“जिंदा दफन कर दिए गए नीतीश!” : आनंद मोहन के विस्फोटक बयान से बिहार NDA में भूचाल, उधर मांझी परिवार की विधायक से दुर्व्यवहार ने बढ़ाया सियासी तापमान

बी के झा

NSK

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पटना/ न ई दिल्ली, 18 मई

बिहार की राजनीति में रविवार का दिन सत्ता पक्ष के लिए असहज सवालों और तीखे राजनीतिक संकेतों से भरा रहा। एक ओर बाहुबली नेता Anand Mohan ने जनता दल यूनाइटेड पर खुला हमला बोलते हुए कहा कि “नीतीश कुमार को जिंदा दफन कर दिया गया है” और पार्टी “थैली की राजनीति” का अड्डा बन चुकी है, तो दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री Jitan Ram Manjhi की समधन तथा बाराचट्टी विधायक Jyoti Devi के साथ कथित दुर्व्यवहार और हाथापाई की घटना ने कानून-व्यवस्था को लेकर सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया।

इन दोनों घटनाओं ने बिहार की सियासत में यह सवाल फिर से खड़ा कर दिया है कि क्या एनडीए के भीतर सब कुछ सामान्य है, या सत्ता के गलियारों में असंतोष की आग धीरे-धीरे धधक रही है?

सीतामढ़ी में महाराणा प्रताप प्रतिमा स्थापना समारोह की तैयारी बैठक के दौरान आनंद मोहन ने जिस आक्रामक अंदाज में जदयू नेतृत्व और सत्ता संरचना पर सवाल उठाए, उसने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी। उन्होंने कहा कि जिस Nitish Kumar ने संघर्ष कर जदयू को यहां तक पहुंचाया, आज उसी नेता को पोस्टरों और राजनीतिक विमर्श से गायब किया जा रहा है।

उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि शपथ ग्रहण समारोह में 85 विधायकों के साथ खड़े रहने के बावजूद नीतीश कुमार की तस्वीर तक नहीं दिखाई गई। यहां तक कि उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Choudhary और Bijendra Yadav जैसे वरिष्ठ नेताओं के नाम तक पोस्टरों से गायब हैं।आनंद मोहन ने आरोप लगाया कि जदयू अब विचारधारा से नहीं, बल्कि “थैली” यानी पैसे की ताकत से चल रही है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि “जो थैली पहुंचाता है, वही मंत्री बन जाता है।”

राजनीतिक पर्यवेक्षक मान रहे हैं कि यह हमला केवल बेटे Chetan Anand को मंत्री नहीं बनाए जाने की नाराजगी नहीं, बल्कि जदयू के भीतर बढ़ती बेचैनी का सार्वजनिक विस्फोट है।उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि “अगर चेतन आनंद सरकार बचाएगा, तो सरकार चलाएगा भी,” और यह भी दावा किया कि “टाइगर अभी जिंदा है।” उनके इन बयानों को आगामी चुनावों से पहले शक्ति प्रदर्शन और राजनीतिक दबाव की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आनंद मोहन का यह बयान केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर बदलते शक्ति संतुलन का संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार बिहार की राजनीति में लंबे समय तक सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों की राजनीति के केंद्र रहे नीतीश कुमार की भूमिका सीमित होती दिख रही है, और इसी कारण सहयोगी दलों तथा पुराने नेताओं में असंतोष उभर रहा है।

कई शिक्षाविदों ने इसे बिहार की बदलती राजनीतिक संस्कृति से जोड़ते हुए कहा कि विचारधारा आधारित राजनीति अब धीरे-धीरे व्यक्तिवाद और संसाधन-आधारित सत्ता संघर्ष में बदलती जा रही है। उनका मानना है कि लोकतंत्र में दलों के भीतर संवाद और सम्मान की परंपरा कमजोर होना चिंता का विषय है।

कानूनविदों ने भी आनंद मोहन के बयान को राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में बताते हुए कहा कि यदि सत्ता दलों के भीतर असहमति को स्थान नहीं मिलेगा, तो राजनीतिक असंतोष सार्वजनिक मंचों पर विस्फोटक रूप लेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक मंचों से अत्यधिक उत्तेजक भाषा राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकती है।

उधर गया जिले के मोहनपुर थाना क्षेत्र में बाराचट्टी विधायक ज्योति देवी के साथ हुई कथित अभद्रता ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायक ने आरोप लगाया कि सामाजिक समारोह में जाते समय करीब 20 लोगों ने उनके वाहन को घेर लिया, सुरक्षाकर्मियों के साथ हाथापाई की और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।घटना के बाद सात नामजद और 20 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि ग्रामीण समय पर नहीं पहुंचते, तो बड़ी घटना हो सकती थी। इस मामले ने राजनीतिक सुरक्षा, महिला जनप्रतिनिधियों के सम्मान और ग्रामीण इलाकों में प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

विपक्षी दलों ने दोनों घटनाओं को लेकर बिहार सरकार पर तीखा हमला बोला है। विपक्ष का कहना है कि एक तरफ सत्ता गठबंधन के भीतर खुलेआम असंतोष फूट रहा है, दूसरी तरफ जनप्रतिनिधि भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे। विपक्ष ने इसे “डबल इंजन सरकार की अंदरूनी टूट और प्रशासनिक विफलता” करार दिया है।

स्थानीय समाजसेवियों ने भी चिंता जताते हुए कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन यदि सत्ता संघर्ष और सामाजिक तनाव इस स्तर तक पहुंच जाए कि जनप्रतिनिधियों के साथ भी दुर्व्यवहार होने लगे, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।

बिहार की राजनीति फिलहाल ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां सत्ता के भीतर असंतोष, सामाजिक समीकरण, जातीय राजनीति और प्रशासनिक चुनौतियां एक साथ उभर रही हैं।

आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि आनंद मोहन के बयान केवल राजनीतिक गुस्से तक सीमित रहते हैं या फिर वे बिहार की सत्ता राजनीति में किसी बड़े बदलाव की भूमिका तैयार कर रहे हैं।

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