बी के झा
हैदराबाद/ नई दिल्ली,17 मई
तेलंगाना की राजनीति में उस समय बड़ा भूचाल आ गया जब केंद्र सरकार में मंत्री Bandi Sanjay Kumar ने अपने बेटे बंदी भगीरथ को पॉक्सो एक्ट के मामले में पुलिस जांच के लिए सौंप दिया। मामला केवल एक आपराधिक जांच तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सत्ता, कानून, नैतिकता और राजनीतिक जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है।
एक ओर केंद्रीय मंत्री यह कह रहे हैं कि उन्हें न्यायपालिका और कानून पर पूरा भरोसा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और महिला संगठनों ने मामले की निष्पक्ष जांच को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने तेलंगाना की राजनीति को अचानक गर्मा दिया है।
“कानून के सामने सब बराबर”– मंत्री का बयान
केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर बयान जारी कर कहा कि उन्होंने अपने बेटे को वकीलों के माध्यम से पुलिस जांच के लिए सौंप दिया है। उन्होंने लिखा कि उनका बेटा लगातार खुद को निर्दोष बता रहा है और उसने अपनी कानूनी टीम को ऐसे सबूत दिए हैं, जिनके आधार पर वकीलों को उम्मीद है कि अदालत से जमानत मिल जाएगी।
मंत्री ने कहा,“मैंने पहले भी स्पष्ट किया था कि कानून के सामने सभी समान हैं। मुझे न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है।”हालांकि, उनके इस बयान के तुरंत बाद पुलिस ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह “सरेंडर” नहीं बल्कि “गिरफ्तारी” थी।
पुलिस का दावा: “सरेंडर नहीं, गिरफ्तारी हुई”
Telangana Police के अधिकारियों के अनुसार, बंदी भगीरथ को हैदराबाद के बाहरी इलाके नारसिंगी पुलिस अकादमी के पास से पकड़ा गया। साइबराबाद पुलिस कमिश्नर रमेश ने कहा कि आरोपी के खिलाफ पहले ही ‘लुक-आउट सर्कुलर’ जारी किया जा चुका था ताकि वह देश छोड़कर भाग न सके।
पुलिस के मुताबिक,“आरोपी को कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तार किया गया है और आगे की कार्रवाई जारी है।”इस बयान ने मंत्री के “स्वेच्छा से पेश होने” वाले दावे और पुलिस के “अरेस्ट” वाले दावे के बीच अंतर को राजनीतिक बहस का विषय बना दिया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला आठ मई को दर्ज हुई एक शिकायत से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, 17 वर्षीय लड़की की मां ने शिकायत दर्ज कराई थी कि बंदी भगीरथ के उसकी बेटी के साथ संबंध थे और उसने लड़की का यौन उत्पीड़न किया।इसके बाद आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और Protection of Children from Sexual Offences Act यानी पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया।पॉक्सो कानून के तहत नाबालिग से जुड़े यौन अपराधों को बेहद गंभीर माना जाता है और जांच प्रक्रिया में विशेष संवेदनशीलता बरती जाती है।
हाईकोर्ट से भी नहीं मिली राहत
मामले में बंदी भगीरथ ने Telangana High Court से अंतरिम राहत की मांग की थी, लेकिन अदालत ने तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया। इसके बाद राजनीतिक दबाव और कानूनी स्थिति दोनों तेजी से बदलते नजर आए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट द्वारा राहत न दिए जाने के बाद पुलिस की कार्रवाई तेज होना स्वाभाविक था। वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव चौधरी कहते हैं,“पॉक्सो मामलों में अदालतें आमतौर पर बेहद सावधानी से सुनवाई करती हैं। चूंकि मामला नाबालिग से जुड़ा है, इसलिए जांच एजेंसियों को व्यापक अधिकार प्राप्त होते हैं।”
विपक्ष हमलावर, निष्पक्ष जांच की मांग
मामले ने राजनीतिक रंग तब और गहरा लिया जब तेलंगाना रक्षा सेना की अध्यक्ष के. कविता ने प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र लिखकर मांग की कि केंद्रीय मंत्री बंडी संजय कुमार को मंत्रिमंडल से हटाया जाए ताकि निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके।
विपक्षी दलों का आरोप है कि सत्ता में बैठे प्रभावशाली लोगों के मामलों में जांच एजेंसियों पर दबाव बनने की आशंका रहती है। विपक्ष ने सवाल उठाया कि यदि आरोपी किसी सामान्य परिवार से होता तो क्या उसे इतनी कानूनी और राजनीतिक सुरक्षा मिलती?
Indian National Congress के नेताओं ने कहा कि भाजपा को “नैतिक जवाबदेही” दिखानी चाहिए। वहीं क्षेत्रीय दलों ने भी इसे “सत्ता और प्रभाव” से जुड़ा मामला बताया।
भाजपा की मुश्किलें बढ़ीं
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है, खासकर तब जब पार्टी लंबे समय से “कानून का राज” और “महिला सुरक्षा” को प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाती रही है।राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय देव का कहना है,“यह मामला केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहेगा।
विपक्ष इसे भाजपा की नैतिकता और राजनीतिक दोहरेपन के मुद्दे के रूप में पेश करने की कोशिश करेगा।”हालांकि भाजपा नेताओं का कहना है कि मंत्री ने अपने बेटे को जांच के लिए पेश कर यह साबित किया है कि पार्टी कानून से ऊपर किसी को नहीं मानती।
कानूनी लड़ाई बनाम राजनीतिक दबाव
अब पूरा मामला अदालत, पुलिस जांच और राजनीतिक बयानबाजी—तीनों के केंद्र में आ गया है। एक तरफ आरोपी पक्ष खुद को निर्दोष बता रहा है और जमानत की उम्मीद जता रहा है, तो दूसरी तरफ महिला संगठनों और विपक्षी दलों का दबाव निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने पर बना हुआ है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का बड़ा विषय बन सकता है।
क्योंकि सवाल सिर्फ एक आरोपी का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां सत्ता और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है।
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