एकता की बात करता है।” यह केवल टिप्पणी नहीं, बल्कि पिछले एक दशक की राजनीतिक सच्चाई है।

टकराव की जड़: नेतृत्व और महत्वाकांक्षा

विपक्षी एकता की सबसे बड़ी बाधा विचारधारा नहीं, बल्कि नेतृत्व की लड़ाई है।

ममता का “एकला चलो” का रुख

राहुल गांधी का क्षेत्रीय दलों के साथ सीमित तालमेल केजरीवाल का कांग्रेस पर अविश्वास ये सभी संकेत देते हैं कि गठबंधन की नींव अभी भी कमजोर है।तमिलनाडु में विजय का उभार और क्षेत्रीय राजनीति का मजबूत होना इस जटिलता को और बढ़ाता है। हर राज्य में अलग समीकरण हैं, और यही राष्ट्रीय एकता की राह में सबसे बड़ी चुनौती बनते हैं।

भाजपा की बढ़त: विपक्ष के लिए चेतावनी

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की लगातार चुनावी सफलताओं ने विपक्ष को एक सख्त संदेश दिया है—बिखराव की राजनीति अब काम नहीं करेगी। ममता की हार ने इस डर को और गहरा कर दिया है कि अगर एक मजबूत क्षेत्रीय नेता भी हार सकता है, तो बाकी के लिए राह और कठिन है।

क्या ममता बन सकती हैं धुरी?

ममता बनर्जी के पास अनुभव, आक्रामकता और जनाधार—तीनों हैं। लेकिन राष्ट्रीय नेतृत्व केवल इन गुणों से तय नहीं होता। इसके लिए जरूरी है:अन्य नेताओं का विश्वास साझा एजेंडा सीटों का व्यावहारिक बंटवारा इन तीनों मोर्चों पर ममता को अभी लंबा रास्ता तय करना है।

निष्कर्ष:

ख्याली पुलाव या नई शुरुआत?

वर्तमान स्थिति को देखते हुए विपक्षी एकता अभी “आवश्यकता” तो है, लेकिन “वास्तविकता” नहीं।ममता की सक्रियता इस दिशा में एक पहल जरूर हो सकती है, लेकिन जब तक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं सामूहिक रणनीति पर भारी पड़ती रहेंगी, तब तक यह एकता कागजों और भाषणों तक सीमित रहेगी।

अंततः सवाल यही है

:क्या विपक्ष अपनी पुरानी गलतियों से सीखकर एक मजबूत विकल्प बन पाएगा, या फिर हर चुनाव के बाद “एकता” केवल एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगी?

NSK

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