बी के झा
कोलकाता, 7 मई
पश्चिम बंगाल की राजनीति इन दिनों केवल सत्ता परिवर्तन की नहीं, बल्कि नेतृत्व की निर्णायक लड़ाई का मंच बन चुकी है। भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या Suvendu Adhikari ही बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बनेंगे, या फिर पार्टी केंद्रीय नेतृत्व एक बार फिर ऐसा चेहरा सामने लाएगा जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की?
इसी सवाल ने बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। खासतौर पर केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah का स्वयं पर्यवेक्षक बनकर कोलकाता पहुंचना इस चर्चा को और अधिक गंभीर बना रहा है। भाजपा के संगठनात्मक इतिहास को देखने वाले जानकार मानते हैं कि शाह का इस तरह सीधे हस्तक्षेप करना सामान्य राजनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि “रणनीतिक संकेत” माना जा रहा है।
अमित शाह का दौरा क्यों बना राजनीतिक पहेली?
भाजपा सूत्रों के अनुसार, 9 मई को कोलकाता के ऐतिहासिक Brigade Parade Ground में नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह प्रस्तावित है। उससे पहले 8 मई को भाजपा विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें नेता का चयन किया जाएगा।लेकिन राजनीतिक गलियारों में असली चर्चा इस बात की है कि यदि मुख्यमंत्री का चेहरा पहले से तय होता, तो क्या अमित शाह को स्वयं पर्यवेक्षक बनकर बंगाल आना पड़ता?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व बंगाल को केवल एक राज्य नहीं, बल्कि पूर्वी भारत की दीर्घकालिक वैचारिक और राजनीतिक प्रयोगशाला के रूप में देख रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री चयन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि आने वाले दशक की रणनीति तय करेगा।
शुभेंदु अधिकारी—संघर्ष से शिखर तक
बंगाल में भाजपा के उभार की कहानी में शुभेंदु अधिकारी सबसे केंद्रीय चेहरा बनकर उभरे हैं। कभी Mamata Banerjee के विश्वस्त सहयोगी रहे अधिकारी ने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा और फिर बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी।उन्होंने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। इस बार भवानीपुर में भी ममता को पराजित कर उन्होंने अपने राजनीतिक कद को और ऊंचा कर लिया। भाजपा ने उन्हें दो सीटों से उतारकर पहले ही संकेत दे दिया था कि पार्टी उन्हें केवल नेता प्रतिपक्ष नहीं, बल्कि भविष्य के बड़े चेहरे के रूप में देख रही है।
राजनीतिक शिक्षाविदों का मानना है कि बंगाल में भाजपा का जनाधार
“शुभेंदु फैक्टर” के कारण गांव और कस्बों तक मजबूत हुआ। यही वजह है कि अब यदि पार्टी किसी और चेहरे को मुख्यमंत्री बनाती है, तो जमीनी कार्यकर्ताओं में असंतोष की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
एक वरिष्ठ शिक्षाविद ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा—
“यदि शुभेंदु अधिकारी के अलावा किसी और को नेतृत्व दिया गया, तो भाजपा की जीती हुई पारी भविष्य में पश्चिम बंगाल में स्थायी सत्ता के सपने को कमजोर कर सकती है। बंगाल में नेतृत्व केवल संगठन नहीं, जनस्वीकृति से चलता है।
”भाजपा का इतिहास—चौंकाने वाले फैसलों की परंपरा
हालांकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञ याद दिलाते हैं कि पार्टी ने कई राज्यों में अंतिम समय में अप्रत्याशित चेहरे सामने रखे हैं।Rajasthan, Madhya Pradesh, Chhattisgarh और Delhi की राजनीति में भाजपा ने कई बार ऐसे नामों को मुख्यमंत्री बनाया जिनकी सार्वजनिक चर्चा तक नहीं थी।इसीलिए अब बंगाल में भी अटकलें तेज हैं कि क्या पार्टी
“संगठन बनाम जननेतृत्व” के बीच संतुलन साधने के लिए कोई नया प्रयोग करने जा रही है?
क्या महिला मुख्यमंत्री का कार्ड खेल सकती है भाजपा?
राजनीतिक गलियारों में Agnimitra Paul का नाम भी तेजी से चर्चा में है। हाल ही में भाजपा ने उन्हें प्रदेश इकाई में बड़ी जिम्मेदारी दी थी और उनकी दिल्ली यात्रा ने अटकलों को और हवा दे दी है।
स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि भाजपा बंगाल में “महिला नेतृत्व बनाम ममता मॉडल” की नई राजनीतिक कथा गढ़ने की कोशिश कर सकती है। यदि ऐसा हुआ, तो यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक वैचारिक संदेश भी होगा।हालांकि भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग अब भी शुभेंदु अधिकारी को ही स्वाभाविक दावेदार मान रहा है।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
तृणमूल कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा के भीतर मुख्यमंत्री चयन को लेकर भारी अंतर्विरोध है। विपक्ष का दावा है कि बंगाल की जीत के बाद भाजपा “दिल्ली मॉडल” लागू करना चाहती है, जहां अंतिम फैसला स्थानीय नेतृत्व नहीं बल्कि केंद्रीय नेतृत्व तय करता है।वाम दलों ने भी भाजपा पर “चेहरा आधारित राजनीति” करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि भाजपा विचारधारा की बजाय व्यक्तित्व आधारित सत्ता संरचना बना रही है, जो बंगाल की राजनीतिक संस्कृति से मेल नहीं खाती।
कानूनविदों ने उठाया संवैधानिक संतुलन का सवाल
संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल जैसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से ध्रुवीकृत राज्य में मुख्यमंत्री चयन केवल राजनीतिक समीकरण नहीं, बल्कि प्रशासनिक स्थिरता से भी जुड़ा विषय है।कानूनविदों का कहना है कि यदि राज्य में नेतृत्व को लेकर असमंजस लंबा खिंचता है, तो इससे प्रशासनिक निर्णयों और कानून-व्यवस्था पर असर पड़ सकता है। इसलिए भाजपा नेतृत्व को ऐसा चेहरा चुनना होगा जो संगठन, जनता और प्रशासन—
तीनों के बीच संतुलन बना सके।
समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों की रायस्थानीय समाजसेवियों और बुद्धिजीवियों का एक वर्ग मानता है कि बंगाल इस समय राजनीतिक प्रतिशोध और हिंसा से बाहर निकलने की उम्मीद कर रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री ऐसा होना चाहिए जो केवल चुनाव जिताने वाला नेता नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद कायम करने वाला प्रशासक भी हो।
कई बुद्धिजीवियों ने कहा कि बंगाल की जनता अब “टकराव की राजनीति” से थक चुकी है और नई सरकार से रोजगार, उद्योग, शिक्षा और सामाजिक शांति की अपेक्षा रखती है।बंगाल की राजनीति का निर्णायक क्षण फिलहाल पूरा बंगाल एक राजनीतिक रहस्य के बीच सांस ले रहा है। एक तरफ शुभेंदु अधिकारी का जनाधार और संघर्ष उन्हें सबसे मजबूत दावेदार बनाता है, तो दूसरी तरफ अमित शाह की सक्रियता यह संकेत देती है कि अंतिम फैसला केवल लोकप्रियता के आधार पर नहीं होगा।
अब सबकी नजर 8 मई की विधायक दल की बैठक और 9 मई के शपथ ग्रहण समारोह पर टिकी है।क्योंकि बंगाल में इस बार केवल सरकार नहीं बदल रही—
बल्कि तय हो रहा है कि आने वाले वर्षों में राज्य की राजनीति का चेहरा, चरित्र और दिशा क्या होगी।
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