कच्चातिवु विवाद: क्या इंदिरा गांधी ने सचमुच भारत का द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया था? 52 साल पुराने समझौते पर फिर गरमाई सियासत, संविधान से लेकर मछुआरों की आजीविका तक उठे बड़े सवाल

बी के झा

NSK News

नई दिल्ली, 26 जुन

26 जून 1974… भारतीय कूटनीति के इतिहास की वह तारीख, जिस पर आज भी राजनीतिक गलियारों में तीखी बहस होती है। तमिलनाडु के मछुआरों के दर्द, भारत-श्रीलंका संबंधों, संवैधानिक अधिकारों और राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा कच्चातिवु द्वीप एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है।भाजपा सांसद निशिकांत दुबे द्वारा कांग्रेस और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर लगाए गए गंभीर आरोपों के बाद यह विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

सवाल वही पुराना है—क्या भारत ने कच्चातिवु द्वीप श्रीलंका को “दान” दिया था, या यह केवल समुद्री सीमा निर्धारण का कूटनीतिक समझौता था?

क्या है कच्चातिवु?

पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में स्थित लगभग 285 एकड़ का निर्जन द्वीप भारत के रामेश्वरम से लगभग 33 किलोमीटर तथा श्रीलंका के जाफना से लगभग 62 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां पीने के पानी का स्थायी स्रोत नहीं होने के कारण कोई स्थायी आबादी नहीं रहती।लेकिन इसकी वास्तविक अहमियत भूमि नहीं, बल्कि समुद्री संसाधन और रणनीतिक स्थिति है। दशकों तक भारतीय मछुआरे यहां विश्राम करते रहे, अपने जाल सुखाते रहे और समुद्र में लंबे समय तक मछली पकड़ने के दौरान इसे सुरक्षित पड़ाव के रूप में इस्तेमाल करते रहे।

धार्मिक आस्था का भी केंद्र

कच्चातिवु केवल समुद्री सीमा का विषय नहीं है। यहां स्थित सेंट एंथोनी चर्च भारत और श्रीलंका दोनों देशों के ईसाई श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले धार्मिक उत्सव में दोनों देशों के हजारों श्रद्धालु बिना वीजा के भाग लेते रहे हैं।

सदियों पुराना विवाद

इतिहासकारों के अनुसार 17वीं शताब्दी में यह क्षेत्र रामनाद साम्राज्य के अधीन माना जाता था। बाद में ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन हुए, लेकिन स्वामित्व को लेकर स्पष्टता कभी नहीं बन सकी।1921 में ब्रिटिश भारत और तत्कालीन सीलोन (वर्तमान श्रीलंका) के अधिकारियों के बीच समुद्री सीमा को लेकर चर्चा हुई, किंतु विवाद अनसुलझा ही रहा।

1974 का समझौता:

विवाद की असली शुरुआत26 जून 1974 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमावो भंडारनायके के बीच समुद्री सीमा निर्धारण समझौते पर हस्ताक्षर हुए। इस समझौते में भारत ने कच्चातिवु पर श्रीलंका की संप्रभुता को स्वीकार किया।हालांकि समझौते में भारतीय मछुआरों को पारंपरिक रूप से द्वीप पर जाकर जाल सुखाने तथा धार्मिक आयोजन में भाग लेने का अधिकार दिया गया था।यही समझौता आज भी सबसे बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का आधार बना हुआ है।

1976 का दूसरा समझौता बना बड़ी परेशानी

1976 में दोनों देशों के बीच विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) का नया समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों के मछुआरों के एक-दूसरे की समुद्री सीमा में मछली पकड़ने पर रोक लगा दी गई।यहीं से तमिलनाडु के हजारों मछुआरों की समस्याएं बढ़नी शुरू हुईं। समुद्री सीमा पार करने के आरोप में श्रीलंकाई नौसेना भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार करने लगी, उनकी नौकाएं जब्त होने लगीं और यह विवाद लगातार गंभीर होता गया।

