18 दिन का तेल या 60 दिन का भरोसा?” : हॉर्मुज संकट ने बढ़ाई भारत की बेचैनी, ईंधन युद्ध पर घिरी मोदी सरकार

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 15 मई

पश्चिम एशिया में छिड़े युद्ध ने अब भारत की अर्थव्यवस्था और आम जनता की रसोई तक दस्तक दे दी है। ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव तथा “हॉर्मुज स्ट्रेट” के अनिश्चितकालीन बंद होने की आशंका ने भारत के ऊर्जा सुरक्षा तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

देश में पेट्रोल-डीजल के भंडार को लेकर अब दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आ रही हैं—एक कहती है कि भारत के पास केवल 18 दिनों का तेल बचा है, जबकि सरकार दावा कर रही है कि 60 दिनों की जरूरत पूरी करने लायक पर्याप्त भंडार मौजूद है।

कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म “केप्लर” की रिपोर्ट ने इस बहस को और तेज कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी के अंत में भारत का कुल कच्चा तेल भंडार 107 मिलियन बैरल था, जो अब घटकर 91 मिलियन बैरल पर पहुंच गया है। यानी महज ढाई महीनों में करीब 15 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। यदि देश की औसत दैनिक खपत लगभग 5 मिलियन बैरल मानी जाए, तो मौजूदा स्टॉक केवल 18 दिनों तक ही पर्याप्त रहेगा।

हालांकि केंद्र सरकार इस दावे को लेकर आश्वस्त दिख रही है। सरकार का कहना है कि उसके आकलन में केवल स्टोरेज टैंक ही नहीं, बल्कि पाइपलाइन में मौजूद तेल, समुद्र में भारत की ओर आ रहे जहाजों में भरा कच्चा तेल और रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व भी शामिल हैं। इसी आधार पर सरकार ने दावा किया है कि भारत के पास लगभग 60 दिनों की जरूरत पूरी करने लायक तेल उपलब्ध है।

लेकिन असली सवाल यही है कि संकट अगर लंबा खिंच गया तो क्या भारत की ऊर्जा सुरक्षा टिक पाएगी?

यही चिंता अब आर्थिक और राजनीतिक गलियारों में खुलकर सुनाई देने लगी है।

युद्ध का असर

रिफाइनरियों पर दबाव बढ़ा

विशेषज्ञों के अनुसार युद्ध शुरू होने से पहले भारत प्रतिदिन लगभग 5 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात कर रहा था, जो अब घटकर औसतन 4.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है। फिलहाल भारतीय रिफाइनरियां अपने सुरक्षित भंडार से काम चला रही हैं, लेकिन यदि सप्लाई में बाधा लंबे समय तक बनी रही तो तेल प्रोसेसिंग कम करनी पड़ सकती है।

ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि हॉर्मुज स्ट्रेट दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की सबसे महत्वपूर्ण नसों में से एक है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से दुनिया भर में पहुंचता है। यदि यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहा, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की चेतावनी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संकट केवल ऊर्जा का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति और आर्थिक स्थिरता की परीक्षा भी है। विश्लेषकों के अनुसार, भारत ने पिछले वर्षों में ऊर्जा आयात के वैकल्पिक स्रोतों पर पर्याप्त तेजी नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप आज देश खाड़ी क्षेत्र के तनाव का सीधा असर झेलने को मजबूर है।विश्लेषकों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल में ईंधन बचत की अपील करना इसी बढ़ती चिंता का संकेत माना जा रहा है।

सरकार जनता को “नो व्हीकल डे” और सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल का संदेश दे रही है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रतीकात्मक कदम हैं या आने वाले बड़े संकट की तैयारी?

वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों की राय

देश के वरिष्ठ अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि तेल आयात संकट लंबे समय तक जारी रहा, तो भारत को गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। उनका कहना है कि कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल का सीधा असर महंगाई, परिवहन लागत, खाद्य वस्तुओं की कीमतों और औद्योगिक उत्पादन पर पड़ेगा।

अर्थशास्त्रियों के मुताबिक भारत पहले ही बेरोजगारी, महंगाई और कमजोर वैश्विक मांग जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में तेल संकट देश की विकास दर को भी प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को तत्काल ऊर्जा आयात के नए स्रोत तलाशने, रणनीतिक भंडार बढ़ाने और वैकल्पिक ऊर्जा पर निवेश तेज करने की जरूरत है।

विपक्ष का हमला : “देश को डर और संकट की ओर धकेला जा रहा”

इस पूरे मुद्दे पर विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार अंतरराष्ट्रीय दबावों के सामने कमजोर पड़ गई है और देश को “ऊर्जा आपातकाल” जैसी स्थिति की ओर धकेला जा रहा है।विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दबाव में नीतियां बना रही है, जिसके कारण भारत की स्वतंत्र ऊर्जा नीति कमजोर हुई है। विपक्ष का कहना है कि देश में धीरे-धीरे “लॉकडाउन जैसी मानसिकता” बनाई जा रही है—

जहां जनता से ईंधन बचाने की अपील की जा रही है, लेकिन सरकार के पास दीर्घकालिक समाधान नजर नहीं आ रहा।कुछ विपक्षी नेताओं ने संसद का विशेष सत्र बुलाकर ऊर्जा संकट पर चर्चा की मांग भी की है। उनका कहना है कि सरकार को देश के सामने पूरी सच्चाई रखनी चाहिए कि वास्तव में तेल का भंडार कितना है और संभावित संकट से निपटने की तैयारी क्या है।

वैश्विक बाजार में भी हाहाकार

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी ने भी चेतावनी दी है कि दुनिया भर में तेल भंडार तेजी से घट रहा है। मार्च में वैश्विक तेल भंडार में 129 मिलियन बैरल और अप्रैल में 117 मिलियन बैरल की गिरावट दर्ज की गई। एजेंसी का अनुमान है कि गर्मियों में मांग बढ़ने के साथ कीमतों में भारी उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।इस बीच इराक और कुवैत जैसे देश हॉर्मुज मार्ग बंद होने से अपने तेल निर्यात में भारी दिक्कत झेल रहे हैं।

हालांकि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने वैकल्पिक मार्गों से आपूर्ति जारी रखने की कोशिश की है।

आने वाला समय कितना कठिन?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले हफ्तों में पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं हुआ, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी, परिवहन महंगा होने और महंगाई के नए दौर की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।स्पष्ट है कि यह संकट केवल तेल का नहीं, बल्कि भारत की आर्थिक स्थिरता, विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी परीक्षा बनता जा रहा है।

अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार संकट को “अस्थायी चुनौती” साबित कर पाती है या देश को लंबे आर्थिक दबाव के दौर में प्रवेश करना पड़ता है।

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