बी के झा
NSK


हैदराबाद / नई दिल्ली, 17 मई
दक्षिण भारत की राजनीति में जनसंख्या नियंत्रण की बहस अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। कभी “हम दो, हमारे दो” का नारा देने वाला देश अब कुछ राज्यों में “ज्यादा बच्चे, ज्यादा प्रोत्साहन” की नीति की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। इसी बदलते विमर्श के बीच N. Chandrababu Naidu ने एक ऐसा ऐलान किया है जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक और धार्मिक मंचों तक नई चर्चा छेड़ दी है।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने घोषणा की है कि राज्य में तीसरे बच्चे के जन्म पर परिवार को 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। यह घोषणा श्रीकाकुलम जिले के नरसन्नापेटा में आयोजित ‘स्वर्ण आंध्र-स्वच्छ आंध्र’ कार्यक्रम के दौरान की गई।मुख्यमंत्री ने मंच से कहा,“मैंने नया फैसला लिया है। तीसरे बच्चे पर 30 हजार और चौथे बच्चे पर 40 हजार रुपये तुरंत दिए जाएंगे।
बच्चे बोझ नहीं, राष्ट्र की संपत्ति हैं
”जनसंख्या नियंत्रण से जनसंख्या प्रोत्साहन तक
भारत में दशकों तक सरकारें जनसंख्या नियंत्रण को विकास की शर्त बताती रही हैं। लेकिन अब कई राज्यों में गिरती जन्मदर चिंता का कारण बनने लगी है। आंध्र प्रदेश सरकार का मानना है कि यदि प्रजनन दर लगातार घटती रही तो आने वाले वर्षों में श्रमशक्ति, आर्थिक विकास और सामाजिक संतुलन पर गंभीर असर पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री नायडू ने कहा कि आज शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम दंपती अक्सर एक ही बच्चे तक सीमित रहना चाहते हैं। उन्होंने चेताया कि यह प्रवृत्ति भविष्य में “जनसांख्यिकीय संकट” पैदा कर सकती है।
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. आर. वेंकटेश का कहना है,“यह केवल सामाजिक योजना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति है। दक्षिण भारत के कई राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से नीचे जा रही है। सरकारें अब वृद्ध होती आबादी और घटती युवा शक्ति को लेकर चिंतित हैं।
”विपक्ष ने उठाए सवाल
हालांकि विपक्षी दलों ने इस योजना पर कई सवाल खड़े किए हैं। Indian National Congress ने कहा कि सरकार बेरोजगारी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं को हल करने के बजाय “लोकलुभावन घोषणाओं” में उलझी हुई है।कांग्रेस नेताओं का कहना है,“सरकार पहले यह बताए कि मौजूदा बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पोषण और रोजगार कैसे मिलेगा?
सिर्फ नकद प्रोत्साहन देकर सामाजिक समस्याएं हल नहीं होंगी।”वहीं Communist Party of India (Marxist) ने इस योजना को “आर्थिक असमानता बढ़ाने वाला कदम” बताते हुए कहा कि गरीब परिवार आर्थिक प्रलोभन में अधिक बच्चे पैदा करने को मजबूर हो सकते हैं।
भाजपा और दक्षिण भारतीय राजनीति
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह फैसला केवल सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि दक्षिण भारतीय राजनीति के बदलते समीकरणों से भी जुड़ा हुआ है। लंबे समय से दक्षिण भारत के राज्यों में कम जनसंख्या वृद्धि दर को लेकर यह बहस चल रही है कि भविष्य में लोकसभा सीटों के परिसीमन (Delimitation) के बाद इन राज्यों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है।विश्लेषकों के अनुसार, नायडू का यह कदम “जनसंख्या और राजनीतिक शक्ति” के बीच संबंध को ध्यान में रखकर भी देखा जा रहा है।
शिक्षाविदों की राय: “सिर्फ संख्या नहीं, गुणवत्ता भी जरूरी”