भाजपा का आरोप

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कांग्रेस पर आरोप लगाया है कि इंदिरा गांधी सरकार ने बिना संसद की अनुमति और तमिलनाडु सरकार की सहमति के कच्चातिवु श्रीलंका को सौंप दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि की आपत्तियों को नजरअंदाज किया गया तथा संविधान की भावना का पालन नहीं किया गया।दुबे ने अपने बयान में यह भी कहा कि आज तमिलनाडु के मछुआरों को जो कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसकी जड़ 1974 और 1976 के वही समझौते हैं।

कांग्रेस का पक्ष

कांग्रेस का लंबे समय से यह मत रहा है कि 1974 का समझौता किसी भारतीय भूभाग को “दान” देने का नहीं, बल्कि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्री सीमा को स्पष्ट करने का कूटनीतिक निर्णय था। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उस समय उपलब्ध ऐतिहासिक एवं कानूनी दस्तावेजों के आधार पर यह निर्णय लिया गया था ताकि भविष्य में सीमा विवाद न बढ़े।

संविधान क्या कहता है?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

1960 के बेरुबारी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि भारत का कोई भूभाग किसी दूसरे देश को स्थायी रूप से हस्तांतरित किया जाता है तो उसके लिए संविधान संशोधन आवश्यक होगा।इसी आधार पर तमिलनाडु सरकार और विभिन्न याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कच्चातिवु समझौते के लिए भी संसद की मंजूरी और संविधान संशोधन आवश्यक था।दूसरी ओर केंद्र सरकार का पक्ष रहा है कि कच्चातिवु भारतीय भूभाग का हस्तांतरण नहीं था, बल्कि समुद्री सीमा निर्धारण था।यह संवैधानिक प्रश्न आज भी सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है।

तमिलनाडु में लगातार विरोध

1974 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने इस समझौते का विरोध किया था। बाद में 1991 में मुख्यमंत्री जे. जयललिता के नेतृत्व में तमिलनाडु विधानसभा ने कच्चातिवु को वापस लेने का प्रस्ताव पारित किया।2008 में तमिलनाडु सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर 1974 और 1976 के समझौतों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी। यह मामला अभी भी लंबित है।

राजनीतिक विश्लेषण

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कच्चातिवु विवाद केवल एक निर्जन द्वीप का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री रणनीति, संघीय ढांचे, संविधान और लाखों मछुआरों की आजीविका से जुड़ा विषय बन चुका है।भाजपा इसे कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल बताकर राष्ट्रीय हित का मुद्दा बना रही है, जबकि कांग्रेस इसे उस समय की कूटनीतिक आवश्यकता और अंतरराष्ट्रीय सीमा निर्धारण का निर्णय बताती है।

विशेषज्ञों की राय

विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत-श्रीलंका संबंधों में कच्चातिवु आज भी एक संवेदनशील मुद्दा है।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय इस विवाद की संवैधानिक स्थिति को और स्पष्ट करेगा।समुद्री मामलों के जानकार मानते हैं कि जब तक दोनों देशों के बीच मछुआरों की सुरक्षा और पारंपरिक अधिकारों को लेकर स्थायी व्यवस्था नहीं बनती, तब तक यह विवाद समय-समय पर राजनीतिक और कूटनीतिक बहस का विषय बना रहेगा।

निष्कर्ष

करीब पाँच दशक बाद भी कच्चातिवु केवल एक निर्जन द्वीप नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति, संवैधानिक व्यवस्था, संघीय राजनीति और तमिलनाडु के लाखों मछुआरों के भविष्य से जुड़ा एक जीवंत राष्ट्रीय प्रश्न बना हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय और भारत-श्रीलंका के बीच भविष्य की कूटनीतिक वार्ताएं ही तय करेंगी कि इस लंबे विवाद का स्थायी समाधान किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

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