बी के झा
NSK



नई दिल्ली/चेन्नई/तिरुवनंतपुरम, 10 मई
अरब सागर के किनारे जन्मी भारतीय जनता पार्टी अब हिंद महासागर की राजनीतिक लहरों पर अपना भगवा विस्तार लिखने की तैयारी में है। वर्ष 1980 में सीमित भूगोल और सीमित जनाधार के साथ शुरू हुई भाजपा की यात्रा आज देश के अधिकांश हिस्सों तक पहुंच चुकी है। पूर्वोत्तर से लेकर गंगासागर तक अपनी राजनीतिक छाप छोड़ने के बाद अब पार्टी की नजर दक्षिण भारत के उन किलों पर है, जिन्हें दशकों से अभेद्य माना जाता रहा है।
तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना—ये तीन राज्य अब भाजपा के अगले दशक की सबसे बड़ी राजनीतिक प्रयोगशाला बनने जा रहे हैं। पार्टी के भीतर इसे “मिशन दक्षिण” का निर्णायक चरण माना जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि भाजपा अब तमिलनाडु में वही रणनीति अपनाने जा रही है, जिसने पश्चिम बंगाल में उसे शून्य से मुख्य विपक्ष तक पहुंचाया था—
स्थानीय दलों के बड़े चेहरों को अपने साथ जोड़ना, क्षेत्रीय अस्मिता को नया राजनीतिक नैरेटिव देना और वैचारिक संघर्ष को सीधे जनता के बीच ले जाना।
अमित शाह का अधूरा सपना, अब नई रणनीति के साथ आगे बढ़ेगा अभियान
2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अमित शाह ने भाजपा संगठन की कमान संभालते ही पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत के लिए विशाल विस्तार योजना बनाई थी।पूर्वोत्तर में कांग्रेस का लगभग सफाया, ओडिशा और बंगाल में अभूतपूर्व उभार, बिहार में निर्णायक उपस्थिति और पूर्वी भारत में मजबूत पकड़ के बाद अब पार्टी अपने “अधूरे दक्षिण मिशन” को पूरा करने में जुटी है।भाजपा के एक वरिष्ठ रणनीतिकार का कहना है—“उत्तर और पश्चिम भारत में भाजपा का आधार मजबूत हो चुका है। अगले 10 वर्षों की राजनीति दक्षिण भारत तय करेगी। इसलिए पार्टी अब वहां वैचारिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर दीर्घकालिक निवेश कर रही है।”
तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति के किले में सेंध की तैयारी
तमिलनाडु भाजपा के लिए सबसे कठिन राजनीतिक भूभाग माना जाता रहा है। यहां द्रविड़ राजनीति की जड़ें इतनी गहरी हैं कि राष्ट्रीय दल दशकों तक सीमित भूमिका में ही रहे। लेकिन इस बार परिस्थितियां तेजी से बदलती दिखाई दे रही हैं।टीवीके प्रमुख और नए मुख्यमंत्री विजय थलापति के सत्ता में आने के बाद राज्य की राजनीति नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। लगभग 70 वर्षों में पहली बार डीएमके-एआईएडीएमके धुरी से बाहर की सरकार सत्ता में आई है। यही बदलाव भाजपा के लिए अवसर भी माना जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, भाजपा अब पश्चिम बंगाल मॉडल पर काम करेगी—
एआईएडीएमके के असंतुष्ट नेताओं को जोड़ना
स्थानीय जातीय-सामाजिक समीकरणों में पैठ बनाना
हिंदुत्व और तमिल सांस्कृतिक गौरव के बीच नया संतुलन तैयार करना
शहरी मध्यम वर्ग और युवा मतदाताओं पर फोकस करना
हाल ही में भाजपा के तमिलनाडु अध्यक्ष बने नागेंद्रन स्वयं एआईएडीएमके पृष्ठभूमि से आते हैं। इसे भाजपा की “सॉफ्ट एंट्री रणनीति” का हिस्सा माना जा रहा है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर. सुब्रमण्यम कहते हैं—“भाजपा समझ चुकी है कि तमिलनाडु में केवल हिंदुत्व की राजनीति से सफलता नहीं मिलेगी। यहां उसे तमिल पहचान, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय सम्मान की भाषा भी सीखनी होगी।”
विजय सरकार और भाजपा: सहयोग, प्रतिस्पर्धा या भविष्य का समीकरण?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विजय थलापति को मुख्यमंत्री बनने पर बधाई देते हुए तमिलनाडु के विकास के लिए हर संभव सहयोग का भरोसा दिया।लेकिन इसी के साथ प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोलते हुए विपक्षी दलों को चेतावनी भी दी। कर्नाटक में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कांग्रेस को “परजीवी राजनीति” का प्रतीक बताते हुए कहा कि सत्ता के लिए वह सहयोगियों को भी छोड़ देती है।
राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि मोदी का यह बयान केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि तमिलनाडु की नई राजनीतिक धुरी को संकेत भी है।दिल्ली के वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अजय दीक्षित कहते हैं—“भाजपा फिलहाल विजय सरकार के प्रति नरम रुख रखेगी। पार्टी समझती है कि डीएमके विरोधी राजनीति में विजय और भाजपा के मतदाता वर्ग का एक हिस्सा समान हो सकता है। इसलिए शुरुआती टकराव से बचने की रणनीति अपनाई जाएगी।”
केरल: वामपंथ की जमीन पर भगवा प्रयोग
केरल भाजपा के लिए अब केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति वाला राज्य नहीं रह गया है।हालिया चुनावों में पार्टी ने तीन सीटें जीतकर और पांच सीटों पर दूसरे स्थान पर रहकर स्पष्ट संकेत दिया है कि वह अब सत्ता की दौड़ में गंभीर दावेदार बनना चाहती है।
सूत्रों के अनुसार भाजपा अब केरल में वाम दलों की पारंपरिक हिंदू वोटबैंक में सेंध लगाने के साथ-साथ ईसाई समुदाय में भी अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि केरल में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठनात्मक ढांचा और आरएसएस की गहरी सामाजिक पैठ है।
तिरुवनंतपुरम के शिक्षाविद डॉ. जोसेफ मैथ्यू कहते हैं—“केरल में भाजपा सीधे सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही, बल्कि वैचारिक स्पेस पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है। यदि वामपंथ कमजोर पड़ता है, तो भाजपा खुद को उसके विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहती है।”
तेलंगाना: दक्षिण का पहला निर्णायक द्वार
भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद तेलंगाना से है।बीते कुछ वर्षों में पार्टी ने वहां तेजी से अपना जनाधार बढ़ाया है और कांग्रेस-बीआरएस संघर्ष के बीच खुद को तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्ष तक पहुंचाने में सफलता हासिल की है।भाजपा नेतृत्व मानता है कि तेलंगाना दक्षिण भारत में उसका “गेटवे स्टेट” बन सकता है। यदि यहां पार्टी सत्ता में आती है, तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव तमिलनाडु और केरल तक जाएगा।
क्या बंगाल वाला फॉर्मूला दक्षिण में सफल होगा?
पश्चिम बंगाल में भाजपा ने स्थानीय नेताओं को जोड़कर, सांस्कृतिक मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में बदलकर और मजबूत कैडर नेटवर्क खड़ा कर तेजी से विस्तार किया था।
अब सवाल यह है कि क्या वही मॉडल तमिलनाडु और केरल में भी काम करेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिण भारत की सामाजिक संरचना बंगाल से कहीं अधिक जटिल है। यहां भाषा, क्षेत्रीय गौरव और सामाजिक न्याय की राजनीति बेहद प्रभावशाली है।
चेन्नई के वरिष्ठ पत्रकार शिवकुमारन कहते हैं—“भाजपा को दक्षिण में सफलता तभी मिलेगी जब वह उत्तर भारतीय राजनीतिक शैली थोपने के बजाय स्थानीय सांस्कृतिक भावनाओं के साथ खुद को ढालेगी।”
कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के लिए खतरे की घंटी
भाजपा की दक्षिण रणनीति केवल सत्ता विस्तार का अभियान नहीं, बल्कि विपक्षी राजनीति के लिए चेतावनी भी मानी जा रही है।यदि भाजपा तेलंगाना में मजबूत होती है, तमिलनाडु में डीएमके-विरोधी स्पेस पर कब्जा करती है और केरल में वाम दलों की जगह लेना शुरू करती है, तो दक्षिण भारत की पूरी राजनीतिक धुरी बदल सकती है।विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई उत्तर भारत नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की वैचारिक धरती पर लड़ी जाएगी।
सत्ता की नई भू-राजनीतिआज भाजपा केवल चुनाव जीतने की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि भारत के राजनीतिक नक्शे को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश में है।अरब सागर से गंगासागर तक पहुंचने के बाद अब उसकी नजर हिंद महासागर के उन तटीय राज्यों पर है, जहां अभी भी क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कायम है।
तमिलनाडु में विजय थलापति का उदय, केरल में भाजपा की बढ़ती उपस्थिति और तेलंगाना में उसका आक्रामक विस्तार—
ये संकेत बताते हैं कि दक्षिण भारत अब भारतीय राजनीति का अगला निर्णायक रणक्षेत्र बनने जा रहा है।और शायद यही कारण है कि दिल्ली से लेकर चेन्नई तक सत्ता के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—
क्या आने वाले दशक में दक्षिण भारत की राजनीति का रंग भी भगवा होने जा रहा है?