शिक्षाविदों ने सरकार की चिंता को उचित तो माना, लेकिन चेतावनी दी कि केवल जन्मदर बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।जनसंख्या अध्ययन विशेषज्ञ डॉ. मीरा सुब्रमण्यम कहती हैं,“यदि राज्य अधिक बच्चों को प्रोत्साहित करता है तो उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और रोजगार के लिए भी दीर्घकालिक नीति बनानी होगी। अन्यथा यह योजना भविष्य में सामाजिक दबाव बढ़ा सकती है।”
उन्होंने कहा कि जापान, दक्षिण कोरिया और कई यूरोपीय देशों में भी गिरती जन्मदर को रोकने के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिए गए, लेकिन वहां साथ में मातृत्व सहायता, बाल शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा योजनाएं भी लागू की गईं।
कानूनविदों की प्रतिक्रिया
संवैधानिक मामलों के जानकार वरिष्ठ अधिवक्ता अजय कृष्णन का कहना है कि राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि योजना किसी प्रकार के लैंगिक भेदभाव या सामाजिक असंतुलन को बढ़ावा न दे।उन्होंने कहा,“भारत में पहले से ही कुछ क्षेत्रों में बेटा पाने की मानसिकता मौजूद है। यदि योजना का ढांचा सावधानी से नहीं बनाया गया तो यह महिलाओं पर अधिक बच्चे पैदा करने का सामाजिक दबाव भी बढ़ा सकता है।
”हिन्दू संगठनों और धर्मगुरुओं की प्रतिक्रिया
कई हिन्दू संगठनों ने मुख्यमंत्री के फैसले का स्वागत किया है। Vishwa Hindu Parishad से जुड़े नेताओं ने कहा कि हिंदू समाज में घटती जन्मदर भविष्य के लिए चिंता का विषय है और समाज को “परिवार व्यवस्था” को मजबूत करना चाहिए।कुछ संतों और धर्माचार्यों ने इसे “भारतीय परिवार संस्कृति” के संरक्षण की दिशा में सकारात्मक कदम बताया।
वाराणसी के एक प्रमुख धर्मगुरु ने कहा,“भारतीय संस्कृति में संतान को ईश्वर का आशीर्वाद माना गया है। यदि सरकार परिवारों को सहयोग देती है तो यह सामाजिक संतुलन के लिए अच्छा संकेत है।”हालांकि कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि धार्मिक भावनाओं के आधार पर जनसंख्या बहस को बढ़ावा देना खतरनाक हो सकता है।
मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं की प्रतिक्रिया
कई मुस्लिम संगठनों और उलेमाओं ने भी इस योजना पर प्रतिक्रिया दी है। All India Muslim Personal Law Board से जुड़े कुछ सदस्यों ने कहा कि जनसंख्या को केवल “राजनीतिक नजरिये” से नहीं देखना चाहिए।हैदराबाद के मौलाना कासिम रज़ा ने कहा,“इस्लाम परिवार और बच्चों को रहमत मानता है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि हर बच्चे को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य मिले।
केवल संख्या बढ़ाना समाधान नहीं है।”कुछ मुस्लिम संगठनों ने यह भी कहा कि यदि सरकार वास्तव में जनसंख्या वृद्धि चाहती है तो उसे गरीब परिवारों के लिए व्यापक सामाजिक सुरक्षा योजना लानी चाहिए।समाज में बदलती सोच दरअसल यह पूरा मुद्दा केवल सरकारी योजना का नहीं, बल्कि बदलती सामाजिक मानसिकता का भी है।
शहरीकरण, बढ़ती जीवनशैली लागत, करियर प्राथमिकताएं और आर्थिक दबाव के कारण युवा दंपती अब छोटे परिवार को प्राथमिकता दे रहे हैं।ऐसे में आंध्र प्रदेश सरकार का यह कदम उस राष्ट्रीय बहस को फिर से जीवित कर रहा है जिसमें सवाल उठ रहा है—
क्या भारत भविष्य में “जनसंख्या विस्फोट” नहीं बल्कि “जनसंख्या कमी” की चुनौती से जूझेगा?
नई बहस की शुरुआतआंध्र प्रदेश का यह फैसला अब केवल एक राज्य की योजना नहीं रह गया है। इसने देशभर में जनसंख्या नीति, आर्थिक विकास, धार्मिक दृष्टिकोण, महिला अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे कई संवेदनशील सवालों को एक साथ सामने ला दिया है।
समर्थकों के लिए यह भविष्य की तैयारी है, जबकि आलोचकों के लिए यह जल्दबाजी में लिया गया सामाजिक प्रयोग।
लेकिन इतना तय है कि चंद्रबाबू नायडू के इस ऐलान ने भारत में जनसंख्या को लेकर चल रही दशकों पुरानी बहस को एक बार फिर केंद्र में ला खड़ा किया है।
